cc 58
श्री श्री चैतन्य चरितावली
58-
इनके जीवन में प्रेम के जैसे उत्तरोत्तर अद्वितीय भाव प्रकट हुए हैं, वैसे भाव संसार का इतिहास खोजने पर भी किसी प्रकटरूप से उत्पन्न हुए महापुरुष के जीवन में शायद ही मिलें! किसी के जीवन में क्या, बहुतों के जीवन में ये भाव प्रकट हुए होंगे, किन्तु वे संसार की दृष्टि से दूर जाकर प्रकट हुए होंगे, संसारी लोगों को उन भावों का पता नहीं चैतन्य के जीवन के भाव तो भक्तों ने प्रत्यक्ष देखे और उनके समकालीन लेखकों ने यथासाध्य उनका वर्णन करने की चेष्टा भी की है, किन्तु वे भाव तो अवर्णनीय हैं। संसारी भाषा इन अलौकिक भावों का वर्णन कर ही कैसे सकती है?
सहसा एक दिन निमाई पण्डित रास्ता चलते-चलते पुस्तक फेंककर अपने घर की ओर भाग पड़े। रास्ते के सभी लोग डर गये। इनकी सूरत विचित्र ही बन गयी थी। घर पहुँचकर इन्होंने घर के सभी बर्तनों को आँगन में निकाल-निकालकर फोड़ना प्रारम्भ कर दिया। माता अवाक होकर इनकी ओर देखने लगीं। उनकी हिम्मत न हुई कि निमाई को ऐसा करने से रोकें। ये अपनी धुन में मस्त थे। किसी भी चीज की परवा नहीं करते। जो भी चीज मिल जाती उसे ही नष्ट करते। पानी को उलीचते, अन्न को फेंकते और वस्त्रों को बीच से फाड़ देते थे। माता बाहर जाकर आस-पास के लोगों को बुला लायीं। लोगों ने इन्हें इस काम से हटाने की चेष्टा की, किन्तु जो भी इनकी ओर जाता, उसे ही ये मारने के लिये दौड़ते। इसलिये किसी की हिम्मत ही नहीं पड़ती थी। जैसे-तैसे लोगों ने इन्हें हटाकर शय्या पर सुलाया। चारों ओर से विद्यार्थी तथा इनके स्नेही इनकी शय्या को घेरकर बैठ गये। अब ये निरन्तर पागलों की भाँति बकने लगे। लोगों से कहते- ‘हम साक्षात विष्णु हैं, हमारी पूजा करो। संसार में हम ही एकमात्र वन्दनीय तथा पूजनीय हैं। तुम लोग निरन्तर श्रीकृष्ण-कीर्तन किया करो। संसार में श्रीकृष्ण का ही नाम सार है और सभी वस्तुएँ असार हैं। इस प्रकार ये न जाने क्या-क्या कहते रहे।’
लोग अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार भाँति-भाँति के अनुमान लगाते। कोई कहता- ‘भूतव्याधि है।’ कोई कहता- ‘किसी डाकिनी-शाकिनी का प्रकोप है।’ कोई-कोई उपेक्षा की दृष्टि से कहता- ‘अजी, बहुत बकवाद का यही तो फल होता है, दिनभर शास्त्रार्थ करके विद्यार्थियों के साथ मगजपच्ची करके तथा लोगों को छेड़कर बका ही तो करते थे। इन्हें कभी किसी ने चुपचाप तो देखा ही नहीं था। उसी का यह फल है, पागलपन है। मस्तिष्क का विकार है। गर्मी बढ़ गयी है और कुछ नहीं है।’
चिकित्सकों ने वायुरोग स्थिर किया। समाचार पाकर बुद्धिमन्त खाँ और मुकुन्द संजय- ये सभी धनी-मानी सज्जन वैद्यों को साथ लेकर निमाई के घर दौड़े आये। सभी घबड़ा गये। ये लोग बड़े-बड़े धनिक थे। नाना प्रकार की मूल्यवान ओषधियाँ इनके यहाँ रहती थीं। वैद्यों की सम्मतिसे विष्णुतैल, नारायणतैल आदि सुगन्धित और मूल्यवान तैल इनके सिर में मले जाने लगे। इनके सिर को तैल में डुबाया गया और भी भाँति-भाँति के उपचार किये जाने लगे। इस प्रकार कई दिनों में धीरे-धीरे ये स्वस्थ हुए। यह देखकर इनके प्रेमियों को परम प्रसन्नता हुई। धीरे-धीरे ये फिर पूर्व की भाँति अपनी पाठशाला में जाकर अध्यापन का कार्य करने लगे।
अब इनके स्वभाव में बहुत कुछ परिवर्तन हो गया। अब ये पहले की भाँति लोगों से छेड़खानी नहीं करते थे। इनमें बहुत कुछ गम्भीरता आ गयी। वैष्णवों की हँसी करना इन्होंने एकदम छोड़ दिया। इन्हें स्वस्थ देखकर लोग कहते- ‘भगवान की बड़ी कृपा हुई आप स्वस्थ हो गये। यह शरीर नश्वर और क्षणभंगुर है, अब कुछ कृष्णकीर्तन भी करना चाहिये। आयु को इसी तरह बिता देना ठीक नहीं।’ ये हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करते और उनकी बात को स्वीकार करते। लोगों को- विशेषकर वैष्णवों को इनके इस स्वभाव- परिवर्तन से परम प्रसन्नता हुई। अब ये नियमितरूप से भगवान की पूजा और तुलसी पूजन आदि कार्यों को करने लगे।
सन्ध्या-पूजा करके ये पढ़ाने के लिये जाते और सभी विद्यार्थियों के सदाचार के ऊपर अत्यधिक ध्यान रखते। जिस विद्यार्थी के मस्तक पर तिलक नहीं देखते उसे ही बुलाकर कहते- ‘आज तिलक क्यों नहीं धारण किया है?’ फिर सबको सुनाकर कहते- ‘जिसके मस्तक पर तिलक नहीं, समझ लो आज वह बिना ही सन्ध्या-वन्दन किये चला आया है।’ इस प्रकार जिसे भी तिलकहीन देखते उसे ही कहते- ‘पहले घर जाकर सन्ध्या-वन्दन करके तिलक धारण कर आओ, तब आकर पाठ पढ़ना।’ फिर आप समझाने लगते- ‘देखो भाई! सन्ध्या ही तो द्विजातियों का सर्वस्व है।
जो ब्राह्मण सन्ध्या-वन्दन तक नहीं करता उसे ब्राह्मण कह ही कौन सकता है? फिर वह पारमार्थिक उन्नति तो बहुत दूर रही, इहलौकिक उन्नति भी नहीं कर सकता। कहा भी है-
विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या
वेदाः शाखाः धर्मकर्मादि पत्रम्।
तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं
छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम्।।
ब्राह्मणरूपी वृक्ष की सन्ध्या ही जड़ है। वेद ही उस वृक्ष की बड़ी-बड़ी चार शाखाएँ हैं और धर्म- कर्मादि ही उस वृक्ष के सुन्दर-सुन्दर पत्ते हैं, इसलिये खूब सावधानी के साथ जल आदि देकर जड़की ही सेवा करनी चाहिये, क्योंकि जड़ के नष्ट हो जाने पर न तो शाखा ही रह सकती है और न पत्ते ही।’ आप कहते- ‘जो साठ घड़ी के दिन-रात्रि में से दो घड़ी सन्ध्या के लिये नहीं निकाल सकता वह आगे उन्नति ही क्या कर सकता है?’ इनके इस कथन का विद्यार्थियों के ऊपर बड़ा ही प्रभाव पड़ता और वे सभी यथासमय उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर सन्ध्या-वन्दनादि करके तब पाठ पढ़ने आते। इन सभी बातों से विद्यार्थी इनके ऊपर बड़ा ही अनुराग रखने लगे और ये भी उन्हें प्राणों से भी अधिक प्यार करने लगे।
ये भाव इनके हृदय में भक्ति-भागीरथी के स्त्रोत उमड़ने के पूर्व के सूत्रपातमात्र ही हैं। निमाई के हृदय में भक्ति के स्त्रोत का उदय तो श्रीगयाधाम में श्रीविष्णु भगवान के पादपद्मों के दर्शन से ही होगा। वहीं से भक्ति-भागीरथी का प्रवाह नवद्वीप आदि पुण्यस्थानों में होर अपनी द्रुतगति से समस्त प्राणियों को पावन करता हुआ श्रीनीलाचल के महासागर में एकरूप हो जायगा। यह बात नहीं कि नीलाचन में जाकर प्रेमपयोधि में मिलने पर उस त्रितापहारी प्रेमपीयूषपूर्ण पावन प्रवाह की परिसमाप्ति हो जायगी।
क्रमशः
Comments
Post a Comment