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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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इनके सभी साथी इनकी ऐसी अलौकिक दशा देखकर चकित रह गये और इनका भाँति-भाँति से प्रबोध करने लगे, किन्तु ये किसी की मानते ही नहीं थे। इस प्रकार रुदन तथा प्रलाप में रात्रि हो गयी। सभी साथी तथा शिष्यगण सुख की नींद में सो गये, किन्तु इन्हें नींद कहाँ? सुखी संसार सुखरूपी मोह-निशा में शयन कर सकता है, किन्तु जिनके हृदय में विरह-वेदना की तीव्र ज्वाला उठ रही है, उनके नयनों में नींद कहाँ? सबके सो जाने पर ये जल्दी से उठ खड़े हुए और रात्रि में ही रुदन करते हुए व्रज की ओर दौड़े। इनके प्राण श्रीकृष्ण से मिलन के लिये छटपटा रहे थे। इन्होंने साथी तथा शिष्यों की कुछ भी परवा न की और घोर अन्धकार में अकेले ही अलक्षित स्थान की ओर चल पड़े। ये थोड़ी दूर ही चले होंगे कि इन्हें मानो अपने हृदय में एक दिव्य वाणी सुन पड़ी। इन्हें भास हुआ मानो कोई अलक्षित भाव से कह रहा है- ‘तुम्हारा व्रज में जाने का अभी समय नहीं आया है, अभी कुछ काल और धैर्य धारण करो। अभी अपने सत्संग से नवद्वीप के भक्तों को आनन्दित करके प्रेमदान करो। योग्य समय आने पर ही तुम व्रज में जाना।’ आकाशवाणी का आदेश पाकर ये लौटकर अपने स्थान पर आ गये और आकर अपने आसर पर पड़ गये।

नदिया में प्रत्यागमन...

प्रेम में पागल हुए उन मतवालों के दर्शान जिन लोगों को स्वप्न में भी कभी हो जाते हैं, वे संसार में बड़भागी हैं, फिर ऐसे भक्तों के निरन्तर सत्संग का सौभाग्य जिन्हें प्रापत हो सका है, उनके भाग्य की तो भला सराहना कर ही कौन सकता है? इसीलिये तो महाभागवत विदुर जी ने भगवत-दासों के दासों का दास बनने में ही अपने को कृतकृत्य माना है। सचमुच भगवत-संगियों का संग बड़ा ही मधुमय, आनन्दमय और रसमय होता है। उनका क्षणभर का भी संसर्ग हमें संसार से बहुत दूर ले जाता है। उनके दर्शनमात्र से ही आनन्द उमड़ने लगता है।

निमाई पण्डित को मन्त्र-दीक्षा देकर श्रीईश्वरपुरी किधर और कहाँ चले गये, इसका अन्त तक किसी को पता नहीं चला। उन्होंने सोचा होगा, जगत-पूज्य प्रेमावतार लोक-शिक्षा के निमित्त गुरु मानकर हमें प्रणाम करेंगे, यह हमारे लिये अहसनीय होगा, इसलिये अब इस संसार में प्रकट रूप से नहीं रहना चाहिये। इसीलिये वे उसी समय अन्तर्धान हो गये। फिर जाकर कहाँ रहे, इसका ठीक-ठीक पता नहीं। इधर प्रातःकाल निमाई पण्डित उठे। लोगों ने देखा उनके शरीर का सारा कपड़ा आँसुओं से भीगा हुआ है, वे क्षणभर के लिये भी रात्रि में नहीं सोये थे। रातभर ‘हा कृष्ण! मेरे प्यारे! मुझे छोड़कर किधर चले गये?’ इसी प्रकार विरहयुक्त वाक्यों के द्वारा रुदन करते रहे। इनकी ऐसी विचित्र अवस्था देखकर अब साथियों ने गया जी में अधिक ठहरना उचित नहीं समझा। इनके शिष्य इन्हें बड़ी सावधानी के साथ इनके शरीर को सँभालते हुए नवद्वीप की ओर ले चले। ये किसी अचैतन्य पदार्थ की भाँति शिष्यों के सहारे से चलने लगे। शरीर का कुछ भी होश नहीं है। कभी-कभी होश में आ जाते हैं, फिर जोरों से चिल्ला उठते हैं, ‘हा कृष्ण! किधर चले गये?

प्राणनाथ! रक्षा करो! पतितपावन! इस पापी का भी उद्धार करो।’ इस प्रकार ये श्रीकृष्ण प्रेम में बेसुध हुए साथियों के सहित कुमारहट्ट नाम के ग्राम में आये। जिनसे इन्होंने श्रीकृष्ण-मन्त्र की दीक्षा ली थी, जिन्होंने इन्हें पण्डित से पागल बना दिया था, उन्हीं श्रीईश्वरपुरी जी का जन्मस्थान इसी कुमारहट्ट नामक ग्राम में था। प्रभु ने उस नगरी को दूर से ही साष्टांग प्रणाम किया। फिर साधारण लोगों को गुरुमहिमा का महत्त्व बताने के लिये इन्होंने उस ग्राम की धूलि अपने वस्त्र में बाँध ली और साथियों से कहा- ‘इस धूलि में कभी श्रीगुरुदेव के चरण पड़े होंगे।
बाल्यकाल में हमारे गुरुदेव का श्रीविग्रह इसमें कभी लोट-पोट हुआ होगा। इसलिये यह रज हमारे लिये अत्यन्त ही पवित्र है। इससे बढ़कर त्रिलोकी में कोई भी वस्तु नहीं हो सकती। कुमारहट्ट का कुत्ता भी हमारे लिये वन्दनीय है। जिस स्थान में हमारे गुरुदेव ने जन्म धारण किया है, जहाँ की पावन भूमि में उन्होंने क्रीड़ा की है, वह हमारे लिये लाखों तीर्थों से बढ़कर है।’ इस प्रकार गुरुदेव का माहात्म्य प्रदर्शन करते हुए वह आगे बढ़े और थोड़े दिनों में नवद्वीप पहुँच गये। इनके गया से लौट आने का समाचार सुनकर सभी इष्ट-मित्र, स्नेही तथा छात्र इनके दर्शन के लिये आने लगे। कोई आकर इन्हें प्रणाम करता, कोई चरण-स्पर्श करता, कोई गले लगकर मिलता। ये भी सबका यथोचित आदर करते। किसी को पुचकारते, किसी को आशीर्वाद देते, किसी के सिर पर हाथ रख देते और जो अवस्था में बड़े थे और इनके माननीय थे, उन्हें ये स्वयं प्रणाम करते। वे इन्हें भाँति-भाँति के आशीर्वाद देते। शचीमाता तथा विष्णुप्रिया के आनन्द का तो कुछ ठिकाना ही नहीं था। वे मन-ही-मन प्रसन्न हो रही थीं। उस भारी भीड़ में वे दोनों एक ओर चुपचाप बैठी थीं। सबसे मिल लेने पर इन्होंने प्रेमपूर्वक सभी को विदा किया और स्वयं स्नानादि में लग गये। इनका भाव विचित्र था, शरीर की दशा एकदम परिवर्तित हो गयी थी। माता को इनकी ऐसी दशा देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ, किन्तु वे कुछ पूछ न सकीं।

तीसरे पहर जब ये स्वस्थ होकर बैठे तब श्रीमान पण्डित सदाशिव कविराज, मुरारी गुप्त आदि इनके अन्तरंग स्नेही इनके समीप आकर गया-यात्रा का वृत्तान्त पूछने लगे। सबकी जिज्ञासा देखकर इन्होंने कना प्रारम्भ किया- ‘पुरी की यात्रा का क्या वर्णन करूँ? मैं तो पागल हो गया। जिस समय पादपद्मों का माहात्म्य मेरे कानों में पड़ा, जब मैंने सुना कि प्रभु के पादपद्म सभी प्रकार के प्राणियों को पावन और प्रेममय बनाने वाले हैं, पापी-से-पानी प्राणी भी इन पादपद्मों का सहारा पाकर अपार संसार-सागर से सहज में ही तर जाता है, जिन पादपद्मों के प्रक्षालित पय से त्रिलोकपावनी भगवती भागीरथी निकली हैं, उन पादपद्मों के दर्शन करने से किसे परमशान्ति न मिल सकेगी?’ इतना सुनते ही मैं बेहोश हो गया।प्रभु अन्तिम शब्दों को ठीक-ठीक कह भी न पाये थे कि वे बीच में ही बेहोश होकर गिर पड़े। लोगों को इनकी ऐसी दशा देखकर महान आश्चर्य हुआ।
क्रमशः

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