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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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मुझे प्रतीत हो रहा है कि सम्भवतया प्रभु इसी शरीर द्वारा उस शुभ कार्य को करावें।’
प्रभु ने अधीरता के साथ कहा- ‘मैं तो आपके पुत्र के समान हूँ। वैष्णवों के चरणों में मेरी अनुरक्ति हो, ऐसा आशीर्वाद दीजिये। श्रीकृष्ण-कीर्तन के अतिरिक्त कोई भी कार्य मुझे अच्छा ही न लगे, यही मेरी अभिलाषा है, सदा प्रभु-प्रेम में विकल होकर मैं रोया ही करूँ, यही मेरी हार्दिक इच्छा है।’
श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘आप ही ऐसा आशीर्वाद दें, जिससे इस प्रकार का थोड़ा-बहुत पागलपन हमें भी प्राप्त हो सके। हम भी आपकी भाँति प्रेम में पागल हुए लोक-बाह्य बनकर उन्मत्तों की भाँति नृत्य करने लगें।’
इस प्रकार बहुत देर तक इन दोनों ही महापुरुषों में विशुद्ध अन्तःकरण की बातें होती रहीं। अन्त में प्रभु की अनुमति लेकर श्रीवास पण्डित अपने घर को चले आये।
भगवान तो प्राणिमात्र के हृदय में विराजमान हैं। समानरूप से संसार के अणु-परमाणु में व्याप्त हैं, किंतु पात्रभेद के कारण उनकी उपलब्धि भिन्न-भिन्न प्रकार से होती है। भगवान निशानाथ की किरणें समानरूप से सभी वस्तुओं पर एक-सी ही पड़ती हैं। पत्थर, मिट्टी घड़ा, वस्त्र पर भी वे ही किरणें पड़ती हैं और शीश तथा चन्द्रकान्तमणि पर भी उन्हीं किरणों का प्रभाव पड़ता है। मिट्टी तथा पत्थर में निशानाथ का प्रभाव प्रकट नहीं होता है, वहाँ घोर तमोगुण के कारण अव्यक्तरूप से ही बना रहता है, किंतु स्वच्छ और निर्मल चन्द्रकान्तमणि पर उनकी कृपा की तनिक-सी किरण पड़ते ही उसकी विचित्र दशा हो जाती है। उन लोकसुखकारी भगवान निशानाथ की कृपा को पाते ही उसका हृदय पिघलने लगता है और वह द्रवीभूत होकर बहने लगता है।
इस कारण चन्द्रदेव उसके प्रति अधिकाधिक स्नेह करने लगते हैं। इसी कारण उसका नाम ही चन्द्रकान्तमणि पड़ गया। उसका चन्द्रमा के साथ नित्य का शाश्वत सम्बन्ध हो गया। वह निशानाथ से भिन्न नहीं है। निशानाथ के गुणों का उसमें समावेश हो जाता है। इसी प्रकार भक्तों के हृदय में भगवान! की कृपा-किरण पड़ते ही वह पिघलने लगता है। चन्द्रकान्तमणि तो चाहे चन्द्रमा की किरणों से बनी भी रहे, किंतु भक्तों के हृदय का फिर अस्तित्व नहीं रहता, वह कृपा-किरणों के पड़ते ही पिघल-पिघलकर प्रभु के प्रेमपीयूषार्णव में जाकर तदाकार हो जाता है। यही भक्तों की विशेषता है। तभी तो गोस्वामी तुलसीदास जी ने यहाँ तक कह डाला है-
मोरे मन प्रभु अस बिस्वासा। राम तें अधिक राम कर दासा।।
भगवद्भक्तों की महिमा ही ऐसी है, भक्तों के समझने के लिये भी प्रभु की कृपा की ही आवश्यकता है। जिस पर भगवान की कृपा नहीं, वह भक्तों की महिमा को भला समझ ही क्या सकता है? जिसके हृदय में उस रसराज के रस-सुधामय एक बिन्दु का भी प्रवेश नहीं हुआ, जिसमें उसके ग्रहण करने की किंचिन्मात्र भी शक्ति नहीं हुई, वह रसिकता के मर्म को समझ ही केसे सकता है? इसीलिये रसिकशिरोमणि भगवत-रसिक जी कहते हैं-
‘भगवत-रसिककी’ बातें रसिक बिना कोउ समुझि सके ना।
महाप्रभु के नवानुराग की चर्चा नदिया के सभी स्थानों में भाँति-भाँति से हो रही थी। उस समय सभी वैष्णव श्री अद्वैताचार्य जी के यहाँ एकत्रित हुआ करते थे। अद्वैताचार्य के स्थान को वैष्णवों का अखाड़ा ही कहना ठीक है। वहाँ पर सभी नामी-नामी वैष्णवरूपी पहलवान एकत्रित होकर भक्तितत्त्वरूपी युद्ध का अभ्यास किया करते थे।प्रभु की प्राप्ति के लिये भाँति-भाँति के दाव-पेचों की उस अखाड़े में आलोचना तथा प्रत्यालोचना हुआ करती थी और सदा इस बात पर विचार होता कि कदाचाररूपी प्रबल शत्रु किसके द्वारा पछाड़ा जा सकता है? वैष्णव अपने बल का विचार करते और अपनी ऐसी दुर्दशा पर आँसू भी बहाते। महाप्रभु के नूतन भाव की बातों पर यहाँ भी वाद-विवाद होने लगे। अधिकांश वैष्णव इसी पक्ष में थे कि निमाई पण्डित को भक्ति का ही आवेश है, उनके हृदय में प्रेम का पूर्णरूप से प्रकाश हो रहा है, उनकी सभी चेष्टाएँ अलौकिक हैं, उनके मुख के तेज को देखकर मालूम पड़ता है कि वे प्रेम के ही उन्माद में उन्मादी बने हुए हैं, दूसरा कोई भी कारण नहीं है, किंतु कुछ भक्त इसके विपक्ष में थे। उनका कथन था कि निमाई पण्डित की भला एक साथ ऐसी दशा किस प्रकार हो सकती है? कल तक तो वे देवी, देवता और भक्त वैष्णव की खिल्लियाँ उड़ाते थे, सहसा उनमें इस प्रकार के परिवर्तन का होना असम्भव ही है। जरूर उन्हें वही पुराना वायुरोग फिर से हो गया है। उनकी सभी चेष्टाएँ पागलों की-सी हैं। उन सबकी बातें सुनकर श्रीमान अद्वैताचार्य जी ने सबको सम्बोधित करते हुए गम्भीरता के साथ कहा- भाई! आप लोग जिन निमाई पण्डित के सम्बन्ध में बातें कर रहे हो, उन्हीं के सम्बन्ध में मेरा भी एक निजी अनुभव सुन लो। तुम सब लोगों को यह बात तो विदित ही है कि मैं भगवान को प्रकट करने के निमित्त नित्य गंगा-जल से और तुलसी से श्रीकृष्ण का पूजन किया करता हूँ। गौतमी-तन्त्र के इस वाक्य पर मुझे पूर्ण विश्वास है-
तुलसीदलमात्रेण जलस्य चुलुकेन वा।
विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्तवत्सलः।।
अर्थात ‘भगवान ऐसे दयालु हैं कि वे भक्ति से दिये हुए एक चुल्लू जल तथा एक तुलसी पत्र के द्वारा ही अपनी आत्मा को भक्तों के लिये दे देते हैं।’ इसी वाक्य पर विश्वास करके मैं तुम लोगों को बार-बार आश्वासन दिया करता था। कल श्रीमद्भगवद्गीता के एक श्लोक का अर्थ मेरी समझ में नहीं आया। इसी चिन्ता में रात्रि में मैं बिना भोजन किये ही सो गया था। स्वप्न में क्या देखता हूँ कि एक गौर वर्ण के तेजस्वी महापुरुष मेरे समीप आये और मुझसे कहने लगे- ‘अद्वैत! जल्दी से उठ, जिस श्लोक में तुझे शंका थी, उसका अर्थ इस प्रकार है। अब तेरी मनःकामना पूर्ण हुई। जिस इच्छा से तू निरन्तर गंगा-जल और तुलसी से मेरा पूजन करता था, तेरी वह इच्छा अब सफल हो गयी। हम अब शीघ्र ही प्रकाशित हो जायँगे।अब तुम्हें भक्तों को अधिक दिन आश्वासन न देना होगा। अब हम थोड़े ही दिनों में नाम-संकीर्तन आरम्भ कर देंगे। जिसकी घनघोर तुमुल ध्वनि से दिशा-विदिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठेंगी।’ इतना कहने पर उन महापुरुष ने अपना असली स्वरूप दिखाया।
क्रमशः
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