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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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जिसकी जिह्वा को सुमधुर श्रीहरि के नामरूपी रस का चस्का लग गया है, उसके लिये फिर संसार में प्राप्त वस्तु ही क्या रह जाती है? यज्ञ, याग, जप, तप, ध्यान, पूजा, निष्ठा, योग, समाधि सभी का फल भगवन्नाम में प्रीति होना ही है, यदि इन कर्मों के करने से भगवन्नाम में प्रीति नहीं हुई, तो इन कर्मों को व्यर्थ ही समझना चाहिये। इन सभी क्रियाओं का अन्तिम और सर्वश्रेष्ठ फल यही है कि भगवन्नाम में निष्ठा हो। साध्य तो भगवन्नाम ही है, और सभी कर्म तो उसके साधनमात्र हैं। नाम-जप में देश, काल, पात्र, जाति, वर्ण, समय-असमय, शुचि-अशुचि इन सभी बातों का विचार नहीं होता। तुम जैसी हालत में हो, जहाँ हो, जैसे हो, जिस-किसी भी वर्ण के हो, जैसी भी स्थिति में हो, हर समय और हर काल में श्रीहरि के सुमधुर नामों का संकीर्तन कर सकते हो। नाम-जप से पापी-से-पापी मनुष्य भी परमपावन बन जाता है, अत्यन्त नीच-से-नीच भी सर्वपूज्य समझा जाता है, छोटे-से-छोटा भी सर्वश्रेष्ठ हो जाता है और बुरे-से-बुरा भी महान भगवद्भक्त बन जाता है। कबीरदास जी कहते हैं-
नाम जपत कुष्ठी भलो, चुइ-चुइ गिरै जो चाम।
कंचन देह किस कामकी, जिहि मुख नाहीं राम।।
भक्ताग्रगण्य महात्मा हरिदास जी यवन-कुल में उत्पन्न होने पर भी भगवन्नाम के प्रभाव से भगवद्भक्त वैष्णवों के प्रातःस्मरणीय बन गये। इन महात्मा की भगवन्नाम में अलौकिक निष्ठा थी। महात्मा हरिदास जी का जन्म बंगाल के यशोहर जिले के अन्तर्गत ‘बुड़न’ नाम के एक ग्राम में हुआ था। ये जाति के मुसलमान थे। मालूम होता है, बाल्यकाल में ही इनके माता-पिता इन्हें मातृ-पितृहीन बनाकर परलोकगामी बन गये थे, इसीलिये ये छोटेपन से ही घर-द्वार छोड़कर निरन्तर हरिनाम का संकीर्तन करते हुए विचरने लगे। पूर्व-जन्म के कोई शुभ संस्कार ही थे, भगवान की अनन्य कृपा थी, इसीलिये मुसलमान-वंश में उत्पन्न होकर भी इनकी भगवन्नाम में स्वाभाविक ही निष्ठा जम गयी। भगवान ने अनेकों बार कहा है- ‘यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तदधनं शनैः।’ अर्थात जिसे मैं कृपा करके अपनी शरण में लेता हूँ, सबसे पहले धीरे से उसका सर्वस्व अपहरण कर लेता हूँ। उसके पास अपना कहने के लिये किसी भी प्रकार का धन नहीं रहने देता।सबसे पहले भगवान की इनके ऊपर यही एक बड़ी भारी कृपा हुई। अपना कहने के लिये इनके पास एक काठ का कमण्डलु भी नहीं था। भूख लगने पर ये गाँवों से भिक्षा माँग लाते और भिक्षा में जो भी कुछ मिल जाता, उसे चौबीस घंटे में एक ही बार खाकर निरन्तर भगवन्नाम का जप करते रहते। घर छोड़कर ये वनग्राम के समीप बेनापोल नाम के घोर निर्जन वन में फूस की कुटी बनाकर अकेले ही रहते थे। इनके तेज और प्रभाव से वहाँ के सभी प्राणी एक प्रकार की अलौकिक शान्ति का अनुभव करते। जो भी जीव इनके सम्मुख आता वही इनके प्रभाव से प्रभावान्वित हो जाता। ये दिन-रात्रि में तीन लाख भगवन्नामों का जप करते थे, सो भी धीरे-धीरे नहीं, किंतु खूब उच्च स्वर से। भगवन्नाम का ये उच्च स्वर से जप इसलिये करते थे कि सभी चर-अचर प्राणी प्रभु के पवित्र नामों के श्रवण से पावन हो जायँ। प्राणिमात्र की निष्कृति का ये भगवन्नाम को ही एकमात्र साधन समझते थे। इससे थोड़े ही दिनों में इनका यशःसौरभ दूर-दूर तक फैल गया। बड़ी-बड़ी दूर से लोग इनके दर्शन को आने लगे। दुष्ट बुद्धि के ईर्ष्यालु लोगों को इनका इतना यश असह्य हो गया। वे इनसे अकारण ही द्वेष मानने लगे।
उन ईर्ष्यालुओं में वहाँ का एक रामचन्द्र खाँ नाम का बड़ा भारी जमींदार भी था। वह इन्हें किसी प्रकार नीचा दिखाना चाहता था। इनके बढ़े हुए यश को धूलि में मिलाने की बात वह सोचने लगा। साधकों को पतित करने के कामिनी और कांचन- ये ही दो भारी प्रलोभन हैं, इनमें कामिनी का प्रलोभन तो सर्वश्रेष्ठ ही समझा जाता है। रामचन्द्र खाँ ने उसी प्रलोभन के द्वारा हरिदास को नीचा दिखाने का निश्चय किया। किंतु उनकी रक्षा तो उनके साईं ही सदा करते थे। फिर चाहे सम्पूर्ण संसार ही उनका वैरी क्यों न हो जाता, उनका कभी बाल बाँका कैसे हो सकता था? किंतु नीच पुरुष अपनी नीचता से बाज थोड़े ही आते हैं। रामचन्द्र खाँ ने एक अत्यन्त ही सुन्दरी षोडशवर्षीया वेश्या को इनके भजन में भंग करने के लिये भेजा। वह रूपगर्विता वेश्या भी इन्हें पतित करने की प्रतिज्ञा करके खूब सज-धज के साथ हरिदास जी के आश्रम पर पहुँची। उसे अपने रूप का अभिमान था, उसकी समझ थी कि कोई भी पुरुष मेरे रूप-लावण्य को देखकर बिना रीझे नहीं रह सकता। किंतु जो हरिनाम पर रीझे हुए हैं, उनके लिये यह बाहरी सांसारिक रूप-लावण्य परम तुच्छ है, ऐसे हरिजन इस रूप-लावण्य की ओर आँख उठाकर भी न हीं देखते।
अहो! कितना भारी महान त्याग है, कैसा अपूर्व वैराग्य है, कितना अद्भुत इन्द्रियनिग्रह है! पाठक अपने-अपने हृदयों पर हाथ रखकर अनुमान तो करें। सुनसान जंगल, हरिदास की युवावस्था, एकान्त शान्त स्थान, परम रूप-लावण्ययुक्त सुन्दरी और वह भी हरिदास से स्वयं ही प्रणय की भीख माँगे और उस विरक्त महापुरुष के हृदय में किंचिन्मात्र भी विकार उत्पन्न न हो, वे अविचल भाव से उसी प्रकार बराबर श्रीकृष्ण कीर्तन में ही निमग्न बने रहे। मनुष्य की बुद्धि के परे की बात है। वारांगना वहाँ जाकर चुपचाप बैठी रही। हरिदास जी धाराप्रवाहरूप से इस महामन्त्र का जप करते रहे-
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।
दिन बीता, शाम हुई। रात्रि बीती, प्रातःकाल हुआ। इसी प्रकार चार दिन व्यतीत हो गये। वारांगना रोज आती और रोज ज्यों-की-त्यों ही लौट जाती। कभी-कभी बीच में साहस करके हरिदास जी से कुछ बातें करने की इच्छा प्रकट करती, तो हरिदास जी बड़ी ही नम्रता के साथ उत्तर देते- ‘आप बैठें, मेरे नाम-जप की संख्या पूरी हो जाने दीजिये, तब मैं आपकी बातें सुन सकूँगा।’ किंतु नाम-जप की संख्या दस-बीस या हजार-दो हजार तो थी ही नहीं, पूरे तीन लाख नामों का जप करना था, सो भी उच्च स्वर से गायन के साथ। इसलिये चारों दिन उसे निराश ही होना पड़ा।
क्रमशः
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