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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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जब भगवान ने कई बार जोर देकर कहा तब तो उदास मन से गोप ब्राह्मण-पत्नियों के पास पहुँचे और उसी प्रकार दीनता के साथ उन्होंने कहा- ‘हे ब्राह्मण-पत्नियो! यहाँ से थोड़ी ही दूर पर बलदेव जी और श्री कृष्णचन्द्र जी बैठे हैं, वे दोनों ही बहुत भूखे हैं। यदि तुम्हारे पास कुछ खाने की वस्तु हो तो उन्हें जाकर दे आओ।’ ब्राह्मण-पत्नियों का इतना सुनना था कि वे प्रेम के कारण अधीर हो उठीं।
यह सुनकर कि श्रीराम-कृष्ण भूखे बैठे हैं, उनकी अधीरता का ठिकाना नहीं रहा। जिनके दर्शनों की चिरकला से इच्छा थी, जिनकी मनोहर मूर्ति के दर्शन के लिये नेत्र छटपटा-से रहे थे, वे ही श्रीकृष्ण-बलराम भूखे हैं और भोजन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, इस बात से उन्हें सुख-मिश्रित दुःख सा हुआ। वे जल्दी से भाँति-भाँति के पकवानों को थालों में सजाकर श्रीकृष्ण के समीप जाने के लिये तैयार हो गयीं। उनके पतियों ने बहुत मना किया, किंतु उन्होंने एक भी न सुनी और प्रेम में मतवाली हुई जल्दी से श्रीकृष्ण के समीप पहुँचने का प्रयत्न करने लगीं।

उस समय भगवान खूब सज-धजकर ठाट के साथ खड़े-खड़े उसी ओर देख रहे थे कि कोई आती है या नहीं। भगवान व्यासदेव जी ने बड़ी ही सुन्दरता के साथ भगवान के उस मधुर गोपवेश का सजीव और जीता-जागता चित्र खींचा है। भगवान का उस समय का वेश कैसा है, उनका शरीर नूतन मेघ के समान श्याम रंग का है। उस पर वे पीताम्बर धारण किये हुए हैं, गले में वनमाला शोभित हो रही है। मस्तक पर मोरपंख का मनोहर मुकुट शोभित हो रहा है, सम्पूर्ण शरीर को सेलखड़ी, गेरू, पोतनी मिट्टी, यमुना-रज आदि भाँति-भाँति की धातुओं से रँग लिया है। कहीं गेरू की लकीरें खींच रखी हैं, कहीं यमुना-रज मल रखी है, कहीं पर सेलखड़ी घिसकर उनकी बिन्दियाँ लगा रखी हैं।

इस प्रकार सम्पूर्ण शरीर को सजा लिया है। कानों में भाँति-भाँति के कोमल-कोमल पत्ते उरस रखे हैं। सुन्दर नटका-सा वेश बनाये एक मित्र के कन्धे पर हाथ रखे हुए हैं। उनकी काली-काली घुँघुराली लटें सुन्दर गोल कपोलों के ऊपर लटक रही हैं। मन्द-मन्द मुसकराते हुए उसी और देख रहे हैं। भगवान के ऐसे मनोहर वेश को देखकर कौन सहृदय पुरुष अपने आपे में रह सकता है? आचार्य रत्नगर्भ का कण्ठ बड़ा ही कोमल और सुरीला था, वे बड़े लहजे के साथ प्रेम में गद्गद होकर इस श्लोक को पढ़ने लगे-

श्यामं हिरण्यपरिधिं वनमाल्यबर्ह-
धातुप्रवालनटवेषमनुव्रतांसे।
विन्यस्तहस्तमितरेण धुनानमब्जं
कर्णोत्पलालककपोलमुखाब्जहासम्।।

बस, इस श्लोक का सुनना था कि महाप्रभु प्रेम में उन्मत्त-से हो गये। जोरों के साथ जहाँ बैठे थे, वहीं से उछले और उसी समय मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। उन्हें न शरीर का होश है न स्थान का। वे बेहोश पड़े जोरों के साथ लम्बी-लम्बी साँसें ले रहे थे, थोड़ी देर में कहने लगे- ‘आचार्य! मेरे हृदय में प्रेम का संचार कर दो, कानों में अमृत भर दो। फिर से मुझे श्लोक सुना दो। मेरा हृदय शीतल हो रहा है।
अहा- ‘श्यामं हिरण्यपरिधिम्’ कैसे-कैसे, हाँ-हाँ फिर से सुनाइये।’ आचार्य उसी लहजे के साथ फिर श्लोक पढ़ने लगे-

श्यामं हिरण्यपरिधिं वनमाल्यबर्ह-
धातुप्रवालनटवेषमनुव्रतांसे।
विन्यस्तहस्तमितरेण धुनानमब्जं
कर्णोत्पलालककपोलमुखाब्जहासम्।।

दूसरी बार श्लोक का सुनना था कि महाप्रभु जोरों से फूट-फूटकर रोने लगे। इनके रुदन को सुनकर आस-पास के बहुत-से आदमी वहाँ जुट आये। सभी प्रभु की ऐसी दशा देखकर चकित हो गये। आज तक किसी ने भी ऐसा प्रेम का आवेग किसी भी पुरुष में नहीं देखा था। प्रभु के कमल के समान दोनों नेत्रों की कोरों से श्रावण-भादों की वर्षा की भाँति शीतल अश्रुकण गिर रहे थे। वे प्रेम में विह्वल होकर कह रहे थे- ‘प्यारे कृष्ण! कहाँ हो? क्यों नहीं मुझे हृदय से चिपटा लेते। अहा, वे ब्राह्मण-पत्नियाँ धन्य हैं, जिन्हें नटनागर के ऐसे अद्भुत दर्शन हुए थे।’ यह कहते-कहते प्रभु ने प्रेमावेश में आकर रत्नगर्भ को जोरों से आलिंगन किया। प्रभु के आलिंगनमात्र से ही रत्नगर्भ उन्मत्त हो गये।

अब तक तो एक ही पागल को देखकर लोग आश्चर्यचकित हो रहे थे, अब तो एक ही जगह दो पागल हो गये। रत्नगर्भ कभी तो जोरों से हँसते, कभी रुदन करते और कभी प्रभु के पादपद्मों में पड़कर प्रेम की भिक्षा माँगते। कभी रोते-रोते फिर उसी श्लोक को पढ़ने लगते। रत्नगर्भ ज्यों-ज्यों श्लोक पढ़ते, प्रभु की वेदना त्यों-ही-त्यों अत्यधिक बढ़ती जाती। वे श्लोक के श्रवणमात्र से ही बार-बार मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। रत्नगर्भ को कुछ भी होश नहीं था। वे बेसुध होकर श्लोक का पाठ करते और बीच-बीच में जोरों से रुदन भी करने लगते। जैसे-तैसे गदाधर पण्डित ने पकड़कर रत्नगर्भ को श्लोक पढ़ने से शान्त किया, तब कहीं जाकर प्रभु को कुछ-कुछ बाह्यज्ञान हुआ। कुछ होश होने पर सभी मिलकर गंगा-स्नान करने गये और फिर सभी प्रेम में छके हुए-से अपने-अपने घरों को चले गये। इस प्रकार प्रभु की सर्वप्रथम कृपा-किरण के अधिकारी रत्नगर्भाचार्य ही हुए। उन्हें ही सर्वप्रथम प्रभु की असीम अनुकम्पा का आदि अधिकारी समझना चाहिये।

भक्त-भाव...

भक्तगण दास्य, सख्य, वात्सल्य, शान्त और मधुर- इन पाँचों भावों के द्वारा अपने प्रियतम की उपासना करते हैं। उपासना में ये ही पाँच भाव मुख्य समझे गये हैं, किंतु इन पाँचों में भी दास्यभाव ही सर्वश्रेष्ठ और सर्वप्रधान है। या यों कह लीजिये कि दास्यभाव ही इन पाँचों भावों का मुख्य प्राण है। दास्यभाव के बिना न तो सख्य ही हो सकता है और न वात्सल्य, शान्त तथा मधुर ही। कोई भी भाव क्यों न हो, दास्यभाव इसमें अव्यक्त रूप से जरूर छिपा रहेगा। दास्य के बिना प्रेम हो ही नहीं सकता। जो स्वयं दास बनना नहीं जानता, वह स्वामी कभी बन ही नहीं सकेगा, जिसने स्वयं किसी की उपासना तथा वन्दना नहीं की है, वह उपास्य तथा वन्दनीय हो ही नहीं सकता। तभी तो अखिलब्राह्मण्ड कोटिनायक श्रीहरि स्वयं अपने श्रीमुख से कहते हैं- ‘क्रीतोऽहं तेन चार्जुन’ हे अर्जुन! भक्तों ने मुझे खरीद लिया है, मैं उनका क्रीतदास हूँ। क्योंकि वे स्वयं चराचर प्राणियों के स्वामी हैं।
क्रमशः

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