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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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पण्डित रघुनाथ को स्वयं भी अपनी तर्कशक्ति और विलक्षण बुद्धि का भरोसा था। उनकी उस समय से ही यह प्रबल वासना थी कि मैं भारतवर्ष में एक प्रसिद्ध नैयायिक बनूँ। सम्पूर्ण देश में मेरी विलक्षण बुद्धि की ख्याति हो जाय। जो जैसे होनहार होते हैं, उनकी पहले से ही वैसी भावना होती है।
रघुनाथ की भी सर्वमान्य बनने की पहले से ही वासना थी। रघुनाथ के साथ निमाई का परिचय पहले से ही हो चुका था। उनके साथ इनकी गाढ़ी मैत्री भी हो चुकी थी। निमाई कभी-कभी रघुनाथ के निवासस्थान पर भी जाया करते और उनसे न्याय सम्बन्धी बातें किया भी करते थे। इनकी बातचीत से ही रघुनाथ समझ गये कि यह भी कोई होनहार नैयायिक हैं। वे समझते थे कि मुझसे न्याय में स्पर्धा रखने वाला नवद्वीप में दूसरा कोई छात्र नहीं है। निमाई से बातचीत करते-करते कभी उन्हें खटकने लगता कि यदि यह इसी प्रकार परिश्रम करता रहा, तो सम्भवतया मुझसे बढ़ सकता है। किन्तु उन्हें अपनी बुद्धि पर पूरा भरोसा था, इसलिये इस विचार को वे अपने हृदय में जमने नहीं देते थे।
एक दिन रघुनाथ को गुरु ने कोई ‘पंक्ति’ लगाने को दी। वह ‘पंक्ति’ रघुनाथ की समझ में ही नहीं आयी। वे दिनभर चुपचाप बैठे हुए उसी पंक्ति को सोचते रहे। तीसरे पहर जाकर वह पंक्ति रघुनाथ की समझ में आयी, उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। गुरु को बताकर वे अपने स्थान पर भोजन बनाने चले गये। निमाई का स्वभाव तो चंचल था ही, रघुनाथ को पाठशाला में न देखकर आप उनके निवासस्थान पर पहुँचे। वहाँ जाकर देखा रघुनाथ भोजन बना रहे हैं। लकड़ी गीली है। रघुनाथ बार-बार फूँकते हैं, अग्नि जलती ही नहीं। धुएँ के कारण उनकी आँखें लाल पड़ गयी हैं और उनमें से पानी निकल रहा है। हँसते हुए निमाई ने रघुनाथ के चैके में प्रवेश किया। प्रेम के साथ हँसते हुए बोले- ‘पण्डित महाशय! आज असमय में रन्धन क्यों हो रहा है।’
अग्नि में फूँक देते हुए रघुनाथ ने कहा- ‘क्या बताऊँ भाई! गुरु जी ने एक ‘पंक्ति’ लगाने के लिये दी थी, वह मेरी समझ में ही नहीं आयी। दिनभर सोचते रहने पर अब समझ में आयी, उसे अभी गुरुजी को सुनाकर आया हूँ, इसीलिये भोजन बनाने में देर हो गयी।’
जल्दी से निमाई ने कहा- ‘जरा हम भी तो उस पंक्ति को सुनें। पंक्ति क्या थी आफत थी, जो आप-जैसे पण्डित की समझ में इतनी देर में आयी। जरूर कोई बहुत ही कठिन होगी। मैं भी उसे एक बार सुनना चाहता हूँ।’
रघुनाथ ने वह पंक्ति सुना दी। थोड़ी देर सोचने के अनन्तर निमाई हँस पड़े और बोले- ‘बस, इसी छोटी-सी ‘पंक्ति’ को इतनी देर सोचते रहे, इसमें है ही क्या?’ जरा आवेश के साथ रघुनाथ जी ने कहा- ‘अच्छा, कुछ भी नहीं है तो तुम्हीं लगाकर बताओ।’
इतना सुनते ही निमाई ने बड़ी ही सरलता के साथ पंक्ति के पूर्वपक्ष की स्थापना की। फिर यथावत एक-एक शंका का समाधान करते हुए उसे बिलकुल ठीक लगा दिया।
निमाई के मुख से उस इतनी कठिन पंक्ति को खिलवाड़ की भाँति हँसते-हँसते लगाते देख रघुनाथ के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उन्हें जो शंका थी, वह प्रत्यक्ष आ उपस्थित हुई। उनकी सभी आशा पर पानी फिर गया। भोजन बनाना भूल गये। निमाई उनके मनोभाव को ताड़ गये कि रघुनाथ कुछ लज्जित हो गये हैं, इसलिये यह कहते हुए कि ‘अच्छा आप भोजन बनावें फिर मिलेंगे।’ पाठशाला की ओर चले गये। रघुनाथ ने जैसे-तैसे भात तो बनाया, किन्तु उनके हृदय में निमाई की बुद्धि के प्रति डाह होने के कारण उन्हें भोजन में आनन्द नहीं आया, जैसे-तैसे भोजन करके वे पाठशाला में आये। अब निमाई की अवस्था सोलह वर्ष की हो चुकी थी, उनके घुँघराले लम्बे-लम्बे बाल, तेजस्वी चेहरा, सुगठित शरीर, बड़ी-बड़ी सुहावनी आँखें, मिष्ट-भाषण और मन्द-मन्द मुस्कान देखने वाले को स्वतः ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती थी। वे सभी से दिल खोलकर मिलते और खूब घुल-घुलकर बातें करते। उनके मिलने वाले परस्पर में सभी यही समझते कि निमाई जितना अधिक स्नेह हमसे करता है, उतना किसी दूसरे से शायद ही करता हो। इसका कारण यह था कि उनके हृदय में किसी भी प्राणी के प्रति द्वेष नहीं था। जिसके हृदय में प्राणिमात्र के प्रति सम्मान है, उसे सभी अपना सगा-सम्बन्धी समझने लगते हैं। इसीलिये निमाई के बहुत अधिक स्नेही थे।
व्याकरण पढ़ने के अनन्तर ये न्याय का अभ्यास करने लगे और उसी बीच न्याय के ऊपर भी एक टिप्पणी लिखने लगे। इनके सहपाठी और स्नेही पं. रघुनाथ जी उसी समय अपने जगत प्रसिद्ध ‘दीधिति’ ग्रन्थ को लिख रहे थे। वे समझते थे, मेरा यह ग्रन्थ अर्वाचीन-न्याय के ग्रन्थों में अद्वितीय होगा। जब उन्होंने सुना कि निमाई भी एक न्याय का ग्रन्थ लिख रहे हैं, तब तो इनको भय मालूम पड़ने लगा और इनकी प्रबल इच्छा हुई कि उस ग्रन्थ को देखना चाहिये। यह सोचकर एक दिन उन्होंने निमाई से कहा- ‘भाई! हमने सुना है, न्याय के ऊपर तुम कोई ग्रन्थ लिख रहे हो? हमारी बड़ी इच्छा है, किसी दिन अपने ग्रन्थ को हमें भी दिखाओ’।
इन्होंने जोरों से हँसते हुए कहा- ‘अजी! आप भी कैसी बात कर रहे हैं। भला, हम न्याय-जैसे जटिल विषय पर लिख ही क्या सकते हैं? यह तो आप-जैसे पण्डितों का काम है। हम तो वैसे ही मनोविनोद के लिये खिलवाड़-सा करने लगे हैं। आपसे किसने कह दी?’ रघुनाथ ने आग्रह के साथ कहा- ‘कुछ भी हो, मेरी बड़ी प्रबल इच्छा है, यदि तुम्हें कोई आपत्ति न हो तो अपने ग्रन्थ को मुझे जरूर दिखाओ।’ इन्होंने जल्दी से कहा- ‘भला, इसमें आपत्ति की बात ही क्या हो सकती है? यह तो हमारा सौभाग्य है कि आप-जैसे विद्वान हमारी कृति को देखने की जिज्ञासा करते हैं। मैं कल जरूर उसे लेता आऊँगा।’ दूसरे दिन निमाई अपने ग्रन्थ को साथ लेते आये। पाठशाला से लौटते समय वे नाव पर बैठकर रघुनाथ को अपने ग्रन्थ को सुनाने लगे। रघुनाथ ज्यों-ज्यों उस ग्रन्थ को सुनते थे, त्यों-ही-त्यों उनकी मनोवेदना बढ़ती जाती थी। यहाँ तक कि वे ग्रन्थ को सुनते-सुनते फूट-फूटकर रोने लगे।
क्रमशः
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