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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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वे और कोई नहीं थे, शचीनन्दन विश्वम्भर ही ये बातें मुझसे कह रहे थे। जब इनके अग्रज विश्वरूप मेरी पाठशाला में पढ़ा करते थे, तब ये उन्हें बुलाने के निमित्त मेरे यहाँ कभी-कभी आया करते थे, इन्हें देखते ही मेरा मन हठात इनकी ओर आकर्षित होता था, तभी मैं समझता था कि मेरी मनःकामना इन्हीं के द्वारा पूर्ण होगी। आज स्वप्न में उन्हें देखकर तो यह बात स्पष्ट ही हो गयी। इतना कहते-कहते वृद्ध आचार्य का गला भर आया। वे फूट-फूटकर बालकों की भाँति रुदन करने लगे।
भगवान की भक्तवत्सलता का स्मरण करके वे हिचकियाँ भर-भरकर रो रहे थे। इनकी ऐसी दशा देखकर अन्य वैष्णवों की आँखों में से भी आँसू निकलने लगे। सभी का हृदय प्रेम से भर आया। सभी वैष्णवों के इस भावी उत्कर्ष का स्मरण करके आनन्दसागर में गोता लगाने लगे। इस प्रकार बहुत-सी बातों होने के अनन्तर सभी वैष्णव अपने-अपने घरों को चले गये।
इधर महाप्रभु की दशा अब और भी अधिक विचित्र होने लगी। उन्हें अब श्रीकृष्ण-कथा और वैष्णवों के सत्संग के अतिरिक्त दूसरा विषय रुचिकर ही प्रतीत नहीं होता था, वे सदा गदाधर या अन्य किसी भक्त के साथ भगवच्चर्चा ही करते रहते थे। एक दिन प्रभु ने गदाधर पण्डित से कहा- ‘गदाधर! आचार्य अद्वैत परम भागवत वैष्णव हैं, वे ही नवद्वीप के भक्त वैष्णवों के शिरोमणि और आश्रयदाता हैं, आज उनके यहाँ चलकर उनकी पद-रज से अपने को पावन बनाना चाहिये।’
प्रभु की ऐसी इच्छा जानकर गदाधर उन्हें साथ लेकर अद्वैताचार्य के घर पर पहुँचे। उस समय सत्तर वर्ष की अवस्था वाले वृद्ध आचार्य बड़ी श्रद्धा-भक्ति के साथ तुलसी-पूजन कर रहे थे। आचार्य के सिर के सभी बाल श्वेत हो गये थे। उनके तेजोमय मुखमण्डल पर एक प्रकार की अपूर्व आभा विराजमान थी, वे अपने सिकुड़े हुए मुख से शुद्धता के साथ गम्भीर स्वर में स्तोत्र पाठ कर रहे थे। मुझे से भगवान की स्तुति के मधुर श्लोक निकल रहे थे और आँखों से अश्रुओं की धारा बह रही थी। उन परम भागवत वृद्ध वैष्णव के ऐसे अपूर्व भक्तिभाव को देखकर प्रभु प्रेम में गद्गद हो गये। उन्हें भावावेश में शरीर की कुछ भी सुध-बुध न रही। वे मूर्च्छा खाकर पृथ्वी पर बेहोश होकर गिर पड़े।
अद्वैताचार्य ने जब अपने सामने अपने इष्टदेव को मूर्च्छित दशा में पड़े हुए देखा तब तो उनके आनन्द की सीमा न रही। सामने रखी हुई पूजन की थाली को उठाकर उन्होंने प्रभु के कोमल पाद-पद्मों की अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य और पत्र-पुष्पों से विधिवत पूजा की। उन इतने भारी ज्ञानी वृद्ध महापुरुष को एक बालक के पैरों की पूजा करते देख आश्चर्य में चकित होकर गदाधर ने उनसे कहा- ‘आचार्य! आप यह क्या अनर्थ कर रहे हैं? इतने भारी ज्ञानी, मानी और वयोवृद्ध पण्डित होकर आप एक बच्चे के पैरों की पूजा करके उसके ऊपर पाप चढ़ा रहे हैं।’
गदाधर की ऐसी बात सुनकर हँसते हुए आचार्य अद्वैत ने उत्तर दिया- ‘गदाधर! तुम थोड़े दिनों के बाद इस बालक का महत्त्व समझने लगोगे। सभी वैष्णव इनके चरणों की पूजा कर अपने को कृतकृत्य समझा करेंगे। अभी तुम मेरे इस कार्य को देखकर आश्चर्य करते हो। कालान्तर में तुम्हारा यह भ्रम स्वतः ही दूर हो जायगा।’
इसी बीच प्रभु को कुछ-कुछ बाह्यज्ञान हुआ। चैतन्यता प्राप्त होते ही उन्होंने आचार्य के चरण पकड़ लिये और वे रोते-रोते कहने लगे- ‘प्रभो! अब हमारा उद्धार करो। हमने अपना बहुत-सा समय व्यर्थ की बकवाद में ही बरबाद किया। अब तो हमें अपने चरणों की शरण प्रदान कीजिये। अब तो हमें प्रेम का थोड़ा बहुत तत्त्व समझाइये! हम आपकी शरण में आये हैं, आप ही हमारी रक्षा कर सकते हैं।’
प्रभु की इस प्रकार की दैन्ययुक्त प्रार्थना को सुनकर आचार्य भौचक्के-से रह गये और कहने लगे- ‘प्रभो! अब मेरे सामने अपने को बहुत न छिपाइये। इतने दिन तक तो छिपे-छिपे रहे, अब और कब तक छिपे ही रहने की इच्छा है? अब तो आपके प्रकाश में आने का समय आ गया है।’
प्रभु ने दीनता के साथ कहा- ‘आप ही हमारे माता-पिता तथा गुरु हैं। आपका जब अनुग्रह होगा, तभी हम श्रीकृष्णप्रेम प्राप्त कर सकेंगे। आप ऐसा आशीर्वाद दीजिये कि हम वैष्णवों के सच्चे सेवक बन सकें।’
इस प्रकार बहुत देर तक परस्पर में दोनों ओर से दैन्ययुक्त बातें होती रहीं। अन्त में प्रभु गदाधर के साथ अपने घर को चले गये। इधर अद्वैताचार्य ने सोचा- ‘ये मुझे छलना चाहते हैं। यदि सचमुच मेरा स्वप्न सत्य होगा और ये वे ही रात्रिवाले महापुरुष होंगे तो संकीर्तन के समय मुझे स्वतः ही अपने पास बुला लेंगे। अब मेरा नवद्वीप में रहना ठीक नहीं।’ यह सोचकर वे नवद्वीप को छोड़कर शान्तिपुर के अपने घर में जाकर रहने लगे।
श्रीवास के घर संकीर्तनारम्भ...
सम्पूर्ण संसार एक अज्ञात आकर्षण के अधीन होकर ही सब व्यवहार कर रहा है। अग्नि सभी को गरम प्रतीत होती है। जल सभी को शीतल ही जान पड़ता है। सर्दी-गरमी पड़ने पर उसके सुख-दुःख का अनुभव जीवमात्र को होता है। यह बात अवश्य है कि स्थिति-भेद से उसके अनुभव में न्यूनाधिक्य-भाव हो जाय। किसी-न-किसी रूप में अनुभव तो सब करते ही हैं।
इस जीव का आदि उत्पत्ति-स्थान आनन्द ही है। आनन्द का पुत्र होने के कारण वह सदा आनन्द की ही खोज करता रहा है। ‘मैं सदा आनन्द में ही बना रहूँ’ यह इसकी स्वाभाविक इच्छा होती है, होनी भी चाहिये। कारण कि जनक के गुण अन्य में जरूर ही आते हैं। इसलिये आनन्द से ही उत्पन्न होने के कारण यह आनन्द में ही रहना भी चाहता है और अन्त में आनन्द में ही मिल भी जाता है। जल का एक बिन्दु समुद्र से पृथक होता है, पृथक होकर चाहे वह अनेकों स्थान में भ्रमण कर आवे, किंतु अन्त में सर्वत्र घूमकर उसे समुद्र में ही आना पड़ेगा। समुद्र के अतिरिक्त उसकी दूसरी गति ही नहीं। भाप बन के वह बादलों मे जायगा। बादलों से वर्ष बनकर पृथ्वी पर बरसेगा। पृथ्वी से बहकर तालाब में जायगा, तालाब से छोटी नदी में पहुँचेगा, उसमें से फिर बड़ी नदी में, इसी प्रकार महानद के प्रवाह के साथ मिलकर वह समुद्र में ही पहुँच जायगा।
क्रमशः
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