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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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यह सुनकर एक सरल- से विद्यार्थी ने प्रश्न किया- ‘गुरुजी! जो ब्राह्मण नहीं हैं केवल ब्रह्मबन्धु हैं, उनका तो इतना सत्कार नहीं करना चाहिये। वे तो केवल काष्ठ की हस्ती के समान नाममात्र के ही ब्राह्मण हैं, जैसे काष्ठ के हाथी से हाथीपने का कोई भी काम नहीं चलने का, उसी प्रकार जो अपने धर्म-कर्म से हीन है, जिसने विद्या प्राप्त नहीं की, उस नाममात्र के ब्राह्मण का हम आदर क्यों करें?’
निमाई पण्डित ने थोड़ी देर सोचने के अनन्तर कहा- ‘तुम्हारा कथन एक प्रकार से ठीक ही है, जो अपने धर्म-कर्म से रहित है, वह तो दूध न देने वाली वन्ध्या गौ के समान है, उससे संसारी स्वार्थ कोई सध नहीं सकता। फिर भी जो सभी कामों को सकाम भाव से नहीं करते हैं, जो श्रद्धा के साथ शास्त्रों की आज्ञानुसार अपने को ही सुधारने का सदा प्रयत्न करते रहते हैं, वे दूसरों के दोषों के प्रति उदासीन रहते हैं। हम दोषदृष्टि से देखना आरम्भ करेंगे तब तो संसार में एक भी मनुष्य दोष से रहित दृष्टिगोचर नहीं होगा। संसार ही दोष-गुण के सम्मिश्रण से बना है! इसलिये अपनी बुद्धि को संकुचित बनाकर गौ की सेवा करने में यह बुद्धि रखना ठीक नहीं कि जो गौ अधिक दूध देगी हम उसी की सेवा करेंगे। जो दूध नहीं देती, उससे हमें क्या मतलब? ऐसी बुद्धि रखने से तो विचारों में संकुचितता आ जायगी। तुम तो शास्त्र की आज्ञा समझकर गौमात्र में श्रद्धा रखो। यह तो स्वाभाविक ही होगा कि जो गौ सुशील, सुन्दर तथा दुधारी होगी, उसकी सभी लोग इच्छा-अनिच्छापूर्वक सेवा-शुश्रूषा करेंगे और अश्रद्धालु पुरुषों को भी सुमिष्ट दूध के लालच से प्रभावान्वित होकर ऐसी गौ की सेवा करते हुए देखा गया है, किन्तु यह सर्वश्रेष्ठ पक्ष नहीं है।सर्वश्रेष्ठ तो यही है कि मन में किसी भी प्रकार का पक्षपात न करके केवल शास्त्राज्ञा समझकर और अपना कर्तव्य मानकर गो-ब्राह्मणमात्र की सेवा करें। किन्तु ऐसे श्रद्धालु संसार में बहुत ही थोडे़ होते हैं। भगवान ने स्वयं क्रुद्ध हुए भृगु को अपनी छाती में जोर से लात मारते देखकर बड़ी नम्रता से दुःख प्रकट करते हुए कहा था- अतीव कोमलौ तात चरणौ ते महामुने।
अर्थात हे ब्राह्मणदेव! आपके कोमल चरणारविन्दों को मेरी इस वज्र-सी छाती में लगने पर बड़ा कष्ट हुआ होगा।
ये बहुत ऊँचे साधक के भाव हैं, जो संसारी मान-प्रतिष्ठा तथा धन और विषयभोगों की इच्छा को सर्वथा त्याग कर एकमात्र भगवत-कृपा को ही अपने जीवन का चरम लक्ष्य समझकर सभी कार्यों को करते हैं, उन्हीं के लिये भगवान अपने श्रीमुख से फिर स्वयं उपदेश करते हैं-
ये ब्राह्मणान्मयि धिया क्षिपतोऽर्चयन्त-
स्तुष्यद्धृदः स्मितसुधोक्षितपद्मवक्त्राः।
वाण्यानुरागकलयात्मजवद्गृणन्तः
सम्बोधयन्त्यहमिवाहमुपाहृतस्तैः।।
‘जो पुरुष वासुदेव-बुद्धि रखकर कठोर बोलने वाले ब्राह्मणों की भी प्रसन्न अन्तःकरण से कमल के समान प्रफुल्लित मुख द्वारा अपनी अमृतमयी वाणी से प्रसन्नचित्त होकर स्तुति करते हैं और पिता के क्रुद्ध होने पर जिस प्रकार पुत्रादि क्रुद्ध न होकर उनका सत्कार ही करते हैं, उसी प्रकार उन्हें प्रेमपूर्वक बुलाते हैं, तो समझ लो ऐसे पुरुषों ने मुझे अपने वश में ही कर लिया है।’ क्रुद्ध होने वाले किसी भी प्राणी पर जो क्रोध नहीं करता वही सच्चा साधक और परमार्थी है। प्रभु के पाद-पद्मों की प्राप्ति ही जिसका एकमात्र लक्ष्य है, उसके हृदय में दूसरों के प्रति असम्मान के भाव आ ही नहीं सकते। इसलिये तुम लोग शीघ्र जाकर इस ग्राम के किसी ब्राह्मण का पादोदक लाकर मेरे मुख में डाल दो।’
इनकी आज्ञा पाकर दो-तीन विद्यार्थी गये और एक परम शुद्ध वैष्णव ब्राह्मण के चरणों को धोकर उसका चरणोदक ले आये। यह तो इनकी लोगों को ब्राह्मणों का महत्त्व प्रदर्शित करने की लीला थी। चरणोदक का पान करते ही ये झट से अच्छे हो गये और अपने सभी साथियों के साथ आगे बढ़ने लगे। पुनपुना-तीर्थ में पहुँचकर इन सब लोगों ने पुनपुन नाम की नदी में स्नान किया और सभी ने अपने-अपने पितरों का श्राद्धादि कराया। इसके अनन्तर सभी श्रीगयाधाम में पहुँच गये।
ब्रह्मकुण्ड में स्नान और देव-पितृ-श्राद्धादि करके निमाई पण्डित अपने साथियों के सहित चक्रवेड़ा के भीतर विष्णु-पाद-पद्मों के दर्शनों के निमित्त गये। ब्राह्मणों ने पाद-पद्मों पर माला-पुष्प चढ़ाने को कहा। ये अपने विद्यार्थियों के द्वारा गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, माला आदि सभी पूजन की बहुत-सी सामग्री साथ लिवाते गये थे।गयाधाम के तीर्थ-पण्डा जोरों से पाद-पद्मों का प्रभाव वर्णन कर रहे थे। वे उच्च स्वर से कह रहे थे- ‘इन्हीं पाद-पद्मों के धोवन से जगत-पावनी मुनि-मन-हारिणी भगवती भागीरथी की उत्पत्ति हुई है। इन्हीं चरणों का लक्ष्मी जी बड़ी श्रद्धा के साथ निरन्तर सेवन करती रहती हैं। इन्हीं चरणों का ध्यान योगीजन अपने हृदय-कमल में निरन्तर करते रहते हैं। इन्हीं चरणों को प्रभु ने गयासुर के मस्तक पर रखकर उसे सद्गति प्रदान की थी।’
असंख्य लोगों की भीड़ थी, हजारों आदमी पाद-पद्मों के दर्शन कर रहे थे और बीच-बीच में जय-घोष करते जाते थे। पण्डा लोग उनसे भेंट चढ़ाने का आग्रह कर रहे थे। बार-बार पाद-पद्मों का पुण्य-माहात्म्य सुनाया जा रहा था। पाद-पद्मों का माहात्म्य सुनते ही निमाई पण्डित आत्मविस्मृत हो गये। उन्हें शरीर का होश नहीं रहा। शरीर थर-थर काँपने लगा, युगल अरुण ओष्ठ कोमल पल्लव की भाँति हिलने लगे। आँखों से निरन्तर अश्रुधारा बहने लगी। उनके चेहरे से भारी तेज निकल रहा था। वे एकटक पाद-पद्मों की ओर निहार रहे थे। वे कहाँ खड़े हैं, उनके पास कौन है, किसने उन्हें स्पर्श किया, इन सभी बातों का उन्हें कुछ भी पता नहीं है। वे संज्ञाशून्य-से होकर काँप रहे हैं, उनका शरीर उनके वश में नहीं है, वे मूर्च्छित होकर गिरने वाले ही थे कि सहसा एक तेजस्वी संन्यासी का सहारा लगने से वे गिरने से बच गये। उनके साथियों ने उन्हें पकड़ा और भीड़ से हटाकर जल्दी से बाहर ले गये।बाहर पहुँचकर उन्हें कुछ होश आया और वे निद्रा से उठे मनुष्य की भाँति अपने चारों ओर आँखें उठा-उठाकर देखने लगे। सहसा उनकी दृष्टि एक लम्बे-से तेजस्वी संन्यासी पर पड़ी। वे उन्हें देखकर एक साथ चौंक उठे, उनके आनन्द का वारापार नहीं रहा। इन्होंने दौड़कर संन्यासी जी के चरण पकड़ लिये।
क्रमशः
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