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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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यह सौभाग्य की बात है कि निमाई-जैसे पण्डित परम भागवत वैष्णव बन गये।’ इस प्रकार सभी अपनी-अपनी बुद्धि के अनुरूप भाँति-भाँति की बातें कहने लगीं। सबसे मिल-जुलकर निमाई घर लौट आये।
वही प्रेमोन्माद.....
जिसके हृदय में भगवत्प्रेम उत्पन्न हो गया, उसे फिर अन्य संसारी बातें भली ही किस प्रकार लग सकती हैं? जिसकी जिह्वा ने मिश्री का रसास्वाद कर लिया फिर वह गुड़ के मैल को आनन्द और उल्लास के साथ स्वेच्छा से कब पसन्द कर सकती है? स्थायी प्रेम प्राप्त होने पर तो मनुष्य सचमुच पागल बन जाता है, फिर उसे इस बाह्य-संसार का होश ही नहीं रहता। जिन्हें किन्हीं महापुरुष की कृपा से या किसी पुण्य-स्थान के प्रभाव के क्षणभर के लिये प्रेमावेश हो जाता है, वह तो वास्तव में प्रेम की झलक है। जैसे पर्वत के शिखर के ऊपर के बने हुए मन्दिर की किंचिन्मात्र धुँधली-सी चोटी देखकर सैकड़ों कोस दूर से ही कोई पथिक आनन्द में उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे कि हम तो अपने गन्तव्य स्थान तक पहुँच गये। यही दशा उस क्षणिक प्रेमी की है। वास्तव में अभी वह सच्चे प्रेम से बहुत दूर है। प्रेममार्ग में यथार्थ रीति से प्रवेश हो जाने पर तो उसकी वृत्ति संसारी विषयों में प्रवेश कर ही नहीं सकती। वह तो सदा प्रेम-मद में उन्मत्त-सा ही बना रहेगा। वह न तो क्षणभर में ऊपर ही चढ़ जायगा और न दूसरे ही क्षण में नीचे गिर जायगा। उसकी स्थिति तो सदा एक-सी बनी रहेगी। कबीरदास जी कहते हैं-
छनहिं चढ़ै छन ऊतरै, सो तो प्रेम न होय।
अघट प्रेम पिंजर बसै, प्रेम कहावै सोय।।
वास्तव में प्रेमी की स्थिति तो सदा एक ही रस रहती है, उसे प्रतिक्षण अपने प्रियतम से मिलने की छटपटाहट होती रती है। वह सदा अतृप्त ही बना रहता है। प्यारे के सिवा उसका दूसरा कोई है ही नहीं। उसका प्रियतम उसे चाहता है या नहीं इसकी उसे परवा नहीं। इस बात का वह स्वप्न में भी ध्यान नहीं करता। वह तो अपने प्यारे को ही सर्वस्व समझकर उसकी स्मृति में सदा अधीर-सा बना रहता है। रसिक रसखाने ने प्रेम के स्वरूप का क्या ही सुन्दर वर्णन किया है-
इक अंगी बिनु कारनहिं, इकरस सदा समान।
गनै प्रियहिं सर्वस्व जो, सोई प्रेम प्रमान।।
महाप्रभु चैतन्यदेव का प्रेम ऐसा ही था। उनकी हृदय-कन्दरा से जो भक्ति-भाव का भव्य स्त्रोत उदित हो गया, वह फिर सदा उत्तरोत्तर बढ़ता ही गया।उनकी हृदय-कन्दरा से उत्पन्न हुई भक्ति-भगीरथी की धारा सावन-भादों की क्षुद्र नदी की भाँति नहीं थी जो थोड़े समय के लिये तो खूब इठलाकर चलती है ओर जेठ-मास की तेज धूप पड़ते ही सूख जाती है। उनके हृदय से उत्पन्न हुई प्रेम-सरिता की धारा सदा बहकर समुद्र में ही जाकर मिलने वाली स्थायी थी। उसमें कमी का क्या काम? वह तो उत्तरोत्तर बढ़ने वाली अलौकिक और अनुपम धारा थी, उसकी उपमा इन संसारी धाराओं से दी ही नहीं जा सकती। वह तो अनुभवगम्य ही है। महाप्रभु जब से गया से लौटकर आये हैं, तभी से उनकी विचित्र दशा है। वे भोजन करते-करते सहसा बीच में ही उठकर रुदन करने लगते हैं, रास्ता चलते-चलते पागलों की भाँति नृत्य करने लगते हैं। शय्या पर लेटे-लेटे सहसा उठकर बैठ जाते हैं और ‘हा कृष्ण! हा कृष्ण!’ कहकर जोरों से चिल्लाने लगते हैं। कभी-कभी लोगों से बातें करते-करते बीच में ही जोरों से ठहाका मारकर हँसने लगते हैं। रात भर सोने का नाम नहीं। लम्बी-लम्बी साँसें लेते रहते हैं, अधीर होकर अत्यन्त विरही की भाँति हिचकियाँ भरते रहते हैं और उनके नेत्रों से इतना जल निकलता है कि सम्पूर्ण वस्त्र गीले हो जाते हैं।
विष्णुप्रिया इनकी ऐसी दशा देखकर भयभीत हो जाती हैं और जाकर अपनी सास से सभी बातों को कहती हैं। शचीमाता पुत्र की दशा देखकर दुःख से कातर होकर रुदन करने लगती हैं और सभी देवी-देवताओं की मनौती मानती हैं। वे करुणाभाव से अधीर होकर प्रभु के पादपद्मों में प्रार्थना करती हैं- ‘हे अशरणशरण! इस दीन-हीन कंगालिनी विधवा के एकमात्र पुत्र के ऊपर कृपा करो। दयालो! मैं धन नहीं चाहती, भोग नहीं चाती, सुन्दर वस्त्राभूषण तथा सुस्वादु भोजन की मुझे इच्छा नहीं। मेरा प्यारा, मेरे जीवन का सहारा, मेरी आँखों का तारा यह निमाई स्वचछ और नीरोग बना रहे, यही मेरी प्रार्थना है।’ माता बार-बार निमाई के मुख की ओर देखतीं और उनकी ऐसी दयनीय दशा देखकर अत्यन्त ही दुःखी होतीं।
महाप्रभु अब जो भी काम करना चाहते, उसे ही नहीं कर सकते। काम करते-करते उन्हें अपने प्रियतम की याद आ जाती और उसी के विरह में बेहोश होकर गिर पड़ते। ठीक-ठीक भोजन भी नहीं कर सकते। स्नान, सन्ध्या, पूजा का उन्हें कुछ भी होश नहीं, मुख से निरन्तर श्रीकृष्ण के मधुर नामों का ही अपने-आप उच्चारण होता रहता है। किसी की बात का उत्तर भी देते हैं तो उसमें भी भगवान की अलौकिक लीलाओं का ही वर्णन होता है। किसी से बातें भी करते हैं, तो श्रीकृष्ण के ही सम्बन्ध की करते हैं। अर्थात वे श्रीकृष्ण के सिवा कुछ जानते ही नहीं हैं। श्रीकृष्ण ही उनके प्राण हैं, श्रीकृष्ण ही उने धन हैं अर्थात उनके सर्वस्व श्रीकृष्ण ही हैं, उनके लिये संसार में श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं।
प्रभु के सब विद्यार्थियों ने जब सुना कि गुरुजी गयाधाम की यात्रा करके लौट आये हैं, तो एक-एक करके उनके घर पर आने लगे और पाठशाला में चलकर पढ़ाने की प्रार्थना करने लगे। सबके बहुत आग्रह करने पर प्रभु पाठशाला में पढ़ाने के निमित्त गये। किन्तु वे पढ़ावें क्या, लौकिक शास्त्रों को तो वे एकदम भूल ही गये, अब वे श्रीकृष्ण-कीर्तन के अतिरिक्त किसी भी विषय को नहीं कह सकते। उसी पाठ को विद्यार्थियों के लिये पढ़ाने लगे- ‘भैया! इन संसारी शास्त्रों में क्या रखा है? श्रीकृष्ण का नाम ही एकमात्र सार है, वह मधुरातिमधुर है। उसी का पान करो, इन लौकिक शास्त्रों से क्या अभीष्ट सिद्ध होगा? प्राणिमात्र के आश्रय-स्थान श्रीकृष्ण ही हैं। संसार की सृष्टि, स्थिति ओर लय उन ही श्रीकृष्ण की इच्छामात्र से होता रहता है।
क्रमशः
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