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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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तुम जैसे योग्य विद्यार्थियों को विद्या पढ़ाकर मेरा इतना दिनों का परिश्रम से पढ़ाना सफल हो गया। तुमने अपने प्रकाण्ड पाण्डित्य द्वारा मेरे मुख को उज्ज्वल कर दिया। मैं तुमसे बहुत ही प्रसन्न हूँ।’
आचार्य के मुख से अपनी इतनी प्रशंसा सुनकर प्रभु लज्जितभाव से नीचे की ओर देखते हुए चुपचाप बैठे रहे, उन्हेांने इन बातों का कुछ भी उत्तर नहीं दिया।

आचार्य गंगादास जी फिर कहने लगे- ‘योग्य बनने के अनन्तर तुम अध्यापक हुए और तुमने अध्यापन-कार्य में भी यथेष्ठ ख्याति प्राप्त की। तुम्हारे सभी विद्यार्थी सदा तुम्हारे शील-स्वभाव की तथा पढ़ाने की सरल सुन्दर प्रणाली की प्रशंसा करते रहते हैं, वे लोग तुम्हारे सिवा दूसरे किसी के पास पढ़ना पसंद ही नहीं करते। किन्तु कल उन्होंने आकर मुझसे तुम्हारी शिकायत की है। तुम उन्हें अब मनोयोग के साथ ठीक-ठीक नहीं पढ़ाते हो। और लोगों ने भी मुझसे आकर कहा है कि तुम अनपढ़ मूर्खभक्तों की भाँति रोते-गाते तथा हँसते-कूदते हो, एक इतने भारी अध्यापक को ऐसी बातें शोभा नहीं देतीं! तुम विद्वान हो, समझदार हो, मेधावी हो।शास्त्रज्ञ होकर मूर्खों के कामों की नकल क्यों करने लगे हो? ऐसे ढोंग तो वे ही लोग बनाते हैं, जो शास्त्रों की बातें तो जानते नहीं, विद्या-बुद्धि से तो ही हैं, किन्तु मूर्खों में अपने को पुजवाना चाहते हैं, वे ही ऐसे ढोंग रचा करते हैं। तुम्हें इसकी क्या जरूरत है? तुम तो स्वयं विद्वान हो, बड़े-बड़े लोग तुम्हारी विद्या-बुद्धि पर ही मुग्ध होकर मुक्तकण्ठ से तुम्हारी प्रशंसा करते हैं और सर्वत्र तुम्हारी प्रतिष्ठा करते हैं, फिर तुम ऐसे अशास्त्रीय आचरणों को क्यों करते हो? ठीक-ठीक बताओ क्या बात है?’
ये सब बातें सुनकर भी प्रभु चुप ही रहे, उन्होंने किसी भी बात का कुछ भी उत्तर नहीं दिया।
गंगादास जी ने अपना व्याख्यान समाप्त नहीं किया। वे फिर कहने लगे- ‘तुम्हारे नाना नीलाम्बर चक्रवर्ती एक नामी पण्डित हैं। तुम्हारे पूज्य पिता भी प्रतिष्ठित पण्डित थे, तुम्हारे मातृकुल तथा पितृकुल में सनातन से पाण्डित्य चला आया है, तुम स्वयं भारी विद्वान हो, तुम्हारी विद्या-बुद्धि से ही मुग्ध होकर सनातन मिश्र-जैसे राजपण्डित ने अपनी पुत्री का तुम्हारे साथ विवाह किया है। नवद्वीप की विद्वन्मण्डली तुम्हारा यथेष्ठ सम्मान करती है, विद्यार्थियों को तुम्हारे प्रति पूर्ण सम्मान के भाव हैं, फिर तुम मूर्खों के चक्कर में केसे आ गये? देखो बेटा! अध्यापक का पद पूर्वजन्म के बहुत बड़े भाग्यों से मिलता है। तुम उसके काम में असावधानी करते हो, यह ठीक नहीं है। बोलो, उत्तर क्यों नहीं देते? अब अच्छी तरह से पढ़ाया करोगे?’ नम्रता के साथ महाप्रभु ने कहा- ‘आपकी आज्ञापान करने की भरसक चेष्टा करूँगा। क्या करूँ, मेरा मन मेरे वश में नहीं है। कहना चाहता हूँ कुछ और मुँह से निकल जाता है कुछ और ही!’ गंगादास जी ने प्रेम के साथ कहा- ‘सब ठीक हो जायगा। चित्त को ठीक रखना चाहिये। तुम तो समझदार आदमी हो। मन को वश में करो, सोच-समझकर बात का उत्तर दो। कल से खूब सावधानी रखना। विद्यार्थियों को खूब मनोयोग के साथ पढ़ाना। अच्छा!’
‘जो आज्ञा’ कहकर प्रभु ने आचार्य गंगादास को प्रणाम किया और वे विद्यार्थियों के साथ उनसे विदा हुए।

सर्वप्रथम संकीर्तन और अध्यापकी का अन्त....

जिन नयनों में प्रियतम की छबि समा गयी, जिस हृदय-मन्दिर में श्रीकृष्ण की परमोज्ज्वल परम प्रकाशयुक्त मूर्ति स्थापित हो गयी, फिर भला उसमें दूसरे के लिये स्थान कहाँ? जिनका मन-मधुप श्रीकृष्ण-कथारूपी मकरन्द का पान कर चुका है, जिनके चित्त को चितचोर ने अपनी चंचल चितवन से अपनी ओर आकर्षित कर लिया है, वे फिर अन्य वस्तु की ओर आँख उठाकर भी नहीं देख सकते। उनकी जिह्वा सदा नारायणख्यपीयूष का ही निरन्तर पान करती रहेगी, उसके द्वारा संसारी बातें कही ही नहीं जा सकेंगी। उन्हीं कर्मों को वह कर्म समझेगा जिनके द्वारा श्रीकृष्ण के कमनीय कीर्तन में प्रगाढ़ रति की प्राप्ति हो सके। उसकी विद्या, बुद्धि, वैभव और सम्पदा तथा मेधा सभी एकमात्र श्रीकृष्ण-कथा ही है।

महाप्रभु का चित्त अब इस लोक में नहीं रहा, वह तो कृष्णमय हो चुका। प्राण कृष्णरूप बन चुके, मन का उनके मनोहर गुणों के साथ तादात्म्य हो चुका, चित्त उस माखनचोर की चंचलता में समा गया। वाणी उसके गुणों की गुलाम बन गयी, अब वे करें भी तो क्या करें? संसारी कार्य करने के लिये मन, बुद्धि, चित्त, इन्द्रियाँ आदि कोई भी उनका साथ नहीं देतीं, वे दूसरे के वश में हो चुकीं। महाप्रभु की सभी चेष्टाएँ श्रीकृष्णमय ही होने लगीं।

आचार्य गंगादास जी की मधुर ओर वात्सल्यपूर्ण भर्त्सना के कारण वह खूब सावधान होकर घर से पढ़ाने के लिये चले। विद्यार्थियों ने अपने गुरुदेव को आते देखकर उनके चरणकमलों में साष्टांक प्रणाम किया और सभी सुख से बैठ गये। विद्यार्थियों का पाठ आरम्भ हुआ। किसी विद्यार्थी ने पूछा- ‘अमुक धातु का किस अर्थ में प्रयोग होता है और अमुक लकार में उसका कैसा रूप बनेगा?’

इस प्रश्न को सुनते ही आप भावावेश में आकर कहने लगे- ‘सभी धातुओं का एक श्रीकृष्ण के ही नाम में समावेश हो सकता है, शरीर में जो सप्तधातु हैं ओर भी संसार में जितनी धातु सुनी तथा कही जा सकती हैं सभी के आदिकारण श्रीकृष्ण ही हैं। उनके अतिरिक्त कोई अन्य धातु हो ही न हीं सकती। सभी स्थितियों में उनके समान ही रूप बनेंगे। भगवान का रूप नील-श्याम है, उनके श्रीविग्रह की कान्ति नवीन जलधर की भाँति एकदम स्वच्छ और हल के नीले रंग की-सी है। उसे वैडूर्य या घन की उपमा तो ‘शाखाचन्द्रन्याय’ से दी जाती है, असल में तो वह अनुपमेय है, किसी भी संसारी वस्तु के साथ उसकी उपमा नहीं दी जा सकती।’
प्रभु के ऐसे उत्तर को सुनकर विद्यार्थी कहने लगे- ‘आप तो फिर वैसी ही बातें कहने लगे। धातु का यथार्थ अर्थ बताइये। पुस्तक में जो लिखा है उसी के अनुसार कथन कीजिये!’
प्रभु ने अधीरता के साथ कहा- ‘धातु का यथार्थ अर्थ तो यही है, जो मैं कर रहा हूँ, इसके अतिरिक्त मैं और कुछ कह ही नहीं सकता। मुझे तो इसका वही अर्थ मालूम पड़ता है। आगे आप लोग जैसा समझें।’
क्रमशः

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