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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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जिसे अपने हाथ-पैरों से कमाकर खाने का अभिमान है, वह उस छोटे शिशु के सुख को क्या समझ सकता है, जिसे भूख-प्यास तथा सुख-दुःख में एकमात्र माता की गोद का ही सहारा है और जो आवश्यकता पड़ने पर रोने के अतिरिक्त और कुछ जानता ही नहीं? माता चाहे कहीं भी रहे, उसे अपने उस मुनमुना से बच्चे का हर समय ध्यान ही बना रहता है, उसके सुख-दुःख का अनुभव माता स्वयं अपने शरीर में करती है। नित्यानन्द जी ने भी प्रभु के प्रति आत्मसमर्पण कर दिया और महाप्रभु श्रीवास के भी सर्वस्व थे। प्रभु दोनों के ही उपास्यदेव थे, किंतु नित्यानन्द तो उनके बाहरी प्राण ही थे।
नित्यानन्दजी श्रीवास पण्डित के ही घर रहते। उनकी पत्नी मालिनीदेवी तथा वे स्वयं इन्हें पुत्र से भी बढ़कर प्यार करते। नित्यानन्द जी सदा बाल्यभाव में ही रहते। वे अपने हाथ से भोजन नहीं करते, तब मालिनी देवी अपने हाथों से इन्हें भात खिलातीं। कभी खाते-खाते ही बीच में से भाग जाते, और दाल-भात को सम्पूर्ण शरीर पर लपेट लेते। भोजन करके बालकों की भाँति घूमते रहना ही इनका काम था। कभी मुरारी गुप्त के घर जाते, कभी गंगादास जी की पाठशाला में ही जा बैठते। कभी किसी के यहाँ से कोई चीज ही लेकर खाने लगते। कभी महाप्रभु के ही घर जाते और बाल्यभाव से शचीमाता के पैरों को पकड़ लेते। माता इनकी चंचलता से डरकर कभी-कभी भीतर घर में भाग जाती। इस प्रकार ये भक्तों के घरों में नाना भाँति की बाल्यलीलाओं का अभिनय करने लगे।एक दिन प्रभु ने श्रीवास पण्डित की परीक्षा करने के निमित्त तथा यह जानने के लिये कि श्रीवास का नित्यानन्द जी के प्रति कितना हार्दिक स्नेह है, उन्हें एकान्त में ले जाकर पूछने लगे- 'पण्डित जी! इन अवधूत नित्यानन्द जी के कुल-गोत्र तथा जाति आदि का कुछ भी पता नहीं। इस अज्ञातकुलशील अवधूत को आपने अपने घर में स्थान देकर कुछ उचित काम नहीं किया। आप इन्हें पुत्र की तरह प्यार करते हैं। कौन जाने ये कैसे हैं? इसलिये आपको इन्हें अपने घर में पुत्र की तरह नहीं रखना चाहिये। ये साधुओं की तरह गंगा-किनारे या कहीं घाट पर रहें और माँगे खायँ। साधु को किसी के घर रहने से क्या काम? इस विषय में आपके क्या विचार हैं? क्या आप मुझसे सहमत हैं।'
प्रभु की ऐसी बात सुनकर गद्गद-कण्ठ से श्रीवास पण्डित ने अत्यन्त ही दीनता के साथ कहा- 'प्रभो! आपको हमारी इस प्रकार से परीक्षा करना ठीक नहीं। हम संसारी वासनाओं में आबद्ध पामर प्राणी भला प्रभु की परीक्षाओं में उत्तीर्ण ही कैसे हो सकते हैं? जब तक प्रभु स्वयं कृपा न करें, तब तक तो हम सदा अनुत्तीर्ण ही होते रहेंगे। मैं यह खूब जानता हूँ कि नित्यानन्द जी प्रभु के बाह्य प्राण ही नहीं, किंतु अभिन्न विग्रह भी हैं। प्रभु उन्हें भिन्न-से प्रतीत होने पर भी भिन्न नहीं समझते। जो प्रभु के इतने प्रिय हैं वे नित्यानन्द जी यदि शराब पीकर अगम्यागमन भी करें और मुझे धर्म-भ्रष्ट भी कर दें तब भी मुझे उनके प्रति घृणा नहीं होगी। नित्यानन्द जी को मैं प्रभु का ही स्वरूप समझता हूँ।' इतना कहकर श्रीवास पण्डित प्रभु के पादपद्मों को पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगे। प्रभु ने उन्हें अपने कोमल करों से उठाया और प्रेमालिंगन करते हुए कहने लगे- 'श्रीवास! तुमने ऐसा उत्तर देकर सचमुच में मुझे खरीद लिया। इस उत्तर से मैं तुम्हारा क्रीतदास बन गया। मैं तुमसे अत्यन्त ही संतुष्ट हुआ। मेरा यह आशीर्वाद है कि किसी भी दशा में तुम्हें किसी आवश्यकीय वस्तु का घाटा नहीं होगा और तुम्हारे घर के कुत्ते तक को श्रीकृष्ण-प्रेम की प्राप्ति हो सकेगी। तुम्हारा मेरे प्रति ऐसा अनन्य अनुराग है, इसका पता मुझे आज ही चला।' इतना कहकर प्रभु अपने घर को चले गये।
एक दिन प्रभु ने शचीमाता से कहा- 'माँ! मेरी इच्छा है आज नित्यानन्द जी को अपने घर भोजन करावें। तू आज अपने हाथों से बढ़िया-बढ़िया भोजन बनावे और हम दोनों भाइयों को चौके में बिठाकर स्वयं परोसकर खिलावे, यही मेरी इच्छा है।'
निमाई और निताई की प्रेम-लीला...
प्रभु की ऐसी बात सुनकर शचीमाता को परम प्रसन्नता हुई और वे जल्दी से भोजन बनाने के लिये उद्यत हो गयीं। इधर प्रभु श्रीवासपण्डित के घर निताई को लिवाने के लिये चले। श्रीवास के घर पहुँचकर प्रभु ने नित्यानन्द जी से कहा- 'श्रीपाद! आज आपका हमारे घर निमन्त्रण है। चलो, आज हम-आप साथ-ही-साथ भोजन करेंगे।' इतना सुनते ही नित्यानन्द जी बालकों की भाँति आनन्द में उछल-उछलकर नृत्य करने लगे और नृत्य करते-करते कहते जाते थे- 'अहा रे, लाल के, खूब बनेगी, शचीमाता के हाथ का भात खायेंगे, मौज उड़ायेंगे, प्रभु को खूब छकायेंगे, कुछ खायेंगे, कुछ शरीर में लगायेंगे।'
प्रभु ने इन्हें ऐसी चंचलता करते देखकर मीठी-सी डाँट देते हुए प्रेमपूर्वक कहा- 'देखना खबरदार, वहाँ ऐसी चंचलता मत करना। माता आपकी चंचलता से बहुत घबड़ाती है, वह डर जायगी। वहाँ चुपचाप ठीक तरह से भोजन करना।'
प्रभु की प्रेममिश्रित मीठी डाँट को सुनकर बालकों की भाँति चौंककर और बनावटी गम्भीरता धारण करके कानों पर हाथ रखते हुए नित्यानन्द जी कहने लगे- 'बाप रे! चंचलता! चंचलता कैसी? हम तो चंचलता जानते तक नहीं। चंचलता तो पागल लोग किया करते हैं, हम क्या पागल हैं जो चंचलता करेंगे?'
इन्हें इस प्रकार स्वाँग करते देखकर प्रभु ने इनकी पीठ पर एक हलकी-सी धाप जमाते हुए कहा- 'अच्छा चलिये, देर करने का काम नहीं। यह तो हम जानते हैं कि आप अपनी आदत को कहीं छोड़ थोड़े ही देंगे, किंतु देखना, वहाँ जरा सँभलकर रहना।' यह कहते-कहते दोनों भाई आपस में प्रेम की बातें करते हुए घर पहुँचे। माता भोजन बना ही रही थीं कि ये दोनों पहुँच गये। पहुँचते ही नित्यानन्द जी ने बालकों की भाँति बड़े जोर से कहा- 'अम्मा! बड़ी भूख लग रही है। पेट में चूहे-से कूद रहे हैं। अभी कितनी देर है, मेरे तो भूख के कारण प्राण निकले जा रहे हैं।' प्रभु ने इन्हें संकेत से ऐसा न करने को कहा। तब आप फिर उसी तरह जोरों से कहने लगे- 'देख अम्मा! गौर मुझे रोक रहे हैं, भला भूख लगने पर भोजन भी न माँगू।'
क्रमशः
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