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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रभु इस श्लोक को गद्गद-कण्ठ से बार-बार पढ़ते और फिर बेहोश हो जाते। थोड़ा होश आने पर फिर इसे ही पढ़ने लगते। जैसे-तैसे भक्तों ने प्रभु को श्लोक पढ़ने से रोका और वे थोड़ी देर में प्रकृतिस्थ हो गये। इस प्रकार उनकी ऐसी दशा देखकर सभी उपस्थित भक्त अश्रु-विमोचन करने लगे, यों वह पूरी रात्रि इसी प्रकार संकीर्तन और सत्संग में ही व्यतीत हुई।
इस प्रकार श्रीवास पण्डित के घर नित्य ही कीर्तन का आनन्द होने लगा। रात्रि में जब मुख्य-मुख्य भक्त एकत्रित हो जाते, तब घर के किवाड़ भीतर से बंद कर दिये जाते और फिर कीर्तन आरम्भ होता। कीर्तन में ढोल, करताल, मृदंग, मजीरा आदि सभी वाद्य लय और स्वर के साथ बजाये जाते थे। प्रभु सभी भक्तों के बीच में खड़े होकर नृत्य करते थे। अब इनका नृत् बहुत ही मधुर होने लगा। सभी भक्त आनन्द के आवेश में आकर अपने आपे को भूल जाते और प्रभु के साथ नृत्य करने लगते। प्रभु के शरीर में स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, कम्प, वैवर्ण्य तथा प्रलय आदि सभी सात्त्विक भावों का उदय होता। भक्त इनके अद्भुत भावों को देखकर मुग्ध हो जाते और भावावेश में आकर खूब जोरों से संकीर्तन करने लगते। सभी सहृदय थे, सभी का चित्त प्रभु से मिलने के लिये सदा छटपटाता रहता था, किसी के भी मन में मान-सम्मान तथा दिखावेपन के भाव नहीं थे। सभी के हृदय शुद्ध थे, ऐसी दशा में आनन्द का पूछना ही क्या है? वे सभी स्वयं आनन्दस्वरूप ही थे। भक्त परस्पर में एक-दूसरे की वन्दना करते, कोई-कोई प्रेम में विह्वल होकर प्रभु के पैरों को ही पकड़ लेते। बहुत-से परस्पर ही पैर पकड़-पकड़ रुदन करते। इस प्रकार सभी प्रेममय कृत्यों से श्रीवास पण्डित का घर प्रेम-पयोधि बन गया थ। उस प्रेमार्णव में प्रवेश करते ही प्रत्येक प्राणी प्रेम में पागल होकर स्वतः ही नृत्य करने लगता था। वहाँ प्रभु के संसर्ग में पहुँचते ही सभी संसारी विषय एकदम भूल जाते थे। भक्तों का हृदय स्वयमेव तड़फड़ाने लगता था।गदाधर इनके परम अन्तरंग थे। ये सदा प्रभु की ही सेवा में बने रहते। एक दिन ये भोजन के अनन्तर मुखशुद्धि के निमित्त प्रभु को पान दे रहे थे। प्रभु ने प्रेमावेश में आकर अधीर बालक की भाँति पूछा- ‘गदाधर! भैया, तुम ही बताओ, मेरे कृष्ण मुझे छोड़कर कहाँ चले गये? भैया! मैं उनके बिना जीवित नहीं रह सकता। तुम सच-सच मुझे उनका पता दो, वे जहाँ भी होंगे, मैं वहीं जाकर उनकी खोज करूँगा और उनसे लिपटकर खूब पेटभर के रोऊँगा। तुम बता भर दो कि वे गये कहाँ?’
गदाधर ने बात टालने के लिये कहा दिया- ‘आप तो वैसे ही व्यर्थ में अधीर हुआ करते हैं। भला, आपके कृष्ण कभी आपको छोड़कर अन्यत्र जा सकते हैं? वे तो हर समय आपके हृदय में विराजमान रहते हैं।
यह सुनकर आपने उसी अधीरता के साथ पूछा- ‘क्या प्यारे कृष्ण भी मेरे हृदय में बैठे हैं?’
गदाधर ने कुछ देर के बाद कहा- ‘बैठे क्यों नहीं हैं। अब वे आपके हृदय में विराजमान हैं और सदा ही रहते हैं।’
इतना सुनते ही बड़े आनन्द और उल्लास के साथ प्रभु अपने बड़े-बड़े नखों से हृदय को विदारण करने लगे।
वे कहने लगे- ‘मैं हृदय फाड़कर अपने कृष्ण के दर्शन करूँगा। वे मेरे पास ही छिपे बैठे हैं और मुझे दर्शन तक नहीं देते। इस हृदय को चीर डालूँगा। इस प्रकार करते देख गदाधर को बहुत दुःख हुआ और उन्होंने भाँति-भाँति की अनुनय-विनय करके इन्हें इस काम से निवारण किया। तब ये बहुत देर के बाद होश में आये।
एक दिन रात्रि में प्रभु शय्या पर शयन कर रहे थे। गदाधर उनकी चरण-सेवा में संलग्न थे, चरण-सेवा करते-करते गदाधर ने अपना मस्तक प्रभु के पादपद्मों में रखकर गद्गद-कण्ठ से प्रार्थना की- प्रभो! इस अधम को, किन पापों के परिणामस्वरूप श्रीकृष्ण-प्रेम की प्राप्ति नहीं होती? आप तो दीनवत्सल हैं, मुझे साधन का बल नहीं, शुभ कर्म भी मैं नहीं कर सकता। तीर्थयात्रा आदि पुण्य कार्यों से भी मैं वंचित हूँ, मुझे तो एकमात्र श्रीचरणों का ही सहारा है। मेरे ऊपर कब कृपा होगी? प्रभो! कब तक मैं इसी प्रकार प्रेमविहीन शुष्क जीवन बिताता रहूँगा?’
उनकी इस प्रकार कातर वाणी सुनकर प्रभु प्रसन्न हुए और उन्हें आश्वासन देते हुए कहने लगे- ‘गदाधर! तुम अधीर मत हो, तुम तो श्रीकृष्ण के अत्यन्त ही प्यारे हो। दीन ही तो भगवान को सबसे प्रिय हैं। बिना दीन-हीन बने कोई प्रभु को प्राप्त कर नहीं सकता। जिन्हें अपने शुभ कर्मों का अभिमान है या उग्र साधनों का भरोसा है, वे प्रभु की महती कृपा के अधिकारी कभी हो ही नहीं सकते।प्रभु तो अकिंचनप्रिय हैं, निष्किंचन बनने पर ही उनकी कृपा की उपलब्धि हो सकती है। तुम्हारे भाव पूरे निष्किंचन भक्त के-से हैं। जब तुम सच्चे हृदय से निष्किंचन बन गये तब फिर तुम्हें श्रीकृष्ण-प्रेम की प्राप्ति में देर न होगी। कल गंगा-स्नान के बाद तुम्हें प्रभु की पूर्ण कृपा का अनुभव होने लगेगा।’
प्रभु की ऐसी बात सुनकर गदाधर की प्रसन्नता का पारावार नहीं रहा। वे रात्रि भर प्रेम में मग्न होकर आनन्दाश्रु बहाते रहे, वे एक-एक घड़ी को गिनते रहे कि कब प्रातःकाल हो और कब मुझे प्रेम प्राप्त हो। प्रतीक्षा में उनकी दशा पागलों की-सी हो गयी। वे कभी तो उठकर बैठ जाते, कभी खड़े होकर नृत्य ही करने लगते। कभी फिर लेट जाते और कभी आप-ही-आप कुछ सोचकर जोरों से हँसने लगते। प्रभु उनकी दशा देखकर बड़े ही प्रसन्न हुए। प्रातःकाल गंगा-स्नान करते ही वे आनन्द में विभोर होकर नृत्य करने लगे। वे प्रेमासव को पीकर उन्मत्त-से प्रतीत होते थे, मानो उन्हें उस मधुमय मनोज्ञ-मदिरा का पूर्णरूप से नशा चढ़ गया हो। उन्होंने प्रेमरस में निमग्न हुए अलसाने-से नेत्रों से प्रभु की ओर देखकर उनके पाद-पद्मों में प्रणाम किया और कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहने लगे- ‘प्रभो! आपने इस अधम पापी को भी प्रेम-प्रदान करके अपने पतितपावन पुण्य नाम का यथार्थ परिचय करा दिया। आपकी कृपा जीवों पर सदा अहैतु की ही होती है। मुझ साधनहीन को भी दुस्साध्य प्रेम की परिधि तक पहुँचा दिया।
क्रमशः
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