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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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भक्तगण दास्य, सख्य, वात्सल्य, शान्त और मधुर- इन पाँचों भावों के द्वारा अपने प्रियतम की उपासना करते हैं। उपासना में ये ही पाँच भाव मुख्य समझे गये हैं, किंतु इन पाँचों में भी दास्यभाव ही सर्वश्रेष्ठ और सर्वप्रधान है। या यों कह लीजिये कि दास्यभाव ही इन पाँचों भावों का मुख्य प्राण है। दास्यभाव के बिना न तो सख्य ही हो सकता है और न वात्सल्य, शान्त तथा मधुर ही। कोई भी भाव क्यों न हो, दास्यभाव इसमें अव्यक्त रूप से जरूर छिपा रहेगा। दास्य के बिना प्रेम हो ही नहीं सकता। जो स्वयं दास बनना नहीं जानता, वह स्वामी कभी बन ही नहीं सकेगा, जिसने स्वयं किसी की उपासना तथा वन्दना नहीं की है, वह उपास्य तथा वन्दनीय हो ही नहीं सकता। तभी तो अखिलब्राह्मण्ड कोटिनायक श्रीहरि स्वयं अपने श्रीमुख से कहते हैं- ‘क्रीतोऽहं तेन चार्जुन’ हे अर्जुन! भक्तों ने मुझे खरीद लिया है, मैं उनका क्रीतदास हूँ। क्योंकि वे स्वयं चराचर प्राणियों के स्वामी हैं। इसलिये स्वामीपने के भाव को प्रदर्शित करने के निमित्त वे भक्त तथा ब्राह्मणों के स्वयं दास होना स्वीकार करते हैं और उनके पदरज को अपने मस्तक पर चढ़ाने के निमित्त सदा उनके पीछे-पीछे घूमा करते हैं।

महाप्रभु अब भावावेश में आकर भक्तों के भावों को प्रकट करने लगे। भक्तों को सम्पूर्ण लोगों के प्रति और भगवत-भक्तों के प्रति किस प्रकार के आचरण करने चाहिये, उनमें भागवत पुरुषों के प्रति कितनी दीनता, कैसी नम्रता होनी चाहिये, इसकी शिक्षा देने के निमित्त वे स्वयं आचरण करके लोगों को दिखाने लगे। क्योंकि वे तो भक्ति-भाव के प्रदर्शक भक्तशिरोमणि ही ठहरे। उनके सभी कार्य लोकमर्यादा-स्थापन के निमित्त होते थे। उन्होंने मर्यादा का उल्लंघन कहीं भी नहीं किया। यही तो प्रभु के जीवन में एक भारी विशेषता है। अध्यापकी का अन्त हो गया, ब्राह्यशास्त्र पढ़ना तथा पढ़ाना दोनों ही छूट गये, अब न वह पला-सा चांचल्य है और न शास्त्रार्थ तथा वाद-विवाद की उन्मादकारी धुन। अब तो इन पर दूसरी ही धुन सवार हुई है, जिस धुन में ये सभी संसारी कामों को ही नहीं भूल गये हैं, किंतु अपने-आपको भी विस्मृत कर बैठे हैं। इनके भाव अलौकिक हैं, इनकी बातें गूढ़ हैं। इनके चरित्र रहस्यमय हैं, भला सर्वदा स्वार्थ में ही सने रहने वाले संसारी मनुष्य इनके भावों को समझ ही कैसे सकते हैं। अब ये नित्यप्रति प्रातःकाल गंगा-स्नान के निमित्त जाने लगे। रास्ते में जो भी ब्राह्मण, वैष्णव तथा वयोवृद्ध पुरुष मिलता उसे ही नम्रतापूर्वक प्रणाम करते और उसका आशीर्वाद ग्रहण करते।गंगाजी पर पर पहुँचकर ये प्रत्येक वैष्णव की पदधूलि को अपने मस्तक पर चढ़ाते। उनकी वन्दना करते और भावावेश में आकर कभी-कभी प्रदक्षिणा भी करने लगते। भक्तगण इन्हें भाँति-भाँति के आशीर्वाद देते। कोई कहता- ‘भगवान करे आपको भगवान की अनन्य भक्ति की प्राप्ति हो।’ कोई कहता- ‘आप प्रभु के परम प्रिय बनें।’ कोई कहता- ‘श्रीकृष्ण तुम्हारी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करें।’ सबके आशीर्वादों को सुनकर प्रभु उनके चरणों में लोट जाते और फूट-फूटकर रोने लगते। रोते-रोते कहते- ‘आप सभी वैष्णवों के आशीर्वाद का ही सहारा है, मुझ दीन-हीन कंगाल पर आप सभी लोग कृपा कीजिये। भागवत पुरुष बड़े ही कोमल स्वभाव के होते हैं, उनका हृदय करुणा से सदा भरा हुआ होता है, वे पर-पीड़ा को देखकर सदा दुःखी हुआ करते हैं। मुझ दुखिया के दुःख को भी दूर करो? मुझे श्रीकृष्ण से मिला दो, मेरी मनोकामना पूर्ण कर दो, मेरे सत्संकल्प को सफल बना दो। यही मेरी आप सभी वैष्णवों के चरणों में विनीत प्रार्थना है।

घाट पर बैठे हुए वैष्णवों की, प्रभु जो भी मिल जाती वही सेवा कर देते। किसी का चन्दन ही घिस देते, किसी की गीली धोती को ही धो देते। किसी के जल के घड़े को भरकर उसके घर तक पहुँचा आते। किसी के सिर में आँवला तथा तैल ही मलने लगते। भक्तों की सेवा-शुश्रूषा करने में ये सबसे अधिक सुख का अनुभव करते। वृद्ध वैष्णव इन्हें भाँति-भाँति के उपदेश करते। कोई कहता ‘निरन्तर श्रीकृष्ण-कीर्तन करते रहना ही एकमात्र सार है। तुम्हें श्रीकृष्ण ही कहना चाहिये, श्रीकृष्ण के मनोहर नामों का ही स्मरण करते रहना चाहिये। श्रीकृष्ण-कथाओं के अतिरिक्त अन्य कोई भी संसारी बातें न सुननी चाहिये। सम्पूर्ण जीवन श्रीकृष्णमय ही हो जाना चाहिये। खाते कृष्ण, पीते कृष्ण, चलते कृष्ण, उठते कृष्ण, बैठते कृष्ण, हँसते कृष्ण, रोते कृष्ण, इस प्रकार सदा कृष्ण-कृष्ण ही कहते रहना चाहिये। श्रीकृष्णनामामृत के अतिरिक्त इन्द्रियों को किसी प्रकार के दूसरे आहार की आवश्यकता ही नहीं है। इसी का पान करते-करते वे सदा अतृप्त ही बनी रहेंगी।’

वृद्ध वैष्णवों के सदुपदेशों को ये श्रद्धा के साथ श्रवण करते, उनकी वन्दना करते और उनकी पद-धूलि को मस्तक पर चढ़ाते तथा अंजन बनाकर आँखों में आँजने लगते। इनकी ऐसी भक्ति देखकर वैष्णव कहने लगते- ‘कौन कहता है, निमाई पण्डित पागल हो गया है, ये तो श्रीकृष्ण-प्रेम में मतवाले बने हुए हैं। इन्हें तो प्रेमोन्माद है। अहा! धन्य है इनकी जननी को जिनकी कोख से ऐसा सुपुत्र उत्पन्न हुआ।’ वैष्णवगण इस प्रकार इनकी परस्पर में प्रशंसा करने लगते।इधर महाप्रभु की ऐसी विचित्र दशा देखकर शचीमाता मन-ही-मन बड़ी दुःखी होतीं। वह दीन होकर भगवान से प्रार्थना करतीं- प्रभो! इस विधवा के एकमात्र आश्रय को अपनी कृपा का अधिकारी बनाओ। नाथ! इस सड़सठ वर्ष की अनाथिनी दुखिया की दीन-हीन दशा पर ध्यान दो। पति परलोकवासी बन चुके, ज्येष्ठ पुत्र बिलखती छोड़कर न जाने कहाँ चला गया। अब आगे-पीछे यही मेरा एकमात्र सहारा है। इस अन्धी वृद्धा का यह निमाई ही एकमात्र लकुटी है। इस लकुटी के ही सहारे यह संसार में चल-फिर सकती है।

हे अशरण-शरण! इसे रोगमुक्त कीजिये, इसे सुन्दर स्वास्थ्य प्रदान कीजिये।’ भोली-भाली माता सभी के सामने अपना दुखड़ा रोतीं। रोते-रोते कहने लगतीं- ‘न जाने निमाई को क्या हो गया है, वह कभी तो रोता है, कभी हँसता है, कभी गाता है, कभी नाचता है, कभी रोते-रोते मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है, कभी जोरों से दोड़ने लगता है और कभी किसी पेड़ पर चढ़ जाता है।’ स्त्रियाँ भाँति-भाँति की बातें कहतीं। कोई कहती- ‘अम्मा जी! तुम भी बड़ी भोली हो, इसमें पूछना ही क्या है, वही पुराना वायुरोग है।
क्रमशः

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