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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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अब तो ऐसा ही आशीर्वाद दीजिये कि आपके श्रीमुख से जो भी कुछ पढ़ा है, वही स्थायी बना रहे और हमें किसी दूसरे के समीप जाने की जिज्ञासा ही उत्पन्न न हो। अब तो हमें अपने चरणों की शरण ही प्रदान कीजिये! आपके चरणों की सदा स्मृति बनी रहे यही अन्तिम वरदान प्रदान कीजिये!’
यह कहकर सभी विद्यार्थियों ने प्रभु को एक साथ ही साष्टांग प्रणाम किया और प्रभु ने भी सबको पृथक-पृथक गले से लगाया। वे सभी बड़भागी विद्यार्थी प्रभु के प्रेमपूर्ण आलिंगन से कृतकृत्य हो गये और जारों से ‘हरि बोल’ ‘हरि बोल’ कहकर हरिनाम की तुमुल-ध्वनि करने लगे।
प्रभु ने उन विद्यार्थियों से कहा- ‘भैया, हम लोग, इतने दिनों तक साथ-साथ रहे हैं। हमारा तुम लोगों से बहुत ही अधिक घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है, तुम ही हमारे परम आत्मीय तथा सुहृद हो। एक बार तुम सभी एक स्वर से श्रीकृष्णरूपी शीतल सलिल से हमारे हृदय की जलती हुई विरह-ज्वाला को शान्त कर दो। तुम सभी श्रीकृष्ण-रसायन पिलाकर हमें नीरोग बना दो।एक बार तुम सभी लोग मिलकर श्रीकृष्ण के मंगलमय नामों का उच्च स्वर से संकीर्तन करो!’ विद्यार्थियों ने अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए कहा- ‘गुरुदेव! हम संकीर्तन को क्या जानें? हमें तो पता भी नहीं संकीर्तन कैसे किया जाता है? हाँ, यदि आप ही कृपा करके हमें संकीर्तन की प्रणाली सिखा दें तो हम जिस प्रकार आज्ञा हो उसी प्रकार सब कुछ करने के लिये उद्यत हैं।’ प्रभु ने सरलता के साथ कहा- ‘कृष्ण-कीर्तन में कुछ कठिनता थोड़े ही है, बड़ा ही सरल मार्ग है। तुम लोग बड़ी ही आसानी के साथ उसे कर सकते हो।’ यह कहकर प्रभु ने स्वयं स्वर के सहित नीचे का पद उच्चारण करके बता दिया-
हरे हरये नमः कृष्ण यादवाय नमः।
गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन।।
प्रभु ने स्वयं हाथ से ताली बजाकर इस नाम-संकीर्तन को आरम्भ किया। प्रभु की बतायी हुई विधि के अनुसार सभी विद्यार्थी एक स्वर से इस नाम-संकीर्तन को करने लगे। हाथ की तालियों के बजने से तथा संकीर्तन के सुमधुर स्वर से सम्पूर्ण चण्डीमण्डप गूँजने लगा। लोगों को महान आश्चर्य हुआ। नवद्वीप में यह एक नवीन ही वस्तु थी। इससे पूर्व ढोल, मृदंग, करताल आदि वाद्यों पर पद-संकीर्तन तो हुआ करता था, किन्तु सामूहिक नाम-संकीर्तन तो यह सर्वप्रथम ही था। इसकी नींव निमाई पण्डित की पाठशाला ही में पहले-पहल पड़ी। सबसे पहले इन्हीं नामों के पद से नाम-संकीर्तन प्रारम्भ हुआ। प्रभु भावावेश में जोर से संकीर्तन कर रहे थे, विद्यार्थी एक स्वर से उनका साथ दे रहे थे। कीर्तन की सुमधुर ध्वनि से दिशा-विदिशाएँ गूँजने लगीं। चण्डीमण्डप में मानो आनन्द का सागर उमड़ पड़ा। दूर-दूर से मनुष्य उस आनन्द-सागर में गोता लगाकर अपने को कृतार्थ बनाने के लिये दौड़े आ रहे थे। सभी आनन्द की बाढ़ में अपने-आपे को भूलकर बहने लगे और सभी दर्शनार्थियों के मुँह से स्वयं ही निकलने लगा-
हरे हरये नमः कृष्ण यादवाय नमः।
गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन।।
इस प्रकार चारों ओर से इन्हीं भगवन्नामों की ध्वनि होने लगी। पक्के-पक्के मकानों में से जोर की प्रतिध्वनि सुनायी पड़ने लगी-
हरे हरये नमः कृष्ण यादवाय नमः।
गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन।।
मानो स्थावर-जंगम, चर-अचर सभी मिलकर इस कलिपावन नाम का प्रेम के साथ संकीर्तन कर रहे हों। इस प्रकार थोड़ी देर के अनन्तर प्रभु का भावावेश कुछ कम हुआ। धीरे-धीरे उन्होंने ताली बजानी बंद कर दी और संकीर्तन समाप्त कर दिया। प्रभु के चुप हो जाने पर सभी विद्यार्थी तथा दर्शनार्थी चुप हो गये, उनके नेत्रों से प्रेमाश्रु अब भी निकल रहे थे।प्रभु ने उठकर एक बार फिर सब विद्यार्थियों को गले से लगाया। सभी विद्यार्थी फूट-फूटकर रो रहे थे। कोई कह रहा था- ‘हमारे प्राणों के सर्वस्व हमें इसी प्रकार मझधार में न छोड़ दीजियेगा!’ कोई हिचकियाँ लेते हुए गद्गदकण्ठ से कहता- ‘पढ़ना-लिखना तो जो होना था, सो हो लिया, आपके हृदय के किसी कोने में हमारी स्मृति बनी रहे, यही हमारी प्रार्थना है।’ प्रभु उन्हें बार-बार आश्वासन देते। उनके शरीरों पर हाथ फेरते, किन्तु उन्हें धैर्य होता ही नहीं था, प्रभु के स्पर्श से उनकी अधीरता अधिकाधिक बढ़ती जाती थी, वे बार-बार प्रभु के चरणों में लोटकर प्रार्थना कर रहे थे। दर्शनार्थी इस करूण दृश्य को और अधिक देर तक देखने में समर्थ न हो सके, वे कपड़ों से अपने-अपने मुखों को ढककर फूट-फूटकर रोने लगे। प्रभु भी इस करुणा की उमड़ती हुई तरंग में बहुत प्रयत्न करने पर भी अपने को न सँभाल सके। वे भी रोते-राते वहाँ से गंगा जी की ओर चल दिये। विद्यार्थी उनके पीछे-पीछे जा रहे थे। प्रभु ने सभी को समझा-बुझाकर विदा किया। प्रभु के बहुत समझाने पर विद्यार्थी दुःखित भाव से अपने-अपने स्थानों को चले गये और प्रभु गंगा जी से निवृत्त होकर अपने घर को चले आये।
कृपा की प्रथम किरण.....
हृदय में जब सरलता और सरसता का साम्राज्य स्थापित हो जाता है, तब चारों ओर से सद्गुण आ-आकर उसमें अपना निवास-स्थान बनाने लगते हैं। भगवद्भक्ति के उदय होने पर सम्पूर्ण सद्गुण उसके आश्रय में आकर बस जाते हैं। उस समय मनुष्य को पत्ते की खड़खड़ाहट में प्रियतम के पदों की धमक का भ्रम होने लगता है, वह पागल की भाँति चौंककर अपने चारों ओर देखने लगता है। यदि उसके सामने कोई उसके प्यारे की विरदावली का बखान करने लगे तब तो उसके आनन्द का पूछना ही क्या है, उस समय तो वह सचमुच पागल बन जाता है और उस बखान करने वाले के चरणों में लोटने लगता है। उसकी स्थिति उस विरहिणी की भाँति हो जाती है, जो चातक-पक्षी के मुख से भी ‘पिउ’ ‘पिउ’ की कर्णप्रिय मनोहर वाणी सुनकर अपने प्राण प्यारे की स्मृति में अधीर होकर नयनों से नीर बहाने लगती है। क्यों न हो, प्रियतम की पुण्य-स्मृति में मादकता ही इस प्रकार की है।
महाप्रभु अपने प्रिय शिष्यों के साथ रास्ते में प्रेमालाप करते हुए अपने घर की ओर चले आ रहे थे कि रास्ते में उन्हें आचार्य रत्नगर्भ जी का घर मिला। ये महाप्रभु के सजातीय ब्राह्मण थे, ये भी सिलहट के ही निवासी थे।
क्रमशः
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