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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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बंगाल में प्रायः सभी धार्मिक पुरुषों के यहाँ एक ‘चण्डी-मण्डप’ नाम से अलग स्थान होता है, उसे ‘देवी-गृह’ या ‘ठाकुर-दालान’ भी कहते हैं। नवदुर्गाओं में उक्त स्थान पर ही चण्डीपाठ और पूजा तथा उत्सव हुआ करते हैं। यह स्थान ऐसे ही शुभ कार्यों के लिये सुरक्षित होते हैं। योग्य और विद्वान अतिथि के आने पर इसी स्थान में उनका आतिथ्यादि भी किया जाता है। अपनी शक्ति के अनुसार धनिकों का चण्डी-मण्डप विस्तृत, सुन्दर और अधिक कीमती होता है।
संजय महाशय का चण्डीमण्डप खूब बड़ा था। निमाई पण्डित ने उसी मण्डप में अपनी पाठशाला स्थापित की। इधर-उधर से बहुत-से छात्र इनका नाम सुनकर पढ़ने आने लगे। पुत्र के साथ संजय भी निमाई से विद्याध्ययन करने लगे। इनकी पढ़ाने की शैली बड़ी ही सरस तथा चित्ताकर्षक थी, इसलिये थोड़े ही समय में इनकी पाठशाला चल निकली और सैकड़ों छात्र इनके पास पढ़ने आने लगे। ये विद्यार्थियों के साथ गुरु-शिष्य का व्यवहारन करके एक प्रेमी मित्र का-सा व्यवहार करते। उनसे खूब हँसी-दिल्लगी करते, घर का हाल-चाल पूछते ओर अपनी सब बातें बताते। इससे विद्यार्थी इनके ऊपर अत्यधिक अनुराग रखने लगे। बहुत-से विद्यार्थी तो इनसे अवस्था में बहुत बड़े-बड़े थे। वे सब भी इनके पास अध्ययन करने आते और इनका हृदय से बहुत अधिक आदर करते थे। इस प्रकार इनकी पाठशाला नवद्वीप में एक प्रसिद्ध पाठशाला मानी जाने लगी।व्याकरण-शास्त्र में गंगादास जी की पाठशाला को छोड़कर निमाई की पाठशाला सबसे श्रेष्ठ समझी जाती थी। निमाई विद्यार्थियों के साथ परिश्रम भी खूब करते थे। एक दिन निमाई पण्डित पाठशाला से पढ़ाकर अपने घर जा रहे थे। दैवात गंगा जी जाते हुए रास्ते में पं. बल्लभाचार्ज जी की तनया लक्ष्मीदेवी से उनका साक्षात्कार हो गया। बल्लभाचार्य निमाई के सजातीय ब्राह्मण थे। इन्होंने लक्ष्मीदेवी को पहले भी कई बार देखा था, किन्तु आज के दर्शन में विशेषता थी। लक्ष्मीदेवी को देखते ही परम सदाचारी निमाई के ‘भावस्थितानि जननान्तरसौहृदानि’ इस न्याय के अनुसार पूर्वजन्म के संस्कार जाग्रत हो उठे। स्वाभाविक सौहृद तो स्वतः ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है, इसमें चेष्टा करना या अनुराग करना तो कहा ही नहीं जा सकता। इन्होंने लक्ष्मीदेवी की ओर देखा। लक्ष्मीदेवी ने भी धीरे से इनकी ओर देखा और इनके पादपद्मों में भक्ति से मन-ही-मन प्रणाम करके वह गंगा की ओर चली गयी। ये अपने घर की ओर चले गये।
भावी की भवितव्यता तो देखिये उसी दिन बनवारी घटक नाम के जगन्नाथ मिश्र के स्नेही एक ब्राह्मण शचीदेवी के समीप आये और माता से कहने लगे- ‘निमाई अब सयाना हो गया है, अब उसके विवाह का शीघ्र ही उद्योग करना चाहिये। यदि तुम्हें पसंद हो तो पं. बल्लभाचार्य की एक कन्या है। तुम उसे चाहो तो देख सकती हो। लाखों में एक है, बड़ी ही सुशीला, सुन्दरी और बुद्धिमती लड़की है। निमाई के वह सर्वथा योग्य है। यदि तुम्हें यह सम्बन्ध मंजूर हो तो मैं पण्डित जी से इस सम्बन्ध में कहूँ।’
माता स्वयं पुत्र के विवाह की चिन्ता में थीं, किन्तु वे निमाई की इच्छा के बिना कोई सम्बन्ध निश्चित करना नहीं चाहती थीं। घर में कोई दूसरा आदमी सलाह करने के लिये था नहीं, पुत्र समझदार और सयाना था, उसकी अनुमति के बिना वे विवाह के सम्बन्ध में किसी को निश्चित वचन नहीं दे सकती थीं, अतः बात को टालते हुए माता ने कहा- ‘इस पितृ-हीन बालक का विवाह ही क्या है, अभी तो वह पढ़ ही रहा है। कुछ करने लगेगा तो देखा जायगा।’ घटक महाशय शचीमाता का ऐसा उदासीन भाव देखकर समझ गये कि माता को यह सम्बन्ध मंजूर नहीं। कारण कि पं. बल्लभाचार्य बहुत ही गरीब थे। ब्राह्मण ने समझा, माता अपने पण्डित पुत्र का निर्धन की लड़की के साथ विवाह करना नहीं चाहती। यह समझकर वे लौट आये। दैवात रास्ते में उन्हें निमाई मिल गये। इन्हें देखते ही निमाई खिल उठे ओर हँसते हुए बोले- ‘कहिये, घटक महाशय! किधर-किधर से आगमन हो रहा है।’
कुछ असन्तोष के भाव से घटक ने उत्तर दिया- ‘तुम्हारी माता के पास पं. बल्लभाचार्य की पुत्री के साथ तुम्हारे विवाह की बातचीत करने गया था, सो उन्होंने मंजूर ही नहीं किया। कहो तुम्हारी क्या सलाह है?’
निमाई यह सुनकर हँस पड़े। उन्होंने कुछ भी उत्तर नहीं दिया, वे हँसते हुए घर चले गये। घर पहुँचकर इन्होंने कुछ मुसकराते हुए कहा- ‘घटक उदास होकर जा रहे थे, बल्लभाचार्य जी का सम्बन्ध मंजूर क्यों नहीं किया?’ माता समझ गयी कि निमाई को इस सम्बन्ध में कोई आपत्ति नहीं है, इसलिये उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। दूसरे दिन घटक को बुलाकर उन्होंने कहा- ‘आचार्य महाशय, कल आप जो बात कहते थे, वह मुझे स्वीकार है, आप पं. बल्लभाचार्य से कहकर सब ठीक करा दीजिये। आप ही अब हमारे हितैषी हैं और घर में दूसरा है ही कौन? आपका ही लड़का है जैसे चाहें कीजिये।’ बनवारी घटक को यह सुनकर बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उसी समय बल्लभाचार्य के घर पहुँचे।
आचार्य ने इनका सत्कार किया और आने का कारण जानना चाहा। इन्होंने सब वृत्तान्त बता दिया। इस संवाद को सुनकर पं. बल्लभाचार्य को तथा उनके समस्त घरवालों को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे घटक से कहने लगे- ‘मेरा सौभाग्य है कि शची देवी ने इस सम्बन्ध को स्वीकार कर लिया है। निमाई पण्डित-जेसे विद्वान को अपना जामाता बनाने में मैं अपना अहोभाग्य समझता हूँ। लड़की के पूर्वजन्म के शुभ संस्कारों के उदय होने पर ही ऐसा वर मिल सकता है, किन्तु आप मेरी परिस्थिति से तो परिचित ही हैं। मेरे पास देने-लेने के लिये कुछ नहीं है। केवल पाँच हरीति की के साथ कन्या को ही समर्पित कर सकूँगा। यदि यह बात उन्हें मंजूर हो तो आप जब भी कहें मैं विवाह करने को तैयार हूँ।’
घटक ने कहा- ‘आप इस बात की कुछ चिन्ता न कीजिये। शची देवी को रूपये-पैसे का लोभ नहीं है। वे तो सुशीला सुन्दरी लड़की ही चाहती हैं, आप प्रसन्नता के साथ विवाह की तैयारियाँ कीजिये।’ यह कहकर घटक महाशय बल्लभाचार्य जी से विदा होकर शची देवी के पास आये और सम्पूर्ण वृत्तान्त सुना दिया। दोनों ओर से विवाह की तैयारियाँ होने लगीं।
क्रमशः
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