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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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दाल-साग बनकर तैयार हो चुके थे। चूल्हे में से थोड़ी अग्नि निकालकर दाल को उस पर रख दिया था। साग दूसरी ओर चौके में ही रखा था। चूल्हे पर भात बन रहा था। निमाई उसे बार-बार देखते। चावल तैयार तो हो चुके थे, किन्तु उनमें थोड़ा-सा जल और शेष था, उसे जलाने के लिये और भात केा शुष्क बनाने के लिये हमारे पण्डित ने उसे ढक दिया था। थोड़ी देर बाद वे कटोरी को भात पर से उतार ही रहे थे कि इतने में ही उन्हें दूर से पुरी महाशय अपनी ओर आते हुए दिखायी दिये। कटोरी को ज्यों-की-त्यों ही पृथ्वी पर पटककर ये उनकी चरण-वन्दना करने के लिये दौड़े। पुरी ने प्रेमपूर्वक इनका आलिंगन किया और वे हँसते हुए बोले- ‘अपने स्थान से किसी शुभ मुहूर्त में ही चले थे, जो ठीक तैयारी के समय पर आ पहुँचे।’
नम्रता के साथ निमाई पण्डित ने उत्तर दिया- ‘जिस समय भाग्योदय होता है और पुण्य-कर्मों के संस्कार जागृत होते हैं, उस समय आप-जैसे महानुभावों के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है। भोजन बिलकुल तैयार है, हाथ-पैर धोइये ओर भिक्षा प्रेम-स्त्रोत उमड़ पड़ाकरने की कृपा कीजिये।’
हँसते हुए पुरी महाशय बोले- ‘यह खूब कही, अपने लिये बनाये हुए अन्न को हमें ही खिला दोगे, तब तुम क्या खाओगे?’ नम्रता के साथ नीची निगाह करके इन्होंने उत्तर दिया- ‘अन्न तो आप ही का है, मैं तो केवल रन्धन करने वाला पाचकमात्र हूँ, आज्ञा होगी तो और बना दूँगा।’ पुरी ने देखा ये भिक्षा बिना कराये मानेंगे नहीं। इसलिये बोले- ‘अच्छा, फिर से बनाने की क्या आवश्यकता है, जो बना है उसी में से आधा-आधा बाँटकर खा लेंगे। क्यों मंजूर है न? किन्तु हम ठहरे संन्यासी और तुम ठहरे गृहस्थी। हमारी भिक्षा होगी और तुम्हारा होगा भोजन। इस प्रकार कैसे काम चलेगा? तुम भी थोड़ी देर के लिये भिक्षा ही कर लेना।’
कुछ हँसते हुए निमाई पण्डित ने कहा- ‘अच्छा, जैसी आज्ञा होगी, वही होगा। आप पहले हाथ-पैर तो धावें।’ यह कह इन्होंने अपने हाथों से पुरी जी के पैर धोये और उन्हें एक सुन्दर आसन पर बिठाया। पुरी महाशय बैठकर भोजन करने लगे। जब निमाई-जैसे प्रेमावतार परोसने वाले हों, तब भला फिर किसी तृप्ति हो सकती है, धीरे-धीरे इन्होंने आग्रह कर-करके सभी सामान पुरी महाशय को परोस दिया और वे भी प्रेम के वशीभूत होकर सारा खा गये। अग्नि तो जल ही रही थी, क्षणभर में ही दूसरी बार भी भोजन तैयार हो गया मानो अन्नपूर्ण ने आकर स्वयं ही भोजन तैयार कर दिया हो। भोजन तैयार होने पर इन्होंने भी भोजन किया और फिर परस्पर बातें होने लगीं।
हाथ जोड़े हुए निमाई पण्डित ने कहा- ‘भगवन! अब तो हमें बहुत दिन इस ब्राह्यवृत्ति के जीवन को बिताते हुए हो गये, अब हमें अपने चरणों की शरण प्रदान कीजिये। कृपा करके थोड़ी-बहुत श्रीकृष्णभक्ति हमें भी दीजिये।’
इनकी बात का उत्तर देते हुए पुरी महाशय ने कहा- ‘आप तो स्वयं ही श्रीकृष्ण-स्वरूप हैं, आपको भला भक्ति कौन प्रदान कर सकता है? आप स्वयं ही सम्पूर्णज्ञ संसार को प्रेम-प्रदान कर सकते हैं।’ दीनता के साथ इन्होंने कहा- ‘प्रभो! मेरी वंचना न कीजिये। मेरी प्रार्थना स्वीकृत कीजिये और मुझे श्रीकृष्ण-मन्त्र प्रदान कर दीजिये।’ पुरी ने सरलता के साथ कहा- ‘आप श्रीकृष्ण-मन्त्र प्रदान करने को ही कहते हैं, हम आपके कहने पर अपने प्राण प्रदान कर सकते हैं, किन्तु हममें इतनी योग्यता हो तब तो? हम स्वयं अधम हैं।प्रेम का रहस्य हम स्वयं नहीं जानते फिर आप-जैसे कुलीन और विद्वान ब्राह्मण को हम मन्त्र प्रदान कैसे कर सकेंगे?’ बड़ी सरलता के साथ आँखों में आँसू भरे हुए इन्होंने उत्तर दिया- ‘आप सर्वसामर्थ्यवान हैं, आप स्वयं ईश्वर हैं। आपका श्रीविग्रह ही प्रेम की सजीव मूर्ति है। आप चाहें तो संसार भर को प्रेम-पीयूष में प्लावित कर सकते हैं।’ कुछ विवशता दिखाते हुए पुरी ने कहा- ‘संसार को प्रेम-पीयूष के पुण्य-पयोधि में परिप्लावित करने की एकमात्र शक्ति तो आप में ही है, किन्तु आप अपने गुरुपद के गुरुतर गौरव का सौभाग्य मुझे ही प्रदान करना चाहते हैं, तो मैं विवस हूँ। आपकी आज्ञा को टाल ही कौन प्रेम-स्त्रोत उमड़ पड़ा सकता है। जैसी आपकी आज्ञा होगी, उसी प्रकार मैं करने के लिये तैयार हूँ।’ इतना कहकर पुरी महाशय मन्त्र-दीक्षा देने के लिये तैयार हो गये। उसी समय पत्रा देखकर दीक्षा की शुभ तिथि निश्चित की गयी। नियत तिथि आ गयी।
निमाई पण्डित नवीन उल्लास और आनन्द के साथ मन्त्र-दीक्षा लेने के लिये तैयार हो गये। इनके सभी साथियों ने उस दिन दीक्षोत्सव के उपलक्ष्य में खूब तैयारियाँ की थीं। नियत समय पर पुरी महाशय आ गये। उनकी पद-धूलि इन्होंने मस्तक पर चढ़ाई और स्वस्त्ययन के पुण्य-श्लोक पढ़कर और भगवान के मधुर-मंजुल नामों का संकीर्तन करने के अनन्तर पुरी महाशय ने इनके कान में ‘गोपीजनवल्लभाय नमः’ इस दशाक्षरमन्त्र का उपदेश कर दिया। मन्त्र के श्रवणमात्र से ही ये मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े और इन्हें अपने शरीर का बिलकुल ही होश नहीं रहा। साथियों ने भाँति-भाँति के उपचार करके इन्हें सावधान किया। बहुत देर के अनन्तर इन्हें कुछ होश हुआ। तब तो इनकी विचित्र ही दशा हो गयी। कभी तो खूब जोरों के साथ हँसते, कभी रोते और कभी ‘हा कृष्ण! हा पिता!’ ऐसा कहकर जोरों से रुदन करते। कभी यह कहते हुए कि ‘मैं तो श्रीकृष्ण के पास व्रज में जाऊँगा’ व्रज की ओर भागते। इनके साथी इन्हें पकड़-पकड़कर लाते, किन्तु ये पागलों की भाँति उनसे अपने शरीर को छुड़ा-छुड़ाकर भागते। कभी फिर उसी भाँति जोरों से प्रलाप करने लगते। रोते-रोते कहते- ‘प्यारे! मुझे छोड़कर तुम कहाँ चले गये? मेरे कृष्ण! मुझे अपने साथ ही ले चलो।’ इतना कहकर फिर जोरों से रोने लगते।कभी रोते-रोते अपने विद्यार्थियों तथा साथियों से कहते- ‘भैया! तुम लोग अब अपने-अपने घर जाओ। अब हम लौटकर घर नहीं जायँगे, हम तो अब श्रीकृष्ण के पास वृन्दावन में ही जाकर रहेंगे। हमारी माता को हमारा हाथ जोड़कर प्रणाम कहना और कह देना तेरा निमाई तो पागल हो गया है।’
क्रमशः
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