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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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वे आनन्द के धाम हैं, सुखस्वरूप हैं। उनके गुणों का आर्त होकर गान करते रहना मनुष्यों का परम पुरुषार्थ है।’ इतना कहते-कहते प्रभु उच्च स्वर से कृष्ण-कीर्तन करने लगे।
इन बातों को श्रवण करके कुछ विद्यार्थी तो आनन्द-सागर में मग्न हो गये। वे तो बाह्यज्ञान-शून्य होकर परमानन्द का अनुभव करने लगे। कुछ ऐसे भी थे, जो पुस्तक की विद्या को ही सर्वस्व समझते थे। भट्टाचार्य और शास्त्री बनना ही जिनके जीवन का एकमात्र चरम लक्ष्य था, वे कहने लगे- ‘गुरु जी! आप कैसी बातें कर रहे हैं? हमें इन बातों से क्या प्रयोजन? इन बातों का विचार तो वैष्णव भक्त करें। हमें तो हमारी पाठ्य पुस्तक का पाठ पढ़ाइये। हम यहाँ पाठशाला में भक्ति-तत्त्व की शिक्षा लेने के लिये नहीं आये हैं, हमें तो व्याकरण, अलंकार तथा न्याय आदि पुस्तकों के पाठों को पढ़ाइये।’
उन विद्यार्थियों की ऐसी बातें सुनकर प्रभु ने कहा- ‘भाई! आज हमारी प्रकृति स्वस्थ नहीं है। आज आप लोग अपना-अपना पाठ बंद रखिये, पुस्तकों को बाँधकर रख दीजिये। चलो, अब गंगा-स्नान करने चलें। कल पाठ की बात देखी जायगी।’ इतना सुनते ही सभी विद्यार्थियों ने अपनी-अपने पुस्तकें बाँध दीं और वे प्रभु के साथ गंगा-स्नान के निमित्त चल दिये। गंगा जी पर पहुँचकर बहुत देर तक जल-विहार होता रहा। रात्रि हो जाने पर प्रभु लौटकर घर आये और विद्यार्थी अपने-अपने स्थानों को चले गये। दूसरे दिन महाप्रभु फिर पाठशाला में पहुँचे। प्रभु के आसनासीन हो जाने पर विद्यार्थियों ने अपनी-अपनी पुस्तकों में से प्रश्न पूछना आरम्भ कर दिया। कोई भी विद्यार्थी इनसे कैसा भी प्रश्न पूछता उसका ये श्रीकृष्णपरक ही उत्तर देते।
कोई विद्यार्थी पूछता- ‘सिद्धवर्णसमाम्नाय बताइये?’ आप उत्तर देते- ‘नारायण ही सब वर्णों में सिद्ध वर्ण हैं।’ कोई पूछता- ‘वर्णों की सिद्धि किस प्रकार से होती है?’
प्रभु कहते- ‘ठीक बात तो यही है, प्रतिक्षण श्रीकृष्ण-नाम का ही संकीर्तन करते रहना चाहिये।’
यह सुनकर सभी विद्यार्थी एक-दूसरे के मुख की ओर देखने लगते। कोई तो यकित होकर प्रभु के श्रीमुख की ओर देखने लगता। कोई-कोई धीरे से कह देता ‘दिमाग में गर्मी चढ़ गयी है।’ दूसरा उसे धीरे से धक्का देकर ऐसा कहने के लिये निषेध करता।
प्रभु की ऐसी अद्भुत व्याख्याएँ सुनकर बड़े-बड़े विद्यार्थी कहने लगे- ‘आप ये तो न जाने कहाँ की व्याख्या कर रहे हैं, शास्त्रीय व्याख्या कीजिये।’
प्रभु इसका उत्तर देते- ‘मैं शास्त्रों का सार ही बता रहा हूँ। किसी भी पण्डित से जाकर पूछ आओ, वह सर्वशास्त्रों का सार श्रीकृष्ण-पद-प्राप्ति ही बतायेगा।’
विद्यार्थी बेचारे इनकी अलौकिक बातों का उत्तर दे ही क्या सकते थे? सब अपनी-अपनी पुस्तकें बाँधकर अपने-अपने स्थान के लिये चले गये। कुछ समझदार और बड़े छात्र पण्डित गंगादास जी की सेवा में पहुँचे।
वे प्रणाम करके उनके समीप बैठ गये। कुशल-प्रश्न के अनन्तर आचार्य गंगादास ने उनके आने का कारण पूछा। दुःखी होकर उन लोगों ने कहा- ‘महाराज जी! हम क्या बतावें, हमारे गुरुजी जब से गया से लौटे हैं, तभी से उनकी विचित्र दशा है। वे कभी हँसते हैं, कभी राते हैं। पाठशाला में आते तो पाठ पढ़ाने के लिये हैं, किन्तु पाठ न पढ़ाकर भक्ति-तत्त्व का ही उपदेश देने लगते हैं। हम लोग व्याकरण, न्याय, अलंकार तथा साहित्य आदि किसी भी शास्त्र का प्रश्न करते हैं, तो वे उसका कृष्णपरक ही उत्तर देते हैं। उनसे जो भी प्रश्न किया जाय उसी का उत्तर ऐसा देते हैं जो पाठ्य पुस्तक के एकदम विरुद्ध है। कभी-कभी पढ़ाते-पढ़ाते रोने लगते हैं और कभी-कभी जोर से ‘हा कृष्ण! हा प्यारे! प्राणवल्लभ! पाहि माम, राधावल्लभ! रक्ष माम्’ इन वाक्यों को कहने लगते हैं। अब आप ही बताइये, इस प्रकार हमारी पढ़ाई कैसे होगी? हम लोग घर-बार छोड़कर केवल विद्याध्ययन के ही निमित्त यहाँ पड़े हुए हैं, यहाँ पर हमारी पढ़ाई-लिखाई कुछ होती नहीं। उलटे पढ़े-लिखे को भूले जाते हैं। वे आपके शिष्य हैं, आप उन्हें बुलाकर समझा दें।’
पं. गंगादास जी वैसे तो बड़े भारी नामी विद्वान थे, किन्तु उनकी विद्या पुस्तकी ही विद्या थी। भक्ति-भाव से वे एकदम कोरे थे। ईश्वर के प्रति उनका उदासीन भाव था। ‘यदि ईश्वर होगा भी तो हुआ करे हमें उससे क्या काम, समय पर भोजन कर लिया, विद्यार्थियों को पाठ पढ़ा दिया। बस, यही हमारे जीवन का व्यापार है। इसमें ईश्वर की कुछ जरूरत ही नहीं।’ कुछ-कुछ इसी प्रकार के उनके विचार थे।महाप्रभु के भक्त हो जाने की बात सुनकर वे ठहाका मारकर हँसने लगे और विद्यार्थियों से कहने लगे- ‘हाँ, सुना तो मैंने भी है कि निमाई अब भक्त बन आया है। पण्डित होकर उस पर यह क्या भूत सवार हो गया- यह तो अनपढ़ मूर्खों का काम है। ब्राह्मण पण्डित को तो निरन्तर शास्त्रों के अध्ययन-अध्यापन में ही लगे रहना चाहिये। खैर, अब तुम लोग अपने-अपने स्थानों को जाओ। कल उसे मेरे पास भेज देना, मैं उसे समझा दूँगा। मेरी बात को वह कभी नहीं टालता है।’ इतना सुनकर विद्यार्थी अपने-अपने स्थानों पर चले गये।
दूसरे दिन प्रभु से विद्यार्थियों ने कहा- ‘आचार्य जी ने आज आपको अपने यहाँ बुलाया है, आगे आपकी इच्छा है, आज जाइये या फिर किसी दिन हो आइये।’ आचार्य गंगादास जी का बुलावा सुनकर प्रभु उसी समय दो-चार विद्यार्थियों को साथ लेकर उनके स्थान पर पहुँचे। वहाँ जाकर प्रभु ने अपने विद्यागुरु के चरणों की वन्दना की, गंगादास जी ने भी उनका पुत्र की भाँति आलिंगन किया और बैठने के लिये एक आसन की ओर संकेत किया। आचार्य की आज्ञा पाकर उनके बताये हुए आसन पर प्रभु बैठ गये। प्रभु के बैठ जाने पर साथ के विद्यार्थी भी पीछे एक ओर हटकर पाठशाला की बिछी हुई चटाइयों पर बैठ गये।प्रभु के सुखपूर्वक बैठ जाने पर वात्सल्य-प्रेम प्रकट करते हुए आचार्य गंगादास जी ने कहा- ‘निमाई! तुम मेरे प्रिय विद्यार्थी हो, मैं तुम्हें पुत्र की भाँति प्यार करता हूँ। शास्त्रों में कहा है, अपने प्यारे की उसके मुख पर बड़ाई न करनी चाहिये, क्योंकि ऐसा करने से उसकी आयु क्षीण होती है, किन्तु यथार्थ बात तो कही ही जाती है। तुमने मेरी पाठशाला के नाम को सार्थक बना दिया है।
क्रमशः
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