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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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दिग्विजयी ने झुँझलाकर सिर हिलाते हुए कहा- ‘बताओ न कौन-कौन-से दोष हैं?’ निमाई ने उसी सरलता के साथ कहा- पहले श्लोक के गुण ही सुनिये।
(1) पहला गुण तो इसमें ‘शब्दालंकार’ है। श्लोक के पहले चरण में पाँच ‘तकारों’ की पंक्ति बड़ी ही सुन्दरता के साथ ग्रथित की गयी है। तृतीय चरण में पाँच ‘रकार’ और चतुर्थ चरण में चार ‘भकार’ बड़े ही भले मालूम पड़ते हैं। इन शब्दों के कारण श्लोक में शब्दालंकार-गुण आ गया है।
(2)  दूसरा गुण है ‘पुनरुक्तिवदाभास’। पुनरुक्तिवदाभास उस गुण को कहते हैं जो सुनने में तो पुनरुक्ति प्रतीत हो, किन्तु पुनरुक्ति न होकर दोनों पदों के दो भिन्न-भिन्न अर्थ हों। जैसे श्लोक में ‘श्री-लक्ष्मी-इव’ यह पद आया है। सुनने में तो श्री और लक्ष्मी दोनों समान अर्थवाचक ही प्रतीत होते हैं किन्तु यहाँ श्री और लक्ष्मी का अलग-अलग अर्थ न करके ‘श्रीसे युक्त लक्ष्मी’ ऐसा अर्थ करने से सुन्दर अर्थ भी हो जाता है और साथ ही ‘पुनरुक्तिवदाभास’ गुण भी प्रकट होता है।

(3) तीसरा गुण है ‘अर्थालंकार’। अर्थालंकार उसे कहते हैं, जिसमें अर्थ के सहित उपमा का प्रकाश किया हो। जैसे श्लोक में ‘लक्ष्मीः इव’ अर्थात लक्ष्मी की तरह कहकर गंगा जी को लक्ष्मी की उपमा दी गयी है। इस कारण बड़ा ही मनोहर ‘अर्थालंकार’ है।

(4) चौथा एक और भी ‘अर्थालंकार’ गुण है, उसका नाम है ‘विरोधाभासार्थालंकार’। विरोधाभासरूपी अर्थालंकार उसे कहते हैं कि उपमा-उपमेय एक-दूसरे से बिलकुल विभिन्न गुणवाले हों, जैसे-

अम्बुजमम्बुनि जातं क्वचिदपि न जातमम्बुजादम्बु।
मुरभिदि तद्विपरीतं पादाम्भोजान्महानदी जाता।।

अर्थात जल से तो कमलों की उत्पत्ति होती हुई देखी गयी है, किन्तु कमल से जल कभी उत्पन्न नहीं हुआ है, परन्तु भगवान की लीला विचित्र ही है, उनके पाद-पद्मों से जगत्पावनी महानदी उत्पन्न हुई है। यहाँ कमल से जल की उत्पत्ति का विरोध है, किन्तु भगवान तो ‘कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुम्’ सभी प्रकार से समर्थ हैं, इसलिये आपके श्लोक में ‘विष्णोश्चरणकमलोत्पत्तिसुभगा’ इस पद से विष्णु भगवान के चरण-कमलों से उत्पत्ति बताने से ‘विरोधाभासरूपी अर्थालंकार’ आ गया है।

(5) पाँचवाँ एक और भी ‘अनुमान’ अलंकार है। श्लोक में साध्य वस्तु गंगाजी का महत्त्व वर्णन करना है। विष्णुपादोत्पत्ति उसका साधन बताकर बड़ा चमत्कारपूर्ण अनुमानालंकार सिद्ध हो जाता है अर्थात ‘विष्णुपादोत्पत्ति वाक्य ही अनुमानालंकार है।’ इस प्रकार पाँच गुणों को बताकर निमाई पण्डित चुप हो गये। सभी अनिमेषभाव से टकट की लगाये निमाई पण्डित की ही ओर देख रहे थे, उन्होंने ये सब बातें बडत्री सरलता और निर्भीकता के साथ कहीं थीं, दिग्विजयी का कलेजा भीतर-ही-भीतर खिंच-सा रहा था, वे उदासीनभाव से गंगाजी की सीढ़ी के घाट की ओर देख रहे थे, मानो वे कह रहे हैं, यह पत्थर यहाँ से हट जाय तो मैं इसमें समा जाऊँ। निमाई पण्डित के गुण बताने पर उन्हें प्रसन्नता नहीं हुई। जैसे किसी शास्त्री पण्डित से कह दें आप थोड़ा-सा व्याकरण भी जानते हैं, जैसे उसे इस वाक्य से कोई विशेष प्रसन्नता न होकर और दुःख ही होगा, उसी प्रकार अपने काव्य को सर्वगुणसम्पन्न समझने वाले दिग्विजयी को इन पाँच गुणों के श्रवण से प्रसन्नता की जगह दुःख ही हुआ। उन्होंने कुछ चिढ़कर कहा- ‘अच्छा, ये तो गुण हो गये, अब तुम बता सकते हो तो इसके दोषों को भी बताओ।’
यह सुनकर उसी गम्भीर वाणी से निमाई पण्डित कहने लगे- गुणों की भाँति दोष भी इसमें अनेकों निकाले जा सकते हैं, किन्तु पाँच मोटे-मोटे दोष प्रत्यक्ष ही हैं। श्लोक में दो स्थानों पर तो ‘अविमृष्ट-विधेयांश’ दो दोष हैं। तीसरा ‘विरुद्धमति’ दोष है, चैथा ‘भग्नक्रम’ ओर पाँचवाँ ‘पुनरुक्ति’ दोष भी है। इस प्रकार ये पाँच दोष मुख्य हैं, अब इनकी व्याख्या सुनिये।

(1) ‘अविमृष्ट-विधेयांश’ दोष उसे कहते हैं जिसमें ‘अनुवाद’ अर्थात परिज्ञात विषय आगे न लिखा जाय। ऐसा करने से अर्थ में दोष आ जाता है। आपके श्लोक का मूल विधेय है। ‘गगा जी का महत्त्व’ और ‘इदम्’ शब्द अनुवाद है। आपने ‘अनुवाद’ को पहले न कहकर सबसे पहले ‘महत्त्वं गंगायाः’ जो ‘विधेय’ है उसे ही आगे कह दिया, इससे ‘अविमृष्ट-विधेयांश’ दोष आ गया।

(2) दूसरा ‘अविमृष्ट-विधेयांश’ दोष ‘द्वितीयश्रीलक्ष्मी’ इस पद में है। यहाँ पर ‘द्वितीयत्व’ ही ‘विधेय’ है, द्वितीयशब्द ही समास में पड़ गया। समास में पड़ जाने से वह मुख्य न रहकर गौण पड़ गया। इससे शब्दार्थ क्षय हो गया अर्थात लक्ष्मी की समता प्रकाश करना ही अर्थ का मुख्य तात्पर्य था, सो द्वितीय शब्द के समास में पड़ जाने से अर्थ ही नाश हो गया।

(3) तीसरे श्लोक में ‘विरुद्धमति’ दोष है। विरुद्धमति दोष उसे कहते हैं कि कहना तो किसी के लिये चाहते हैं और अर्थ करने पर किसी दूसरे पर घटता है। आपके श्लोक में ‘भवानीभर्तु’ पद आया है, आपका अभिप्राय शंकर जी से है, किन्तु अर्थ लगाने पर महादेव जी का न लगकर किसी दूसरे का ही भास होता है। ‘भवानीभर्ता’ के शब्दार्थ हुए (भवस्य पत्नी भवानी भवान्या भर्ता- भवानीभर्ता) अर्थात शिव जी की पत्नी का पति। इससे पार्वती जी के किसी दूसरे पति का अनुमान किया जा सकता है। जैसे ‘ब्रह्मणपत्नी के स्वामी को दान दो’ इस वाक्य के सुनते ही दूसरे पति का बोध होता है। काव्य में इसे ‘विरुद्धमति’ दोष कहते हैं, यह बड़ा दोष समझा जाता है।

(4) चौथा ‘पुनरूक्ति’ दोष है। पुनरूक्ति दोष उसे कहते हैं, एक बात को बार-बार कहना- या क्रिया के समाप्त होने पर फिर से उसी बात को दुहराना। आपके श्लोक में ‘विभवति’ क्रिया देकर विषय को समाप्त कर दिया है, फिर भी क्रिया के अन्त में ‘अद्भुतगुणा’ विशेषण दकर ‘पुनरुक्तिदोष’ कर दिया गया है।

(5) पाँचवाँ ‘भग्नक्रम’ दोष है। भग्नक्रम दोष उसे कहते हैं कि दो या तीन पदों में तो कोई क्रम जारी रहे और एक पद में वह क्रम भग्न हो जाये। आपके श्लोक के प्रथम चरण में पाँच ‘तकार’ तीसरे में पाँच ‘रकार’ और चतुर्थ चरण में चार भकारों का अनुप्रास है किन्तु दूसरा चरण अनुप्रासों से रहित ही है। इससे श्लोक में ‘भग्नक्रम’ दोष आ गया।’
महामहिम निमाई पण्डित बृहस्पति के समान निर्भीक होकर धारा-प्रवाह गति से बोलते जाते थे। सभी दर्शकों के चेहरे से प्रसन्नता की किरणें निकल रही थीं। दिग्विजयी लज्जा के कारण सिर नीचा किये हुए चुपचाप बैठे थे।
क्रमशः

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