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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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शचीदेवी भी प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद देतीं- ‘भगवान की कृपा से मेरी बेटी को योग्य पति प्राप्त हो।’ कन्या इस आशीर्वाद को सुनती और लज्जितभाव से नीची निगाह करके चली जाती।

एक दिन शचीमाता ने उस कन्या को बुलाकर पूछा- ‘बेटी! तेरा क्या नाम है?’

लजाते हुए नीचे की ओर दृष्टि करते हुए धीरे से कन्या ने कहा- ‘विष्णुप्रिया’।

माता ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- ‘अहा, ‘विष्णुप्रिया’ कैसा सुन्दर नाम है? जैसा सुन्दर शील-स्वभाव है उसी के अनुरूप सुन्दर नाम भी।’ फिर पूछा- ‘बेटी! तेरे पिता का क्या नाम है’? विष्णुप्रिया यह सुनकर चुपचाप ही खड़ी रहीं। उन्होंने इस प्रश्न का कुछ भी उत्तर नहीं दिया। तब शचीमाता ने पुचकारते हुए कहा- ‘बता दे बेटी! बताने में क्या हर्ज है, क्या नाम है तेरे पिता का?’
लजाते हुए और शरीर को कुछ टेढ़ा करते हुए धीरे से विष्णुप्रिया ने कहा- ‘राजपण्डित!’ माता ने जल्दी से कहा- पं. सनातन मिश्र की लड़की है तू? तब बताती क्यों नहीं है? राजपण्डित की पुत्री भी राजपुत्री होती है, तभी नहीं बताती थी, क्यों यही बात है न?’

विष्णुप्रिया लजाती हुई चुपचाप खड़ी रही। माता ने उससे और भी दो-चार बातें पूछकर उसे विदा किया। विष्णुप्रिया का शील-स्वभाव और सौन्दर्य शचीमाता की दृष्टि में गड़-सा गया था। वे बार-बार यही सोचने लगीं- ‘क्या ही अच्छा हो यदि यह लड़की मेरी पुत्र-वधू बन जाय? वे रोज घाट पर विष्णुप्रिया को देखतीं और उससे दो-चार बातें जरूर करतीं।

विष्णुप्रिया का अद्भुत रूप-लावण्य, उनकी अत्यन्त कोमल प्रकृति, प्रशंसनीय शील-स्वभाव और अनुपम विष्णु-भक्ति की वे मन-ही-मन बार-बार सराहना करतीं। इसलिये वे उनके प्रति अधिकाधिक प्रेम प्रदर्शित करने लगीं। विष्णुप्रिया के मन में भी इनके प्रति भक्ति बढ़ने लगी।

शचीमाता बार-बार सोचतीं- ‘क्या हर्ज है, एक बार सनातन मिश्र से पुछवाऊँ तो सही, बहुत करेंगे वे अस्वीकार ही कर देंगे।’ फिर सोचतीं- ‘वे राजपण्डित हैं, धनाढ्य हैं, सब जगह उनकी भारी प्रतिष्ठा है, वे एक विधवा के पुत्र के साथ अपनी पुत्री का सम्बन्ध क्यों करने लगे।’ यही सोचकर कुछ डर-सी जातीं और उनका साहस नहीं होता।

एक दिन उन्होंने साहस करके काशीनाथ मिश्र नाम के घटक को बुलाया और उनसे बोलीं- ‘मिश्रजी! तुमने सनातन मिश्र की लड़की देखी है?’

घटक ने कहा- ‘लड़की मैंने देखी है, बड़ी ही सुन्दर, सुशील तथा गुणवती है। निमाई के वह सर्वथा योग्य है। मैं समझता हूँ तुम उस लड़की को अपनी पुत्र-वधू बनाकर जरूर प्रसन्न होगी।’

माता ने कहा- ‘यह तो तुम ठीक कहते हो, किन्तु वे धनाढ्य हैं, राजपण्डित हैं। बहुत सम्भव है वे इस सम्बन्ध को न स्वीकार करें। हमारी तो तुम दशा देखते ही हो, वैसे लड़की को अन्न-वस्त्र का तो घाटा न होगा।’

घटक ने जोर देकर कहा- ‘माता जी! तुम कैसे बात करती हो? भला, निमाई-जैसे योग्य, प्रतिष्ठित पण्डित को जमाई बनाने में कौन अपना सौभाग्य न समझेगा? मैं समझता हूँ, वे इसे सहर्ष स्वीकार कर लेंगे। मैं आज ही उनके यहाँ जाऊँगा और शाम को ही तुम्हें उत्तर दे जाऊँगा।’ यह कहकर काशीनाथ मिश्र माता को प्रणाम करके चले गये।

इधर पण्डित सनातन मिश्र बहुत दिनों से चाह रहे थे कि विष्णुप्रिया का सम्बन्ध निमाई पण्डित के साथ हो जाता तो बहुत अच्छा होता किन्तु वे भी मन में कुछ संकोच करते थे कि निमाई आजकल नामी पण्डित समझे जाते हैं।इस बीस बरस की ही अल्पावस्था में उन्होंने इतनी भारी ख्याति प्राप्त कर ली है, बहुत सम्भव है वे इस सम्बन्ध को स्वीकार न करें। यदि हमारी प्रार्थना पर भी उन्होंने इस सम्बन्ध को स्वीकार न किया तो इसमें हमारा बहुत अपमान होगा। प्रायः धनी लोग अपने मान का बहुत ध्यान रखते हैं, इसी भय से उन्होंने इच्छा रहने पर भी आज तक यह बात किसी पर प्रकट नहीं की थी।

सनातन मिश्र के हृदय में इसी प्रकार के विचार उठ ही रहे थे कि उसी बीच काशीनाथ घटक उनके समीप आ पहुँचे। घटक को देखकर उन्होंने इनका सम्मान किया, बैठने को आसन दिया और आने का कारण जानना चाहा। काशीनाथ घटक ने आदि से अन्त तक सब बातें कहकर अन्त में कहा- ‘शचीमाता ने मुझे बुलाकर स्वयं कहा है। इस बात को मैं अपनी ओर से कहता हूँ कि आपको अपनी पुत्री के लिये इससे अच्छा वर दूसरी जगह कठिनता से मिलेगा।’

प्रसन्नता प्रकट करते हुए सनातन मिश्र ने कहा- ‘निमाई पण्डित कोई अप्रसिद्ध मनुष्य तो हैं ही नहीं। देशभर में उनका यशोगान हो रहा है। उन्हें जामाता बनाने में मैं अपना परम सौभग्य समझता हूँ मेरी भी चिरकाल से यही इच्छा थी, किन्तु इसी संकोच से आज तक किसी पर प्रकट नहीं की कि वे सम्भव है स्वीकार न करें।’

घटक ने कहा- ‘इस बात की आप तनिक भी चिन्ता न करें, शची देवी जो कह देंगी वही होगा, निमाई उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई काम नहीं कर सकते।’

सनातन मिश्र के घर में जब स्त्रियों ने यह बात सुनी तो उनकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। कोई कहने लगी- ‘लड़की का भाग्य खुल गया।’ कोई-कोई विष्णुप्रिया के ही सामने कहने लगी- ‘इतने दिन का इसका गंगा-स्नान और विष्णु-पूजा आज सफल हुई, साक्षात विष्णु के ही समान इसे वर मिल गया।’ ये सब बातें सुनकर विष्णुप्रिया लजाती हुई उठकर दूसरी ओर चली गयीं। स्त्रियाँ और भी भाँति-भाँति की बातें करने लगीं।

राजपण्डित सनातन मिश्र की स्वीकृति लेकर घटक महाशय सीधे शचीमाता के समीप पहुँचे और उन्हें यह शुभ संवाद सुना दिया। सुनकर शचीमाता को बड़ी प्रसन्नता हुई और उसी समय विवाह की तिथि आदि भी निश्चय करा दी।

सनातन मिश्र के यहाँ तिथि आदि की सभी बातें पक्की करके काशीनाथ घटक आ ही रहे थे कि रास्ते में अकस्मात उनकी निमाई पण्डित से भेंट हो गयी।ने उन्हें आलिंगन करते हुए कहा- ‘किधर से आ रहे हैं?’ आप तो सदा घटया ही करते हैं। कहिये किसे घटकर आये हैं?

हँसते हुए घटक ने कहा- ‘घटाकर तो नहीं आये हैं बढ़ाने की ही फ़िक्र है, तुम्हें एक से दो करना चाहते हैं। बताओ, क्या सलाह है?’ कुछ आश्चर्य-सा प्रकट करते हुए निमाई पण्डित ने कहा- ‘मैं आपकी बात का मतलब नहीं समझा। कैसा बढ़ाना, स्पष्ट बताइये?’
क्रमशः

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