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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रभु को रास्ते में जाते देखकर इन्होंने प्रभु को बड़े ही आदर के साथ बुलाकर अपने यहाँ बिठाया। रत्नगर्भ महाशय बड़े ही कोमल प्रकृति के पुरुष थे। इनके हृदय में काफी भावुकता थी, सरलता की तो ये मानो मूर्ति ही थे। शास्त्रों के अध्ययन में इनका अनुपम अनुराग था। प्रभु के बैठते ही परस्पर शास्त्र-चर्चा छिड़ गयी। रत्नगर्भ महाशय ने प्रसंगवश श्रीमद्भागवत का एक श्लोक कहा। श्लोक उस समय का था, जब यमुना किनारे यज्ञ करने वाले ब्राह्मणों की पत्नियाँ भगवान के लिये भोज्यपदार्थ लेकर उनके समीप उपस्थित हुई थीं। श्लोक में भगवान के उसी स्वरूप का वर्णन था।
बात यों थी कि एक दिन सभी गोपों के साथ बलराम जी के सहित भगवान वन में गौएँ चराने के लिये गये। उस दिन गोपों ने गँवारपन कर डाला, रोज जिधर गौओं को ले जाते थे, उधर न ले जाकर दूसरी ही ओर ले गये। उधर बड़ी मनोहर हरी-हरी घास थी। गौओं ने घास खूब प्रेम के साथ खायी और श्रीयमुना जी का निर्मल स्वच्छ जल पान किया। गौओं का तो पेट भर गया, किंतु ग्वाल-बाल व्रज की ही ओर टकटकी लगाये देख रहे थे कि आज हमारी छाक (भोजन) नहीं आयी। छाक कैसे आये, गोपियाँ तो रोज दूसरी ओर छाक लेकर जाती थीं।आज उन्होंने उधर जाकर वन में गौओं की बहुत खोज की, कहीं भी पता न चला तो वे छाक को लेकर घर लौट आयीं। इधर सभी गोप भूख के कारण तड़फड़ा रहे थे। उन सबने सलाह करके निश्चय किया कि कनुआ और बलुआ से इस बात को कहना चाहिये। वे अवश्य इसका कुछ-न-कुछ प्रबन्ध करेंगे। सभी ग्वाल-बाल प्यार से भगवान को तो ‘कनुआ’ कहा करते थे और बलदेव जी को ‘बलुआ’ के नाम से पुकारते थे। ऐसा निश्चय करके वे भगवान के समीप जाकर कहने लगे- ‘भैया कनुआ! तैंने अघासुर, बकासुर, शकटासुर आदि बड़े-बड़े राक्षसों को बात-की बात में मार डाला। बालकों के प्राण हरने वाली पूतना के भी शरीर में से तैंने क्षणभर में प्राण खींच लिये, किंतु भैया! तैंने इस राँड़ भूख को नहीं मारा! यह राक्षसी हमें बड़ी पीड़ा पहुँचा रही है, तैंने हमारी समय-समय पर रक्षा की है, हमारे संकटों को दूर किया है। आज तू हमारी इस दुःख से भी रक्षा कर। हमें खाने के लिये कहीं से कुछ वस्तु दे।’
गोपों की इस बात को सुनकर भगवान अपने चारों ओर देखने लगे, किंतु उन्हें खाने की कोई भी वस्तु दिखायी न दी। उस वन में कैथ के भी पेड़ नहीं थे। यह देखकर भगवान कुछ चिन्तित-से हुए। जब उन्होंने बहुत दूर तक दृष्टि डाली तो उन्हें यमुना जी के किनारे कुछ वेदज्ञ ब्राह्मण यज्ञ करते हुए दिखायी दिये। उन्हें देखकर भगवान गोप-बालकों से बोले- ‘तुम लोग एक काम करो। यमुना-किनारे वे जो ब्राह्मण यज्ञ कर रहे हैं, उनके पास जाओ और उनसे कहना- ‘हम कृष्ण और बलराम के भेजे हुए आये हैं, हम सब लोगों को बड़ी भूख लगी है, कृपा करके हमें कुछ खाने के लिये दे दीजिये।’ वे तुम्हें भूखा समझकर अवश्य ही कुछ-न-कुछ दे देंगे। रास्ते में ही चट मत कर आना। यहाँ ले आना। सब साथ-ही-साथ बाँटकर खायेंगे।
भगवान के ऐसा कहने पर वे गोप-ग्वाल उन ब्राह्मणों के समीप पहुँचे। दूर से ही उन्होंने यज्ञ करने वाले उन ब्राह्मणों को साष्टांग प्रणाम किया और यज्ञ-मण्डप के बाहर ही अपनी-अपनी लकुटी के सहारे खड़े होकर दीनता के साथ वे कहने लगे- ‘हे धर्म के जानने वाले ब्राह्मणो! हम श्रीकृष्णचन्द्र और बलदेव जी के भेजे हुए आपके पास आये हैं, इस समय इस सभी को बड़ी भारी भूख लगी हुई है, कृपा करके यदि आपके पास कुछ खाने का सामान हो तो हमें दे दीजिये। जिससे कृष्ण-बलराम के साथ हम अपनी भूख को शान्त कर सकें।
गोपों के ऐसी प्रार्थना करने पर वे ब्राह्मण उदासीन ही रहे। उन्होंने गोपों की बात पर ध्यान ही नहीं दिया। जब उन्होंने कई बार कहा, तब उन्होंने रूखाई के साथ कह दिया- ‘तुम लोग सचमुच बड़े मूर्ख हो, अरे, देवताओं के भाग में से हम तुम्हें कैसे दे सकते हैं? भाग जाओ, यहाँ कुछ खाने-पीने को नहीं है।’ ब्राह्मणों के इस उत्तर को सुनकर सभी गोप दुःखित-भाव से भगवान के समीप लौट आये और उदास होकर कहने लगे- ‘भैया! कनुआ! तैंने कैसे निर्दयी ब्राह्मणों के पास हमें भेज दिया। कुछ लेना-देना तो अलग रहा, वे तो हमसे प्रेमपूर्वक बोले भी नहीं। उन्होंने तो हमें फटकार बताकर यज्ञमण्डप से भगा दिया।’
गोपों की ऐसी बात सुनकर भगवान ने कहा- ‘वे कर्मठ ब्राह्मण हमारे दुःख को भला क्या कृपा की प्रथम किरण समझ सकते हैं। जो स्वयं स्वर्गसुख का लोभी है, उसे दूसरे के दुःख की क्या परवा। अब की तुम लोग उनकी स्त्रियों के समीप जाओ, उनका हृदय कोमल है, वे शरीर से तो वहाँ हैं, किंतु उनका अन्तःकरण मेरे ही समीप है। वे तुम लागों को जरूर कुछ-न-कुछ देंगी। तुम लोग हम दोनों भाइयों का नाम भर ले लेना।’ इस बात को सुनकर गिड़गिड़ाते हुए गोपों ने कहा- भैया कनुआ! तुम तेरे कहने से और तो सभी काम कर सकते हैं, किंतु हम जनाने में न जायँगे, तू हमें स्त्रियों के पास जाने के लिये मत कहे।’
भगवान ने हँसते हुए उत्तर दिया- ‘अरे, मेरी तो जान-पहचान जनाने में ही है। मेरे नाम से तो वे ही सब कुछ दे सकती हैं। तुम लोग जाओ तो सही।’
भगवान की ब्राह्मण-पत्नियों से जान-पहचान पुरानी थी। बात यह थी कि मथुरा की मालिनें पुष्प चुनने के निमित्त नित्यप्रति वृन्दावन आया करती थीं। जब वे ब्राह्मणों के घरों में पुष्प देने जातीं तभी स्त्रियों से श्रीकृष्ण और बलराम के अद्भुत रूप-लावण्य का बखान करतीं और उनकी अलौकिक लीलाओं का भी गुणगान किया करतीं। उन्हें सुनते-सुनते ब्राह्मण-पत्नियों के हृदय में इन दोनों के प्रति अनुराग उत्पन्न हो गया। वे सदा इनके दर्शनों के लिये छटपटाती रहती थीं। उनकी उत्सुकता आवश्यकता से अधिक बढ़ गयी थी। उनकी लालसा को पूर्ण करने के ही निमित्त भगवान ने यह लीला रची थी।
क्रमशः
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