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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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कभी-कभी क्षुद्र तालाब के संसर्ग से उसमें दुर्गन्धि-सी भी प्रतीत होने लगेगी, किंतु चौमासे की महाबाढ़ में वह सब दुर्गन्धि साफ हो जायगी और वह भारी वेग के साथ अपने निर्दिष्ट स्थान पर पहुँच जायगा।

मनन करने वाले प्राणियों का मन एक-सा ही होता है। सर्वत्र उसकी गति एक ही भाँति से संचालन करती है। सम्पूर्ण शरीर में चित्त की वृत्तियाँ किसी एक निर्धारित नियम के ही साथ कार्य करती हैं। जीव का मुख्य लक्ष्य है अपने प्रियतम के साथ जाकर योग करना। उसे प्यारे के पास पहुँचे बिना शान्ति नहीं, फिर वहाँ जाकर उसका बनकर रहना या उसी के स्वरूप में अपने को मिला देना, यह तो अपने-अपने भावों के ऊपर निर्भर है। कुछ भी क्यों न हो, पास तो पहुँचना ही होगा। योग तो करना ही पड़ेगा। बिना योग के शान्ति नहीं, योग तभी हो सकता है, जब चित्तवृत्तियों का निरोध हो।चित्त बड़ा ही चंचल है, एकान्त में यह अधिकाधिक उपद्रव करने लगता है, इसलिये इसके निरोध का एक सरल-सा उपाय यही है कि जिन्होंने पूर्वजन्मों के शुभ संस्कारों से साधन करके या भगवत्कृपा प्राप्त करके अपनी चित्तवृत्तियों का थोड़ा-बहुत या सम्पूर्ण निरोध कर लिया है, उन्हीं के चित्त के साथ अपने चित्त को मिला देना चाहिये। कारण कि सजातीय वस्तु अपनी सजातीय वस्तु के प्रति शीघ्र आकृष्ट हो जाती है। इसीलिये सत्संग और संकीर्तन की इतनी अधिक महिमा गायी गयी है। यदि एक उद्देश्य से एक-मन और एक-चित्त होकर जो भी साधन किया जाय, तो पृथक-पृथक साधन करने की अपेक्षा उसका महत्त्व सहस्रों गुणा अधिक होता है और विशेषकर इस ऐसे घोर कलियुग के समय में जब सभी खाद्य पदार्थ भाव-दोष से दूषित हो गये हैं तथा विचार-दोष से गिरिशिखर, एकान्त स्थान आदि सभी स्थानों का वायुमण्डल दूषित बन गया है, ऐसे घोर समय में सत्पुरुषों के समूह में रहकर निरन्तर प्रेम से श्रीकृष्ण-संकीर्तन करते रहना ही सर्वश्रेष्ठ साधन है। स्मृतियों में भी यही वाक्य मिलता है- 'संघे शक्तिः कलौ स्मृता’। कलियुग में सभी प्रकार के साधन संघ-शक्ति से ही फलीभूत हो सकते हैं और कलियुग में ‘कलौ केशवकीर्तनात्’ अर्थात केशव-कीर्तन ही सर्वश्रेठ साधन है। इसलिये इन सभी बातों से यही सिद्ध हुआ कि कलिकाल में सब लोग एक-चित्त और एक-मन से एकान्त स्थान में निरन्तर केशव का कीर्तन करें तो प्रत्येक साधक को अपने-अपने साधन में एक-दूसरे से बहुत अधिक मदद मिल सकती है। यही सब समझ-सोचकर तो संकीर्तनावतार श्रीचैतन्यदेव ने संकीर्तन की नींव डाली। वे इतने बड़े भावावेश में आकर भी वनों में नहीं भाग गये। उस प्रेमोन्माद की अवस्था में, जिसमें कि घर-बार, भाई-बन्धु सभी भूल जाते हैं, वे लोगों में ही रहकर श्रीकृष्ण-कीर्तन करते रहे और अपने आचरण से लोक-शिक्षा देते हुए जगदुद्धार करने में संलग्न-से ही बने रहे। यही उनकी अन्य महापुरुषों से विशेषता है।

महाप्रभु की दशा अब कुछ-कुछ गम्भीरता को धारण करती जाती है, अब वे कभी-कभी होश में भी आते हैं और भक्तों से परस्पर में बातें भी करते हैं। चिरकाल से आशा लगाये हुए बैठे कुछ भक्त प्रभु के पास आये और सभी ने मिलकर प्रतिदिन संकीर्तन करने की सलाह की। प्रभु ने सबकी सम्मति सहर्ष स्वीकार की और भक्ताग्रगण्य श्रीवास के घर संकीर्तन का सभी आयोजन होने लगा। रात्रि के समय छँटे-छँटे भगवद्भक्त वहाँ आकर एकत्रित होने लगे। प्रभु ने सबसे पहले संकीर्तन आरम्भ किया। सभी ने प्रभु का साथ दिया।संकीर्तन करते-करते प्रभु भावावेश में आकर ताण्डव नृत्य करने लगे। शरीर की किंचिन्मात्र भी सुध-बुध नहीं रही। एक प्रकार के महाभाव में मग्न होकर उनका शरीर अलातचक्र की भाँति निरन्तर घूम रहा थ। न तो किसी को उनके पद ही दिखायी देते थे और न उनका घूमना ही प्रतीत होता था। नृत्य करते-करते उन्हें एक प्रकार की उन्मादकारी बेहोशी-सी आ गयी और उसी बेहोशी में वे मुर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। भक्तों ने इन्हें बड़े यत्न से उठाया। थोड़ी देर के अनन्तर इन्होंने रोते-रोते भक्तों से कुछ कहना आरम्भ किया- ‘भाई! मैं क्या करूँ, मेरा मन अब मेरे वश में नहीं है। मैं जो कहना चाहता हूँ, उसे कह नहीं सकता। कितने दिनों से मैं तुमसे एक बात कहने के लिये सोच रहा हूँ, किंतु उसे अभी तक नहीं कह सका हूँ। आज मैं तुम लोगों से उसे कहूँगा। तुम लोग सावधानी के साथ श्रवण करो।’

प्रभु के ऐसा कहने पर सभी भक्त स्थिर-भाव से चुपचाप बैठ गये और एकटक होकर उत्सुकता के साथ प्रभु के मुखचन्द्र की ओर निहारने लगे। प्रभु ने साहस करके गम्भीरता के साथ कहना आरम्भ किया- ‘आप लोग तो अपने परम आत्मीय हैं, आपके सामने गोप्य ही क्या हो सकता है? इसलिये सबके सामने प्रकट न करने योग्य इस बात को मैं आपके समक्ष बताता हूँ। जब मैं गया से लौट रहा था, तब नाटशाला ग्राम में एक श्यामवूर्ण का परम सुन्दर बालक मेरे समीप आया। उसके लाल-लाल कोमल चरणों में सुन्दर नूपुर बँधे हुए थे। पैरों की उँगलियाँ बड़ी ही सुहावनी तथा क्रम से छोटी-बड़ी थीं। कमर में पीताम्बर बँधा हुआ था। पेट त्रिवली से युक्त और नाभि गोल तथा गहरी थी।

वक्षःस्थल उन्नत और मांस से भरा हुआ था। गले की एक भी हड्डी दिखायी नहीं देती थी। गले में वनमाला तथा गुंजों की मालाएँ पड़ी हुई थीं। कानों में सुन्दर कुण्डल झलमल कर रहे थे। वह कमल के समान दोनों मनोहर नेत्रों से तिरछी निगाह से मेरी ओर देख रहा था, उसके सुन्दर गोल कपोलों के ऊपर काली-काली लटें लहरा रही थीं। वह मन्द-मन्द मुस्कान के साथ मुरली बजा रहा था। उस मुरली की मनोहर तान को सुनकर मेरा मन मेरे वश में नहीं रहा। मैं बेहोश हो गया और फिर वह बालक न जाने कहाँ चला गया?’ इतना कहते-कहते प्रभु बेहोश हो गये। उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी।
शरीर के सम्पूर्ण रोम बिलकुल खड़े हो गये। वे मूर्च्छित दशा में ही इस श्लोक को पढ़ने लगे-

 
अमूल्यधन्यानि दिनान्तराणि
हरे! त्वदालोकनमन्तरेण।
अनाथ बन्धे! करूणैकसिन्धो!
हा हन्त! हा हन्त!! कथं नयामि।।
क्रमशः

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