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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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समय पाकर उभर आया है। किसी अच्छे वैद्य से इसका इलाज कराइये।’
कोई कहती- ‘वायुरोग बड़ा भयंकर होता है, तुम निमाई के दोनों पैरों को बाँधकर उसे कोठरी में बंद करके रखा करो, खाने के लिये हरे नारियल का जल दिया करो। इससे धीरे-धीरे वायुरोग दूर हो जायगा।’ कोई-कोई सलाह देतीं- ‘शिवातैल का सिर में मर्दन कराओ, सब ठीक हो जायगा। भगवान सब भला ही करेंगे।वे ही हम सब लोगों की एकमात्र शरण हैं।’ बेचारी शचीमाता सबकी बातें सुनतीं और सुनकर उदासभाव से चुप हो जातीं। इकलौते पुत्र के पैर बाँधकर उसे कोठरी में बंद कर देने की उसकी हिम्मत न पड़ती। बेचारी एक तो पुत्र के दुःख से दुःखी थी, दूसरा उसे विष्णुप्रिया का दुःख था। पति की ऐसी दशा देखकर विष्णुप्रिया सदा चिन्ति ही बनी रहतीं। उन्हें अन्न-जल कुछ भी अच्छा नहीं लगता। उदासीन भाव से सदा पति के ही सम्बन्ध में सोचती रहतीं। शचीमाता के बहुत अधिक आग्रह करने पर पति के उच्छिष्ट अन्न में से दो-चार ग्रास खा लेतीं, नहीं तो सदा वैसे ही बैठी रहतीं। इससे शचीमाता का दुःख दुगुना हो गया था। उनकी अवस्था सड़सठ वर्ष की थी।वृद्धावस्था के कारण इतना दुःख उनके लिये असह्या था। किंतु नीलाम्बर चक्रवर्ती की पुत्री को, जगन्नाथ मिश्र- जैसे पण्डित की धर्मपत्नी को तथा विश्वरूप और विश्वम्भर- जैसे महापुरुषों की माता के लिये ये सभी दुःख स्वाभाविक ही थे, वे ही इन दुःखों को सहन करने में भी समर्थ हो सकती थीं, साधारण स्त्रियों का काम नहीं था कि वे इतने भारी-भारी दुःखों को सहन कर सकें।

महाप्रभु की नूतनावस्था की नवद्वीप भर में चर्चा होने लगी। जितने मुख थे उतने ही प्रकार की बातें भी होती थीं। जिसके मन में जो आता वह उसी प्रकार की बातें कहता। बहुत-से तो कहते- ‘ऐसा पागलपन तो हमने कभी नहीं देखा।’ बहुत-से कहते- ‘सचमुच भाव तो विचित्र है, कुछ समझ में नहीं आता, असली बात क्या है। चेष्टा तो पागलों की-सी जान नहीं पड़ती। चेहरे की कान्ति अधिकाधिक दिव्य होती जाती है। उनके दर्शनमात्र से ही हृदय में हिलोरें-सी मारने लगती हैं, अन्तःकरण उमड़ने लगता है। न जाने उनकी आकृति में क्या जादू भरा पड़ा है। पागलों की भी कहीं ऐसी दशा होती है?’ कोई-कोई इन बातों का खण्डन करते हुए कहने लगते- ‘कुछ भी क्यों न हो, है तो यह मस्तिष्क का ही विकार। किसी प्रकार की हो, यह वातव्याधि के सिवाय और कुछ नहीं है।’

हम पहले ही बता चुके हैं कि श्रीवास पण्डित प्रभु के पूज्य पिता जी के परम स्नेही ओर सखा थे, उनकी पत्नी मालती देवी से शचीमाता का सखीभाव था। वे दोनों ही प्रभु को पुत्र की भाँति प्रेम करते थे। श्रीवास पण्डित को इस बात का हार्दिक दुःख बना रहता था कि निमाई पण्डित जैसे समझदार और विद्वान पुरुष भगवत-भक्ति से उदासीन ही बने हुए हैं, उनके मन में सदा यही बात बनी रहती कि निमाई पण्डित कहीं वैष्णव बन जायँ तो वैष्णव-धर्म का बेड़ा पार ही हो जाय। फिर वैष्णवों की आज की भाँति दुर्गति कभी न हो। प्रभु के सम्बन्ध में लोगों के मुखों से भाँति-भाँति की बातें सुनकर श्रीवास पण्डित के मन में परम कुतूहल हुआ। वे आनन्द और दुःख के बीच में पड़कर भाँति-भाँति की बातें सोचने लगे। कभी तो सोचते- ‘सम्भव है, वायुरोग ही उमड़ आया हो, इस शरीर का पता ही क्या है? शास्त्रों में इसे अनित्य और आगमापायी बताया है, रोगों का तो यह घर ही है।’ फिर सोचते- ‘लोगों के मुखों से जो मैं लक्षण सुन रहा हूँ, वैसे तो भगवत-भक्तों में ही होते हैं, मेरा हृदय भी भीतर-ही-भीतर किसी अज्ञात सुख का-सा अनुभव कर रहा है, कुछ भी हो चलकर उनकी दशा देखनी चाहिये।’ यह सोचकर वे प्रभु की दशा देखने के निमित्त अपने घर से चल दिये।महाप्रभु उस समय श्रीतुलसी जी में जल देकर उनकी प्रदक्षिणा कर रहे थे। पिता के समान पूजनीय श्रीवास पण्डित को देखकर प्रभु उनकी ओर दौड़े और प्रेम के साथ उनके गले से लिपट गये। श्रीवास ने प्रभु के अंगों का स्पर्श किया। प्रभु के अंगों के स्पर्शमात्र से उनके शरीर में बिजली-सी दौड़ गयी। उनके सम्पूर्ण शरीर में रोमांच हो गया। वे प्रेम में विभोर होकर एकटक प्रभु के मनोहर मुख की ही ओर देखते रहे। प्रभु ने उन्हें आदर से ले जाकर भीतर बिठाया और उनकी गोदी में अपना सिर रखकर वे फूट-फूटकर रोने लगे। शचीमाता भी श्रीवास पण्डित को देखकर वहाँ आ गयीं और रो-रोक प्रभु की व्याधि की बातें सुनाने लगीं। पुत्र-स्नेह के कारण उनका गला भरा हुआ था, वे ठीक-ठीक बातें नहीं कह सकती थीं। जैसे-तैसे श्रीवास पण्डित को माता ने सभी बातें सुनायीं।


सब बातें सुनकर भावावेश में श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘जो इसे वायुरोग बताते हैं, वे स्वयं वायुरोग से पीड़ित हैं। उन्हें क्या पता कि यह ऐसा रोग है जिसके लिये शिव-सनकादि बड़े-बड़े योगीजन तरसते रहते हैं।

शचीदेवी! तुम बड़भागिनी हो, जो तुम्हारे भगवत्-भक्त पुत्र उत्पन्न हुआ। ये सब तो पूर्ण भक्ति के चिह्न हैं।’ श्रीवास पण्डित की ऐसी बातें सुनकर माता को कुछ-कुछ संतोष हुआ। अधीर भाव से प्रभु ने श्रीवास पण्डित से कहा- ‘आज आपके दर्शन से मुझे परम शान्ति हुई। सभी लोग मुझे वायुरोग ही बताते थे। मैं भी इसे वायुरोग ही समझता था और मेरे कारण विष्णुप्रिया तथा माता को जो दुःख होता था, उसके कारण मेरा हृदय फटा-सा जाता था। यदि आज आप यहाँ आकर मुझे इस प्रकार आश्वासन न देते तो मैं सचमुच ही गंगा जी में डूबकर अपने प्राणों का परित्याग कर देता। लोग मेरे सम्बन्ध में भाँति-भाँति की बातें करते हैं।’

श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘मेरा हृदय बार-बार कह रहा है, आपके द्वारा संसार का बड़ा भारी उद्धार होगा। आप ही भक्तों के एकमात्र आश्रय और आराध्य बनेंगे। आपकी इस अद्वितीय और अलौकिक मादकता को देखकर तो मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अखिलकोटि ब्रह्माण्डनायक अनादि पुरुष श्रीहरि ही अवनितल पर अवतीर्ण होकर अविद्या और अविचार का विनाश करते हुए भगवन्नाम का प्रचार करेंगे।
क्रमशः

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