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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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निमाई अपनी धुन में सुनाते ही जा रहे थे, उन्हें पता भी नहीं था कि रघुनाथ की ग्रन्थ के सुनने से क्या दशा हो रही है। सुनाते-सुनतो एक बार इन्होंने दृष्टि उठाकर रघुनाथ की ओर देखा। इनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा।
आश्चर्य प्रकट करते हुए निमाई ने पूछा- ‘भैया! तुम रो क्यों रहे हो?’ आँसू पोंछते हुए रुद्धकण्ठ से उन्होंने कहा- ‘निमाई! तुमसे मैं अपने मनोगत भावों को छिपाकर एक नया दूसरा पाप न करूँगा। सत्य बात तो यह है कि मैं इस अभिलाषा से एक ग्रन्थ लिख रहा था कि वह सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ होगा। किन्तु तुम्हारे इस ग्रन्थ को देखकर मेरी चिराभिलषित आशा पर पानी फिर गया। भला, तुम्हारे इस ग्रन्थ के सामने मेरे ग्रन्थ को कौन पूछेगा?’ इसी मनोवेदना के कारण मैं अपने आँसुओं को रोकने में असमर्थ हो गया हूँ।’
यह सुनकर निमाई बड़े जोरों से हँसे और उन्हें स्पर्श करते हुए बोले- ‘बस, इस छोटी-सी बात के ही लिये आप इतना अनुताप कर रहे हैं। भला, यह भी कोई बात है, यह तो साधारण-सी पोथी है, मैं आपकी प्रसन्नता के निमित्त जलती अग्नि में भी कूदकर इन प्राणों को स्वाहा कर सकता हूँ, फिर यह तो बात ही क्या है? इस पुस्तक ने आपको इतना कष्ट पहुँचाया, तो इसे मैं अभी नष्ट किये देता हूँ।’ इतना कहते-कहते निमाई ने अपनी बड़े परिश्रम से हस्तलिखित पोथी को गंगा जी के प्रवाह में फेंक दिया। जाह्नवी के तीक्ष्ण प्रवाह की हिलोरों में पुस्तक के पन्ने इधर-उधर नाचने लगे, मानो निमाई के त्याग और प्रेम के गीत गा-गाकर वे आनन्द में थिरक रहे हों।

रघुनाथ ने निमाई को गले से लगाया और प्रेम के कारण रूँधे हुए कण्ठ से बोले- ‘भैया निमाई! ऐसा लोकोत्तर दुस्साध्य कार्य तुम्हीं कर सकते हो। इतनी भारी लोकैषणा को तृणवत समझकर उसका तिरस्कार कर देना तुम्हारे-जैसे ही महापुरुषों का काम है। हम तो कीर्ति और प्रतिष्ठा के कीड़े हैं।

हमारी पुस्तक की अपेक्षा तुम्हारे इस त्याग की संसार में लाखों गुनी ख्याति होगी और आगे के लोग इस त्याग के द्वारा प्रेम का महत्त्व समझ सकेंगे।’ इस प्रकार की बातें करते हुए दोनों मित्र अपने-अपने घर लौट आये। उसी दिन से निमाई का न्याय पढ़ना ही नहीं छूटा, किन्तु उनका पाठशाला जाना ही छूट गया। अब उन्होंने ऐसी विद्या को पढ़ना एकदम त्याग दिया। घर पर पिता की और ज्येष्ठ भ्राता की बहुत-सी पुस्तकें थीं, वे उन्हीं का स्वयं अध्ययन करने लगे।

विवाह......

वट के नन्हें से बीज के अन्तर्गत एक महान वृक्ष छिपा रहता है, अज्ञानी लोग उसे भी अन्य पौधों के बीज की भाँति छोटा-सा ही बीज समझते हैं। अजवाइन के बीजों के साथ ही वट के बीज को भी बोते हैं, पहले-पहले दोनों का अंकुर एक-सा ही निकलता है, किन्तु आगे चलके अजवाइन का वृक्ष तो थोड़ा ही बढ़कर साल छः महीनों में ही सूख जाता है, किन्तु वट-वृक्ष निरन्तर बढ़ता ही रहता है और कालान्तर में जाकर वह एक महान विशाल वृक्ष बन जाता है, जिसकी छाया में बैठकर असंख्यों पसीनों से भींगे हुए प्राणी शीतलता का सुखास्वादन करते हैं, उसकी पूर्ण आयु का अनुमान भी नहीं किया जाता है। वह शाश्वत वृक्ष बन जाता है। निमाई यद्यपि अपने विद्यार्थियों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान और विलक्षण थे, फिर भी साधारण लोग यही समझते थे कि कालान्तर में यह भी एक पाठशाला खोलकर नवद्वीप का अन्य पण्डितों की भाँति एक नामी पण्डित बन जायगा।

यह भी अन्य पण्डितों की भाँति स्त्री-पुत्रों में आसक्त होकर सुखपूर्वक संसारी सुखों का उपभोग करेगा। क्योंकि विद्वान हो अथवा मूर्ख संसारी विषयों में तो सब समानरूप से ही रत रहते हैं। बड़े लोगों की भोग-सामग्री बहुमूल्य ओर बड़ी होती है। छोटे लोग साधारण भोग-सामग्रियों से ही अपनी वासनाओं को पूर्ण करते हैं, किन्तु उनमें आसक्ति दोनों की समान ही है। बँधे दोनों ही हैं। फिर चाहे वह बन्धन रस्सी का हो अथवा रेशम का। सोने की हो या लोहे की, बेड़ी तो समान ही हैं। दोनों ही बन्धन से प्रभु की इच्छा के बिना नहीं निकल सकते। अन्यान्य पण्डितों को धन के ही लिये विद्योपार्जन करते देख लोगों का यही अनुमान हो गया था कि निमाई भी अपने विद्या-बल से खूब धन प्राप्त करेगा। उन्हें यह पता नहीं था, इसके उपदेश से असंख्यों मनुष्य स्त्री, धन, परिवार और समस्त उत्तमोत्तम भोग-सामग्रियों को तुच्छ समझकर महाधन की प्राप्ति में कटिबद्ध हो जायँगे और अपने मनुष्य जन्म को सार्थक बनावेंगे।

संसारी लोग बेचारे और अनुमान कर ही क्या सकते हैं? इनका आरम्भिक जीवन आदि में अन्य साधारण जीवनों की भाँति था ही, इससे लोगों का यही अनुमान लगाना ठीक था। निमाई की अवस्था अब सोलह वर्ष की है। व्याकरण, अलंकार और न्याय में इन्होंने प्रवीणता प्राप्त कर ली है। आगे पढ़ने की भी इच्छा थी, किन्तु कई कारणों से इन्होंने पाठशाला में जाकर पढ़ना बंद कर दिया। घर पर अकेली विधवा माता थी, निर्वाह का कोई दूसरा प्रबन्ध नहीं था।आकाशी वृत्ति थी, ईश्वरेच्छा से जो भी आ जाता उसी पर निर्वाह होता। मिश्र जी कोई सम्पत्ति नहीं छोड़ गये थे, उनके सामने भी इसी प्रकार निर्वाह होता था। अब निमाई समझदार हो गये, विद्वान भी बन गये, इसीलिये अब जीवन-निर्वाह के लिये भी कुछ उद्योग करना चाहिये। वृद्धा माता को सुख पहुँचाने का यही अवसर है। यह सब सोच-समझकर इन्होंने सोलह वर्ष की छोटी ही अवस्था में अध्यापन का कार्य करना आरम्भ कर दिया। इनकी विलक्षण बुद्धि और पठन-पाठन को अद्वितीय सुन्दर शैली से सभी शास्त्रीय ज्ञान रखने वाले पुरुष परिचित थे। इसलिये इन्हें नवद्वीप-जैसे विद्या के भारी केन्द्रस्थान में अध्यापक बनने में कोई कठिनता न हुई। नवद्वीप में मुकुन्द संजय नाम के एक विद्यानुरागी धनी-मानी व्यक्ति थे। उनके एक पुरुषोत्तम संजय नाम का पुत्र था।

संजय महाशय अपने पुत्र के पढ़ाने के निमित्त किसी योग्य अध्यापक की तलाश में थे। निमाई की ऐसी इच्छा देख उन्होंने इनसे प्रार्थना की। निमाई स्वयं ही एक पाठशाला स्थापित करने की बात सोच रहे थे, किन्तु उनके छोटे-से मकान में पाठशाला स्थापित करने के योग्य स्थान ही न था। संजय भगवत-भक्त होने के साथ धनी भी थे।
क्रमशः

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