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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इस पर विद्यार्थियों ने कुछ प्रेम के साथ अपनी विवशता प्रकट करते हुए कहा- ‘आप तो हमें ऐसी विचित्र-विचित्र बातें बताते हैं, हम अब याद क्या करें? हमारा काम कैसे चलेगा, इस प्रकार हमारी विद्या कब समाप्त होगी और इस तरह से हम किस प्रकार विद्या प्राप्त कर सकते हैं?’
आप प्रेम के आवेश में आकर कहने लगे- ‘सदा याद करते रहने की तो एक ही वस्तु है। सदा, सर्वदा, सर्वत्र श्रीकृष्ण के सुन्दर नामों के ही स्मरणमात्र से प्राणिमात्र का कल्याण हो सकता है। सदा उसी का स्मरण करते रहना चाहिये। अहा, जिन्होंने पूतना- जैसी बालघ्नी को, जो अपने स्तनों में जहर पलेटकर बालकों के प्राण हर लेती थी, उस क्रूर कर्म करने वाली राक्षसी को भी सद्गति दी, उन श्रीकृष्ण की लीलाओं का चिन्तन करना ही मनुष्यों के लिये परम कल्याण का साधन हो सकता है। जो दुष्टबुद्धि से भी श्रीकृष्ण का स्मरण करते थे, जो उन्हें शत्रुरूप से विद्वेष के कारण मारने की इच्छा से उनके पास आये थे, वे अघासुर, बकासुर, शकटासुर आदि पापी भी उनके जगत-पालन दर्शनों के कारण इस संसार-सागर से बात-की-बात में पार हो गये, जिससे योगी लोग करोड़ों वर्ष तक समाधि लगाकर भाँति-भाँति के साधन करते रहने पर भी नहीं तर सकते, उन श्रीकृष्ण के चारू चरित्रों के अतिरिक्त चिन्तनीय चीज और हो ही क्या सकती है?’
’श्रीकृष्ण-कीर्तन से ही उद्धार होगा, श्रीकृष्ण-कीर्तन ही सर्वसिद्धिप्रद है, उसके द्वारा प्राणिमात्र का कल्याण हो सकता है। श्रीकृष्ण-कीर्तन ही शाश्वत शान्ति का एकमात्र उपाय है, उसी के द्वारा मनुष्य सभी प्रकार के दुःखों से परित्राण पा सकता है। तुम लोगों को उसी श्रीकृष्ण की शरण में जाना चाहिये।’
इनकी ऐसी व्याख्या सुनकर सभी विद्यार्थी श्रीकृष्णप्रेम में विभोर होकर रुदन करने लगे। वे सभी प्रकार के संसारी विषयों को भूल गये और श्रीकृष्ण को ही अपना आश्रय-स्थान समझकर उन्हीं की स्मृति में अश्रु-विमोचन करने लगे।उनमें से कुछ उतावले और पुस्तकी विद्या को ही परम साध्य समझने वाले छात्र कहने लगे- ‘हमें तो पुस्तक के अनुसार उसकी व्याख्या बताइये! उसे ही पढ़ने के लिये हम यहाँ आये हैं।’
प्रभु अब कुछ-कुछ स्वस्थ हुए थे। उन्हें अब थोड़ा-थोड़ा बाह्य-ज्ञान होने लगा। इसलिये विद्यार्थियों के ऐसा कहने पर आपने रोते-रोते उत्तर दिया- ‘भैया! हम क्या करें, हमारी प्रकृति स्वस्थ नहीं है। मालूम पड़ता है, हमें फिर से वही पुराना वायु-रोग हो गया है। हम क्या कह जाते हैं, इसका हमें स्वयं पता नहीं। अब हमसे इन ग्रन्थों का अध्यापन न हो सकेगा। आप लोग जाकर किसी दूसरे अध्यापक से पढ़ें! अब हम अपने वश में नहीं हैं।’
प्रभु के ऐसा कहने पर सभी विद्यार्थी फूट-फूटकर रोने लगे और विलाप करते हुए करूणकण्ठ से प्रार्थना करने लगे- ‘गुरुदेव! अब हम कहाँ जायँ? हम निराश्रयों के आप ही एकमात्र आश्रय हैं। हमें आपके समान वात्सल्य प्रेम दूसरे किस अध्यापक में मिल सकेगा? इतने प्रेम के साथ हमें अन्य अध्यापक पढ़ा ही नहीं सकता।
आपके समान सर्व संशयों का छेत्ता और सरलता के साथ सुन्दर शिक्षा देने वाला अध्यापक ढूँढ़ने पर भी हमें त्रिलोकी में नहीं मिल सकता। आप हमारा परित्याग न कीजिये। हम आपके रोग की यथाशक्ति चिकित्सा करावेंगे। स्वयं दिन-रात्रि सेवा-शुश्रूषा करते रहेंगे।’
उनकी आर्तवाणी सुनकर प्रभु की आँखों में से अश्रुओं की धारा बहने लगी। रोते-रोते उन्होंने कहा- भैया! तुम लोग हमारे बाह्य प्राणों के समान हो। तुमसे सम्बन्ध-विच्छेद करते हुए हमें स्वयं अपार दुःख हो रहा है, किन्तु हम करें क्या, हम तो विवश हैं। हमारी पढ़ाने की शक्ति ही नहीं। नहीं तो तुम्हारे-जैसे परम बन्धुओं के सहवास का सुख स्वेच्छापूर्वक कौन सत्पुरुष छोड़ सकता है?’
विद्यार्थियों ने दीनभाव से कहा- ‘आज न सही, स्वस्थ होने पर आप हमें पढ़ावें। हमारा परित्याग न कीजिये, यही हमारी श्रीचरणों में विनम्र प्रार्थना है। आप ही हमारी इस जीवन नौका के एकमात्र आश्रय हैं, हमें मझधार में ही बिलखता हुआ छोड़कर अन्तर्धान न हूजिये!’
प्रभु ने गद्गद कण्ठ से कहा- ‘भैया! मेरा यह रोग असाध्य है। अब इससे छुटकारा पाने की आशा नहीं। किसी दूसरे के सामने तो बताने की बात नहीं है, किन्तु तुम तो अपनी आत्मा ही हो, तुमसे छिपाने योग्य तो कोई बात हो ही नहीं सकती। असल बात यह है कि अब हम पढ़ाने का या किसी अन्य काम के करने का यत्न करते हैं तो एक श्यामवर्ण का सुन्दर शिशु हमारी आँखों के सामने आकर बड़े ही सुन्दर स्वर में मुरली बजाने लगता है। उस मुरली की विश्वविमोहिनी तान को सुनकर हमारा चित्त व्याकुल हो जाता है और हमारी सब सुध-बुध भूल जाती है।हम पागल की भाँति मन्त्रमुग्ध-से हो जाते हैं। फिर हम कोई दूसरा काम कर ही नहीं सकते।’ इतना कहकर प्रभु फिर जोरों के साथ फूट-फूटकर रोने लगे। उनके रुदन के साथ ही सैकड़ों विद्यार्थियों की आँखों से अश्रुओं की धाराएँ बहने लगीं। सभी ढाड़ बाँधकर उच्च स्वर से रुदन करने लगे। संजय महाशय का चण्डीमण्डप विद्यार्थियों के रुदन के कारण गूँजने लगा। इस करुणापूर्ण क्रन्दन-ध्वनि को सुनकर सहस्रों नर-नारी दूर-दूर से वहाँ आकर एकत्रित हो गये।
प्रभु अब कुछ-कुछ प्रकृतिस्थ हुए। अश्रु-विमोचन करते हुए उन्होंने कहा- ‘मेरे प्राणों से भी प्यारे छात्रो! अपनी-अपनी पुस्तकों को बाँध लो, आज से अब हम तुम्हारे अध्यापक नहीं रहे और न अब तुम ही हमारे छात्र हो, अब तो तुम श्रीकृष्ण के सखा हो। अब सभी मिलकर हमें ऐसा आशीर्वाद दो जिससे हमें श्रीकृष्ण-प्रेम प्राप्त हो सके। तुम सभी हमें हृदय से स्नेह करते हो, तुमसे हम यही दीनता के साथ भीख माँगते हैं। तुम सदा हमारे कल्याण के कामों में तत्पर रहे हो।’
प्रभु के मुख से ऐसे दीनतापूर्ण शब्द सुनकर सभी विद्यार्थी बेहोश-से हो गये। कोई तो पछाड़ खाकर पृथ्वी पर गिरने लगे और कोई अपने सिर को पृथ्वी पर रगड़ने लगे।
प्रभु ने फिर कहा- ‘मैं अन्तिम बार फिर तुम लोगों से कहता हूँ। तुम लोग पढ़ना न छोड़ना, कहीं जाकर अपने पाठ को जारी रखना।’ रोते हुए विद्यार्थियों ने कहा- ‘अब हमें न तो कहीं आप-जैसा अध्यापक मिलेगा और न कहीं अन्यत्र पढ़ने ही जायँगे।
क्रमशः
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