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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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आप कहते- ‘हमें तो तुम्हारे ही खोल बहुत प्रिय लगते हैं, तुम्हीं से लेंगे और आठ ही लेंगे।’

श्रीधर कहते- ‘देखो, तुम अब सयाने हुए। ये बातें अच्छी नहीं होतीं। तुम्हें आठ दे देंगे तो फिर सभी आठ ही माँगेंगे। यदि ऐसी ही बात है, तो हम तुम्हें बिना ही मूल्य खोल दिया करेंगे।’

निमाई हँसते हुए कहते- ‘वाह! फिर कहना ही क्या है?’ नेकी और पूछ-पूछकर’ ‘मीठा और भर कठौता’ बस, यही तो हमें चाहिये।’

फिर कहते- ‘हमारी पूजा नहीं करते, माला हमें भी दिया करो’।

श्रीधर कहते- ‘माला तो मैं देवता के ही लिये लाता हूँ, गंगाजी के लिये पुष्प लाता हूँ, तुम्हें पुष्प-माला कैसे दूँ?’

आप कहते- ‘सबसे बड़े देवता तो हमी हैं, हमसे बढ़कर देवता और कौन हो सकता है? गंगा जी तो हमारे चरणों का धोवन हैं।’ यह सुनकर श्रीधर कानों पर हाथ रख लेते और दाँतों से जीभ काटते हुए कहते- ‘हाय पण्डित! पढ़े-लिखे होकर ऐसी बातें कहते हो! ऐसी बात के कहने से पाप होता है। तुम ब्राह्मण के कुमार होकर ऐसी पाप की बातें अपने मुँह से निकालते हो!’ कालान्तर में यही श्रीधर महाप्रभु गौरांग के अनन्य भक्त हुए और इन्होंने अन्त में उन्हें ईश्वर करके माना और अपने इन वाक्यों के लिये बहुत ही पश्चात्ताप प्रकट किया।

प्रभु इनसे अत्यन्त ही स्नेह रखते थे। गौर-भक्तों में श्रीधर का खोल बहुत ही प्रसिद्ध था। गौर को श्रीधर के खोल के बिना सभी व्यंजन रुचिकर ही नहीं होते थे। एक दिन ये घर की ओर जा रहे थे, रास्ते में पण्डित श्रीवास जी मिले। श्रीवास पण्डित अद्वैताचार्य के साथी और स्नेही थे। पण्डित जगन्नाथ मिश्र के ये अभिन्न मित्र थे, इनकी पत्नी मालती देवी और ये निमाई को सगे पुत्र की भाँति प्यार करते थे। ये भी इन दोनों में माता-पिता के समान श्रद्धा रखते थे। श्रीवास पण्डित को देखकर इन्होंने उन्हें प्रणाम किया।पण्डित जी ने इन्हें आशीर्वाद दिया और बड़े ही प्रेम के साथ बोले- ‘निमाई! देखो, अब तुम बालक नहीं हो, यह बाल-चापल्य तुम्हें शोभा नहीं देता। इस तरह से उच्छृंखलता का जीवन बिताना ठीक नहीं। कुछ भक्तिभाव भी सीखना चाहिये। तुम्हारे पिता तो परम वैष्णव थे।

इन्होंने सरलता से कहा- ‘अभी थोड़े दिन और इसी तरह मौज कर लेने दो, फिर इकट्ठे ही वैष्णव बनेंगे और ऐसे वैष्णव बनेंगे कि वैष्णवों की तो बात ही क्या है, साक्षात विष्णु भी हमारे पास आया करेंगे।’

इनकी बात सुनकर उन्होंने कहा- ‘आगे और कब होगे? अभी से कुछ भक्तिभाव करना चाहिये। किसी देवी-देवता में श्रद्धा रखते हो?’ इन्होंने कहा- ‘किस देवता में श्रद्धा रखें, आप ही कृपा करके बताइये?’

श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘जिसमें तुम्हारी श्रद्धा हो। देवपूजा करनी चाहिये और भगवन्नाम का यथाशक्ति जप करना चाहिये।’

निमाई जानते थे, कि वैष्णव ‘सोऽहम्’ और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इन वाक्यों से चिढ़ते हैं। इसलिये श्रीवास पण्डित को चिढ़ाने के लिये कहने लगे- ‘सोऽहम्’, ‘अहं ब्रह्मास्मि’ हमारी तो इन्ही महावाक्यों पर श्रद्धा है। जब हम ही ब्रह्म हैं तब पूजा किसकी करें और जप किसके नाम का करें, आप ही बताइये?’

यह सुनकर श्रीवास पण्डित ने कानों पर हाथ रख लिया और बोले- ‘वैष्णव के पुत्र को ऐसी बात मुख से नहीं कहनी चाहिये। तुम तो लड़कपन किया करते हो।’ इतना सुनकर ये यह कहते हुए घर की ओर चले गये कि ‘अच्छा, किसी दिन देख लेना, हम कैसे वैष्णव बनते हैं, तब तुम हमारे पीछे-ही-पीछे लगे डोलोगे।’

इन्होंने यह बातें हँसी में कही थीं, किन्तु श्रीवास पण्डित को इन बातों से कुछ आशा-सी हुई। वे सोचने लगे- ‘यदि निमाई- जैसे पण्डित, मेधावी और सर्वप्रिय पुरुष वैष्णव बन जायँ तो वैष्णवधर्म का देशभर में झंडा फहराने लगे। अनाथ वैष्णव भक्त सनाथ हो जायँ।’ वे यही सोचते-विचारते गंगा जी की ओर चले गये। कालान्तर में श्रीवास पण्डित के विचार सत्य ही हो गये। वैष्णव-धर्म की विजय-दुन्दुभि से सम्पूर्ण देश गूँजने लग गया और भक्ति-भागीरथी की एक ऐसी भारी बाढ़ आयी जिसके कारण सभी विषमता दूर होकर चारों ओर समता का साम्राज्य स्थापित हो गया।

श्रीविष्णुप्रिया-परिणय....

बहू के बिना घर सूना-ही-सूना लगता है, इसका अनुभव वही माता कर सकती है, जिसके घर में एक ही पुत्र हो और उसकी सर्वगुणसम्पन्ना पुत्र-वधू परलोकगामिनी हो चुकी हो, उसे चारों ओर से अपना ही घर उजड़ा हुआ-सा दिखायी पड़ता है, घर की लिपी-पुती स्वच्छ दीवालें उसे काटने को दौड़ती हैं। एकलौते पुत्र को देखते ही माता की छाती फटने लगती है और जब-जब पुत्र को स्वयं अपने हाथों से कुछ काम करते देखती है, तभी-तब अश्रुओं से अपनी छाती को भिगोती है। पुत्र-वधू से रहित युवक पुत्र को देखकर माता को महान कष्ट होता है। शचीमाता की भी ऐसी ही दशा थी, जब से लक्ष्मीदेवी परलोकगामिनी हुई हैं, तभी से माता का चित्त उदास रहता है। वे निमाई को देखते ही रोने लगती हैं। निमाई मन-ही-मन सब समझते हैं, किन्तु कुछ कहते नहीं हैं, चुप ही रहते हैं, कहें भी तो क्या कहें?

माता को सदा यही चिन्ता रहती है कि निमाई के योग्य कोई सुन्दरी और गुणवती कुलीन कन्या मिल जाय तो मैं जल्दी-से-जल्दी उसका दूसरा विवाह करके अपने घर को पहले की भाँति हरा-भरा, आनन्द उल्लासयुक्त देख सकूँ। वे गंगा-किनारे जब-जब जातीं तभी-तब वहाँ स्नान करने के निमित्त आयी हुई अपनी सजातीय सयानी कन्याओं के ऊपर एक हलकी-सी दृष्टि डालतीं और फिर निगाह नीची कर लेतीं। इस प्रकार वे रोज ही अपनी नवीन पुत्र-वधू की उन कन्याओं में खोज किया करतीं।

उन्हीं कन्याओं के बीच में वे एक परम सुन्दरी और सुशीला कन्या को भी देखतीं, वह कन्या प्रायः शचीदेवी को रोज ही मिलती। सुबह, शाम, दोपहर को जब भी शची माता स्नान के निमित्त आतीं तभी उस कन्या को घाट पर देखतीं, कभी तो वह स्नान करती होती, कभी देव-पूजन और कभी-कभी स्नान करके घर को जाती हुई शची देवी को मिलती। वह कन्या शची माता को जब भी देखती तभी वह बड़ी श्रद्धा-भक्ति के साथ प्रणाम करती।
क्रमशः

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