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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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आगे किसी को ऐसा काम करने की हिम्मत ही न पड़े। इस्लाम धर्म के अनुसार तो इसकी सजा प्राण दण्ड ही है। किंतु सीधे-सादे प्राणदण्ड देना ठीक नहीं। इसकी पीठ पर बेंत मारते हुए इसे बाईस बाजारों में होकर घुमाया जाय और बेंत मारते-मारते ही इसके प्राण लिये जायँ। तभी सब लोगों को आगे ऐसा करने की हिम्मत न होगी।
मुलुकपति ने विवश होकर यही आज्ञा लिख दी। बेंत मारने वाले नौकरों ने महात्मा हरिदास जी को बाँध लिया और उनकी पीठ पर बेंत मारते हुए उन्हें बाजारों में घुमाने लगे। निरन्तर बेंतों के आघात से हरिदास के सुकुमार शरीर की खाल उधड़ गयी। पीठ में से रक्त की धारा बहने लगी।
निर्दयी जल्लाद उन घावों पर ही और भी बेंत मारते जाते थे, किंतु हरिदास के मुख में से वही पूर्ववत हरिध्वनि ही हो रही थी। उन्हें बेंतों की वेदना प्रतीत ही नहीं होती थी। बाजार में देखने वाले उनके दुःख को न सह सकने के कारण आँखें बंद कर लेते थे, कोई-कोई रोने भी लगते थे, किंतु हरिदास जी के मुख से ‘उफ’ भी नहीं निकलती थी। वे आनन्द के साथ श्रीकृष्ण का कीर्तन करते हुए नौकरों के साथ चले जा रहे थे। उन्हें सभी बाजार में घुमाया गया। शरीर रक्त से लथपथ हो गया, किंतु हरिदास जी के प्राण नहीं निकले। नौकरों ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा- ‘महाशय! ऐसा कठोर आदमी तो हमने आज तक एक भी नहीं देखा। प्रायः दस-बीस ही बेंतों में मनुष्य मर जाते हैं, कोई-कोई तो दस-पाँच लगने से ही बेहोश हो जाते हैं। आपकी पीठ पर तो असंख्यों बेंत पड़े तो भी आपने ‘आह’ तक नहीं की। यदि आपके प्राण न निकले तो हमें दण्ड दिया जायगा। हमें मालूम पड़ता है, आप जिस नाम का उच्चारण कर रहे हैं, उसी का ऐसा प्रभाव है कि इतने भारी दुःख से आपको तनिक-सी भी वेदना प्रतीत नहीं होती। अब हम लोग क्या करें।
दयालु-हृदय महात्मा हरिदास जी उस समय अपने दण्ड देने-दिलाने वालों तथा पीटने वालों के कल्याण के निमित्त प्रभु से प्रार्थना कर रहे थे। वे उन भूले-भटकों के अपराध को भगवान से क्षमा कर देने को कह रहे थे। इतने में ही सबको प्रतीत हुआ कि महात्मा हरिदास जी अचेतन होकर भूमि पर गिर पड़े। सेवकों ने उन्हें सचमुच में मुर्दा समझ लिया और उसी दशा में उन्हें मुलुकपति के यहाँ ले गये।
गोराई क़ाज़ी की सम्मति से मुलुकपति ने उन्हें गंगा जी में फेंक देने की आज्ञा दी। गोराई क़ाज़ी ने कहा- ‘कब्र में गड़वा देने से तो इसे मुसलमानी- धर्म के अनुसार बहिश्त(स्वर्ग) की प्राप्ति हो जायगी। इसने तो मुसलमानी-धर्म छोड़ दिया था। इसलिये इसे वैसे ही गंगा में फेंक देना ठीक है।’ सेवकों ने मुलुकपति की आज्ञा से हरिदास जी के शरीर को पतितपावनी श्रीभागीरथी के प्रवाह में प्रवाहित कर दिया। माता के सुखद, शीतल जलस्पर्श से हरिदास को चेतना हुई और वे प्रवाह में बहते-बहते फुलिया के समीप घाट पर आ गये। इनके दर्शन से फुलियानिवासी सभी लोगों को परम प्रसन्नता हुई। चारों ओर यह समाचार फैल गया। लोग हरिदास के दर्शन के लिये बड़ी उत्सुकता से आने लगे। जो भी जहाँ सुनता वहीं से इनके पास दौड़ा आता। दूर-दूर से बहुत-से लोग आने लगे। मुलुकपति तथा गोराई क़ाज़ी ने भी यह बात सुनी। उनका भी हृदय पसीज उठा और इस दृढ़प्रतिज्ञ महापुरुष के प्रति उनके हृदय में भी श्रद्धा के भाव उत्पन्न हुए। वे भी हरिदास जी के दर्शन के लिये फुलिया आये। मुलुकपति ने नम्रता के साथ इनसे प्रार्थना की- ‘महाशय! मैं आपको दण्ड देने के लिये मजबूर था। इसीलिये मैंने आपको दण्ड दिया। मैं आपके प्रभाव को जानता नहीं था, मेरे अपराध को क्षमा कीजिये। अब आप प्रसन्नतापूर्वक हरि-नाम-संकीर्तन करें। आपके काम में कोई विघ्न न करेगा।’
हरिदास जी ने नम्रतापूर्वक कहा- ‘महाशय! इसमें आपका अपराध ही क्या है? मनुष्य अपने कर्मों के ही अनुसार दुःख-सुख भोगता है। दूसरे मनुष्य तो इसके निमित्त बन जाते हैं। मेरे कर्म ही ऐसे होंगे। आप किसी बात की चिन्ता न करें, मेरे मन में आपके प्रति तनिक भी रोष नहीं है।’ हरिदास की ऐसी सरल और निष्कपट बात सुनकर मुलुकपति को बड़ा आनन्द हुआ, वह इनके चरणों में प्रणाम करके चला गया। फुलियाग्राम के और भी वैष्णव ब्राह्मण आ-आकर हरिदास जी की ऐसी अवस्था देखकर दुःख प्रकाशित करने लगे। कोई-कोई तो उनके घावों को देखकर फूट-फूटकर रोने लगे। इस पर हरिदास जी ने उन ब्राह्मणों को समझाते हुए कहा- ‘विप्रगण! आप लोग सभी धर्मात्मा हैं। शास्त्रों के मर्म को भली-भाँति जानते हैं। बिना पूर्व-कर्मों के दुःख-सुख की प्राप्ति नहीं होती। मैंने इन कानों से भगवन्नाम की निन्दा सुनी थी, उसी का भगवान ने मुझे फल दिया है। आप लोग किसी प्रकार की चिन्ता न करें। यह दुःख तो शरीर को हुआ है, मुझे तो इसका तनिक भी क्लेश प्रतीत नहीं होता। बस, भगवन्नाम का स्मरण बना रहे यही सब सुखों का सुख है।जिस क्षण भगवन्नाम का स्मरण न हो, वही सबसे बड़ा दुःख है और भगवन्नाम का स्मरण होता रहे तो शरीर को चाहे कितना भी क्लेश हो उसे परम सुख ही समझना चाहिये।’ इनके ऐसे उत्तर से सभी ब्राह्मण परम सन्तुष्ट हुए और इनकी आज्ञा लेकर अपने-अपने घरों को चले गये।
इस प्रकार हरिदास जी भगवती भागीरथी के तट पर फुलियाग्राम के ही समीप रहने लगे। वहाँ उन्हें सब प्रकार की सुविधाएँ थीं। शान्तिपुर में अद्वैताचार्य जी के समीप वे प्रायः नित्य ही जाते। आचार्य इन्हें पुत्र की भाँति प्यार करते और ये भी उन्हें पिता से बढ़कर मानते। फुलिया के सभी ब्राह्मण, वैष्णव तथा धनी-मानी पुरुष इनका आदर-सत्कार करते थे। ये मुख से सदा श्रीहरि के मधुर नामों का कीर्तन करते रहते। निरन्तर के कीर्तन के प्रभाव से इनके रोम-रोम से हरि-ध्वनि-सी सुनायी देने लगी। भगवान की लीलाओं को सुनते ही ये मूर्च्छित हो जाते और एक साथ ही इनके शरीर में सभी सात्त्विक भाव उदय हो उठते।
क्रमशः
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