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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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महाप्रभु चैतन्यदेव का जीवन तो भक्तिमार्ग का एक प्रधान स्तम्भ है।
उनके जीवन में शुद्ध भक्ति का परम पवित्र स्वरूप है, उसमें पक्षपात का लेश नहीं, दूसरे मार्ग के प्रति विद्वेष नहीं। किसी भी कर्म की उपेक्षा नहीं। संकुचित भावों की गन्ध नहीं। वहाँ तो शुद्ध प्रेम है! ज्यों-ज्यों आगे बढ़ना चाहो त्यों-ही-त्यों अधिकाधिक प्रेम करो, यही शिक्षा उसमें ओत-प्रोतरूप से भरी पड़ी है। उनका नाम लेकर आज जो बातें कही जाती हैं, वे चैतन्यदेव की कभी हो ही नहीं सकतीं। इसका साक्षी उनका प्रेममय जीवन ही है। ये साम्प्रदायिक विचार तो पीछे के संकुचित बुद्धि वाले लोगों के मस्तिष्क से निकले हैं। अपनी चीज का नाम कोई जो चाहे रख ले। कोई रोकने वाला थोड़े ही है। चैतन्य का जीवन तो परम प्रेममय, सभी को आश्रय देने वाला परम महान है, उसमें भला साम्प्रदायिक संकुचित भावों का क्या काम? इनके हृदय में प्राणिमात्र के भावों का आदर था।
निमाई पण्डित का अब दूसरा विवाह हो गया है। विष्णुप्रिया उनके सब प्रकार से अनुकूल आचरण करती हैं। उनका स्वभाव हँसमुख है, वे सुशीला हैं, गृहकार्यों में चतुर हैं और अत्यन्त ही पतिपरायणा हैं, वे अपने पति को ही सर्वस्व समझती हैं। यह सब होते हुए भी निमाई का चित्त अब उदास ही रहता है। पता नहीं क्यों? अब उनकी वह चपलता न जाने कहाँ चली गयी? घंटों एकान्त में न जाने क्या सोचा करते हैं? अब उन्हें संसारी बातों से अनुराग नहीं है। अब उनका हृदय किसी विशेष वस्तु के लिये छटपटाता-सा दिखायी पड़ता है। अब वे अपने में किसी एक विशेष अभाव का-सा अनुभव करने लगे हैं। इस बात से उनके सभी स्नेही चिन्तित रहते हैं।जब हृदय में किसी प्रबल भाव का आगमन होने को होता है, तो उसके पूर्व हृदय एक प्रकार के अभाव का अनुभव करने लगता है। जी चाहता है कहीं चलकर अपनी प्रिय वस्तु को ले आवें। ऐसी ही दशा में लोग तीर्थों में जाते हैं। तीर्थों में अच्छे-अच्छे धार्मिक लोगों के सत्संग का सुयोग प्राप्त होता है, विरक्त साधु-महात्माओं के दर्शन होते हैं। उनके सत्संग तथा सदुपदेश से हृदय में एक प्रकार की शान्ति होती है। इसलिये निमाई की भी इच्छा तीर्थ-भ्रमण करने की हुई।
बंगाल में सकामकर्मों की प्रधानता है, वहाँ के बहुत ही कम मनुष्य निष्कामकर्म का महत्त्व जानते हैं। अधिकांश लोग किसी-न-किसी कामना से ही सम्पूर्ण धार्मिक कार्यों को करते हैं। सकामकर्मों में पितृश्राद्ध को बहुत महत्त्व दिया गया है। स्मृतियों में तो पितृकर्मों से भी देवकर्मों की अधिक महत्ता दी गयी है। गृहस्थियों के लिये पितृकर्म ही मुख्य बताये गये हैं। पितृकर्मों में गयाधाम में जाकर पितरों के श्राद्ध करने का बहुत भारी माहात्म्य वर्णन किया गया है, इसलिये प्रतिवर्ष बंगाल से लाखों मनुष्य गया जी में पितृश्राद्ध करने आते हैं। दूसरे प्रान्तों से भी बहुत बड़ी संख्या में यात्री गया जी पितृश्राद्ध करने आते हैं, किन्तु बंगाल में इसका प्रचार अन्य प्रान्तों की अपेक्षा विशेष है। अबकी बार अन्य लोगों के साथ निमाई पण्डित ने भी गया में जाकर अपने पिता का श्राद्ध कर आने का विचार किया। किन्तु इनके विचार में अन्य लोगों की भाँति सकाम भावना नहीं थी, ये तो अपने अभाव को दूर करने और धार्मिक लोगों के भावों का आदर करने के निमित्त ही गया जी जाना चाहते थे।
श्रीगयाधाम की यात्रा...
आश्विन शुक्ला दशमी का दिवस है। आज के ही दिन भगवान श्रीरामचन्द्रजी ने लंका पर विजय प्राप्त करने के लिये चढ़ाई की थी। घर-घर आनन्द मनाया जा रहा है। आज के ही दिन वर्षाकाल की परिसमाप्ति समझी जाती है। व्यापारी आज के ही दिन वाणिज्य के निमित्त विदेशों की यात्रा करते हैं। नृपतिगण आज के ही दिन दूसरे देशों को दिग्विजय करने के निमित्त अपनी-अपनी सेनाओं को सजाकर राज्य-सीमा से बाहर होते हैं। चार महीने एक ही स्थान पर रहने वाले परिव्राजक आज के ही दिन फिर से भ्रमण करना आरम्भ कर देते हैं। तीर्थयात्रा करने वाले भी आज के ही दिन यात्रा के लिये प्रस्थान करते हैं। अब के नवद्वीप से भी बहुत-से यात्री गयाधाम की यात्रा करने जा रहे थे। गौरांग के मौसा पं. चन्द्रशेखर भी गया को जाना चाहते थे, उन्होंने अपनी इच्छा निमाई को जतायी। सुनते ही इन्होंने बड़ी प्रसन्नता प्रकट की। माता की आज्ञा लेकर इन्होंने भी अपने कुछ स्नेही तथा छात्रों के साथ गया जी की यात्रा का निश्चय किया सब सामान जुटाकर अन्य लोगों को साथ लेकर ये गयाधाम के लिये चल पड़े।
इस प्रकार ये अपने सभी साथियों के साथ आनन्द मनाते ओर प्रेम में श्रीकृष्ण-कीर्तन करते हुए मन्दार नामक स्थान में पहुँचे। इन स्थान में पहुँचकर इन्हें बड़े जोरों से ज्वर आ गया। इनके साथी इनकी ऐसी दशा देखकर बहुत अधिक चिन्तित हुए और भाँति-भाँति के उपचार करने लगे, किन्तु इन्हें किसी प्रकार भी लाभ नहीं हुआ। अन्त में इन्होंने अपनी ओषधि अपने-आप ही बतायी। इन्होंने कहा- ‘मेरी व्याधि इन प्राकृतिक ओषधियों से न जायगी।यह रोग तो असाध्य है, इसकी एकमात्र ओषधि है भगवत्कृपा! भगवान की प्रसन्नता का सर्वश्रेष्ठ साधन है ब्राह्मणों की अर्चा-पूजा। श्रीमद्भागवत में भगवान ने अग्नि और ब्राह्मण अपने दो ही मुख बताये हैं, उनमें ब्राह्मण को ही सर्वोत्तम सुख बताया है। वे अपने श्रीमुख से ही सनकादि महर्षियों की स्तुति करते हुए कहते हैं-
नाहं तथाग्नि यजमानहविर्विताने
श्च्योतद्घृतप्लुतमदन् हुतभुड्मुखेन।
यद् ब्रह्मणस्य मुखतश्चरतोऽनुघासं
तुष्टस्य मय्यवहितैर्निजकर्मपाकैः।।
अर्थात भगवान कहते हैं ‘मेरे अग्नि और ब्राह्मण ये दो मुख हैं, इनमें ब्राह्मण ही मेरा श्रेष्ठ मुख है, जिन्होंने अपने सम्पूर्ण कर्मों को मेरे ही अर्पण कर दिया है और जो सदा सन्तुष्ट ही रहते हैं, ऐसा ब्राह्मण जो टपकते हुए घृत से व्याप्त सुस्वादु अन्न के व्यंजनों को खाता है, उसके प्रत्येक ग्रास के साथ मैं ही उस अन्न के रस का आस्वादन करता हूँ। उस ब्राह्मण की तृप्ति से जितना मैं तुष्ट होता हूँ, उतना यज्ञ में अग्निद्वारा, यजमान के अर्पण किये हुए कवि आदि से नहीं होता।’ ‘जिन ब्राह्मणों की ऐसी महिमा साक्षात भगवान ने अपने श्रीमुख से वर्णन की है, उन्हीं का पादोदक पान करने से मेरा यह रोग शमन हो सकेगा।’
क्रमशः
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