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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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वे मानो अपने अत्यन्त क्षीण शरीर को अन्तिम बार पति-दर्शनों की लालसा से ही टिकाये हुए हैं, किन्तु उनकी यह अभिलाषा पूरी न हो सकी।
निमाई पण्डित को पूर्व बंगाल में अनुमान से अधिक दिन लग गये। अन्त में बड़े कष्ट के साथ वियोग-व्यथा को न सह सकने के कारण अपने पतिदेव के चरण-चिह्नों को हृदय में धारण करके उन्होंने इस पांचभौतिक शरीर का त्याग कर दिया। वे इस मर्त्यलोक की भूमि को त्यागकर सतियों के रहने योग्य अपने-पुण्य-लोक में पति-मिलन की आकांक्षा से चली गयीं। घरवालों ने रोते-रोते उनके सभी संस्कार किये। इधर निमाई पण्डित को पूर्व बंगाल में भ्रमण करते हुए कई मास बीच गये। अब इन्हें घर की चिन्ता होने लगी। इन्हें भान होने लगा कि हमारे घर पर जरूर कुछ अनिष्ट हुआ है, हृदय के भाव तो असंख्यों कोसों पर से हृदय में आ जाते हैं। लक्ष्मी देवी की अन्तिम वेदना इनके हृदय को पीड़ा पहुँचाने लगी। इन्हें अब कहीं आगे जाना अच्छा नहीं लगता था, इसलिये इन्होंने साथियों को नवद्वीप लौट चलने की आज्ञा दी।
आज्ञापाकर सभी नवद्वीप लौट चलने की तैयारियाँ करने लगे। बहुत-से नवीन छात्र भी विद्योपार्जन के निमित्त इनके साथ हो लिये थे। उन सभी को साथ लेकर ये नवद्वीप की ओर चल पड़े। इन्हें काफी धन तथा अन्य आवश्यकीय वस्तुएँ भेंट तथा उपहार में प्राप्त हुई थीं। थोडे़ दिनों में ये फिर नवद्वीप में ही आ गये। इनके आगमन का समाचार बिजली की तरह नगर में फैल गया। इनके इष्ट, मित्र, स्नेही तथा पुराने छात्र दर्शनों के लिये इनके घर पर आने लगे। ये सभी से यथोचित प्रेमपूर्वक मिले। सभी ने यात्रा के कुशल-समाचार पूछे। इन्होंने सबसे पहले अपनी माता के चरणों को स्पर्श किया। माता का चेहरा मुरझाया हुआ था, वे पुत्र-वधू के वियोग और पुत्र की चिन्ता के कारण अत्यन्त दुःखी-सी मालूम पड़ती थीं।चिरकाल के बिछडे़ हुए अपने प्रिय पुत्र को पाकर माता के सुख का वारापार न रहा। गौ जिस प्रकार बिछुड़े हुए बछड़े को पाकर उसे प्रेम से चाटने लगती है उसी प्रकार माता निमाई के युवा शरीर के ऊपर अपना शीतल और कोमल कर फिराने लगीं। उनकी आँखों से निरन्तर प्रेमाश्रु निकल रहे थे। निमाई ने हँसते हुए पूछा- ‘अम्मा! सब कुशल तो है? मुझे अनुमान भी नहीं था, कि इतने दिन लग जायँगे, तुम्हें पीछे कोई कष्ट तो नहीं हुआ’ पुत्र के ऐसा पूछने पर माता चुप ही रहीं। तब किसी दूसरी स्त्री ने धीरे से लक्ष्मी देवी के परलोक-गमन की बात इनसे कह दी। सुनते ही इनके चेहरे पर दुःख, सन्ताप और वियोग के भाव प्रकट होने लगे। माता और भी जोरों के साथ रुदन करने लगीं। निमाई की भी आँखों में अश्रु आ गये। उन्हें पोंछते हुए धीरे-धीरे वे माता को समझाने लगे- ‘माँ, विधि के विधान को मेट ही कौन सकता है? जो भाग्य में बदा होगा, वह तो अवश्य ही होकर रहेगा। इतने ही दिनों तक तुम्हारी पुत्र-वधू का तुमसे संयोग बदा था, इस बात को कौन जानता था?’
माता ने रोते-रोते कहा- ‘बेटा, अन्तिम समय में भी वह तेरे आने की ही बात पूछती रही। ऐसी बहू अब मुझे नहीं मिलेगी, साक्षात लक्ष्मी ही थी।’ निमाई यह सुनकर चुप हो गये। माता फिर बड़े जोरों से रोने लगीं। इस पर प्रभु ने कुछ जोर देकर कहा- ‘अम्मा! अब चाहे तू कितनी भी रोती रह, तेरी पुत्र-वधू तो अब लौटकर आने की नहीं। वह लौटने के लिये नहीं गयी है। अब तो धैर्य-धारण से ही काम चलेगा।’ पुत्र के ऐसे समझाने पर माता ने धैर्य-धारण करके अपने आँसू पोंछे और निमाई को स्नानादि करने के लिये कहा। फिर स्वयं उन सबके लिये भोजन बनाने में लग गयीं। भोजन से निवृत्त होकर निमाई पण्डित अपने इष्ट-मित्रों के साथ पूर्व बंगाल की यात्रा-सम्बन्धी बहुत- सी बातें करने लगे और फिर पूर्व की भाँति पाठशाला में जाकर पढ़ाने लगे।
नवद्वीप में दिग्विजयी पण्डित.....
भगवद्दत्त प्रतिभा भी एक अलौकिक वस्तु है। पता नहीं, किस मनुष्य में कब और कैसी प्रतिभा प्रस्फुटित हो उठे। अच्छे गाय कों को देखा है, वे पद को सुनते-सुनते ही कण्ठस्थ कर लेते हैं। सुयोग्य गायकों को दूसरी बार पद्य को पढ़ने की आवश्यकता नहीं होती, एक बार के सुनने पर ही उन्हें याद हो जाता है। किसी को जन्म से ही ताल, स्वर और राग-रागिनियों का ज्ञान होता है और वह अल्प वय में अच्छे-अच्छे धुरन्धरों को अपने गायन से आश्चर्यान्वित बना देता है। कोई कवि होकर ही माता के गर्भ से उत्पन्न होते हैं, जहाँ वे बोलने लगे, कि उनकी वाणी से कविता ही निकलने लगती है। कोई अनपढ़ होने पर भी ऐसे सुन्दर वक्ता होने हैं कि अच्छे-अच्छे शास्त्री और महामहोपाध्याय उनके व्याख्यान को सुनकर चकित हो जाते हैं। यह सब भगवद्दत्त शक्तियाँ हैं, इन्हें कोई परिश्रम करके प्राप्त करना चाहे तो असम्भव है। ये सब प्रतिभा के चमत्कार हैं और यह प्रतिभा पुरुष के जन्म के साथ ही आती है, काल पाकर वह प्रस्फुटित होने लगती है। बहुत-से विद्वानों को देखा गया है, वे सभी शास्त्रों के धुरन्धर विद्वान हैं, किन्तु सभा में वे एक अक्षर भी नहीं बोल सकते। इसके विपरीत बहुत-से ऐसे भी होते हैं जिन्होंने शास्त्रीय विषय तो बहुत कम देखा है किन्तु वे इतने प्रत्युत्पन्नमति होते हैं कि प्रश्न करते ही झट उसका उत्तर दे देते हैं। किसी भी विषय के प्रश्न पर उन्हें सोचना नहीं पड़ता, जो प्रश्न सुनते ही ऐसा युक्तियुक्त उत्तर देते हैं कि सभा के सभी सभासद वाह-वाह करने लगते हैं, इसी का नाम सभा-पाण्डित्य है। पहले जमाने में पण्डित के माने ही वावदूक वक्ता या व्याख्यानपटु किये जाते थे।
जिसकी वाणी में आकर्षण नहीं, जिसे प्रश्न के सुनने पर सोचना पड़ता है, जो तत्क्षण बात का उत्तर नहीं दे सकता, जिसे सभा में बोलने से संकोच होता है, वह पण्डित ही नहीं। सभा में ऐसे पण्डितों की प्रशंसा नहीं होती। पाण्डित्यप ने की कीर्ति के वे अधिकारी नहीं समझे जाते। वे तो पुस्तकीय जन्तु हैं जो पुस्तकें उलटते रहते हैं। आज से कई शताब्दी पूर्व इस देश में संस्कृत-साहित्य का अच्छा प्रचार था।
क्रमशः
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