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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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वे अज्ञ पुरुष स्वर्ग के सुखों से अनभिज्ञ हैं। जिसने चिरकाल तक नियमों का पालन नहीं किया है, उसका चित्त अपने वश हो सकेगा, वह कभी प्रेमी बन सकेगा, इसका अनुमान त्रिकाल में भी नहीं किया जाता।नियमों का पालन करने में सभी को झुँझलाहट होती है, किंतु जो धीर पुरुष हैं, जिनके ऊपर प्रभु की कृपा है, वे तो मन को मारकर इच्छा के विरुद्ध भी नियमों का पालन करते हैं और धीरे-धीरे नियमों के पालन से उनमें दृढ़ता, तत्परता, नम्रता तथा दीनता और सहनशीलता आदि सद्वृत्तियाँ आने लगती हैं। जो नियमों से झुँझलाकर उन्हें छिन्न-भिन्न करना चाहते हैं, उनके हृदय में पहले तो नियमों के प्रति द्वेष उत्पन्न होता है, द्वेष से उस नियम के विरुद्ध प्रचार करने की इच्छा उत्पन्न होती है। द्वेषबुद्धि से किसी के विरुद्ध प्रचार करने से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से उस काम में इतनी अधिक आसक्ति हो जाती है कि उसके विरुद्ध प्रचार करने के लिये वह बुरे-बुरे घृणित उपायों को भी काम में लाने लगता है। उन बुरे कामों से ही उसका सर्वस्व नाश हो जाता है।
महाप्रभु का कीर्तन बंद मकान में होता था। ऐसा उस समय भक्तों ने नियम बना रखा था कि अनधिकारियों के पहुँचने से भावों में सांसारिकता का समावेश न होने पावे। लोगों के हृदयों में संकीर्तन को देखने की उत्सुकता उत्पन्न हुई। उन्हें यह नियम बहुत ही अखरने लगा। उन्हें प्रभु के इस नियम के प्रति झुँझलाहट होने लगी। जो श्रद्धावान थे, वे तो अपने मन की झुँझलाहट को रोककर धैर्य के साथ प्रतीक्षा करने लगे और कीर्तन के अन्त में उन्होंने नम्रतापूर्वक कीर्तन में प्रवेश करने की प्रार्थना की। उन्हें अधिकारी समझकर दूसरे दिन से प्रवेश करने की अनुमति मिल गयी और वे उसी नियमपालन के प्रभाव से जीवन में उत्तरोत्तर उन्नति करते हुए सद्वृत्तियों की वृद्धि के द्वारा प्रभु के पादपद्मों तक पहुँच गये, किंतु जो उस नियम के कारण अपनी झुँझलाहट को नहीं रोक सके, उन्हें संकीर्तन के प्रति द्वेष उत्पन्न हुआ। द्वेष के कारण वे वैष्णवों के शत्रु बन गये।
संकीर्तन के विरुद्ध प्रचार करने लगे और संकीर्तन को नष्ट करने के लिये भाँति-भाँति के बुरे-बुरे उपाय काम में लाने लगे। उनके क्रूर कर्मों के द्वारा संकीर्तन नष्ट नहीं हुआ, प्रत्युत विरोध के कारण उसकी तो अधिकाधिक वृद्धि ही हुई, किंतु वे दुष्टस्वभाव के मनुष्य स्वयं अधोगति के अधिकारी हुए। उन्होंने शुभ नियम के प्रति असहिष्णुता के भाव प्रदर्शित करके अपने-आपको गड्ढे में गिरा दिया। इन विरोधियों के ही कारण संकीर्तन देशव्यापी बन सका। इस प्रकार इन दुष्ट-पुरुषों के विरोध से भी महापुरुषों के सत्कार्यों में बहुत-सी सहायता मिलती है। इसलिये सत्पुरुषों के शुभ कामों का दुष्ट प्रकृति के पुरुष कितना भी विरोध करें, वे उससे घबड़ाते नहीं, किंतु उस विरोध के कारण और भी दूने उत्साह के साथ उस कार्य में प्रवृत्त हो जाते हैं।संकीर्तन के विरोधियों ने संकीर्तन को रोकने के लिये भाँति-भाँति के उपाय किये, लोगों में उनके प्रति बुरे भाव उत्पन्न किये, लोगों को संकीर्तन के विरुद्ध उभाड़ा, उसकी अनेकों प्रकार से निन्दा की, किंतु वे सभी कामों में असफल ही रहे।
इस प्रकार महाप्रभु अपने प्रेमी भक्तों के सहित श्रीकृष्ण-संकीर्तन में सदा संलग्न रहने लगे, किंतु कुछ बहिर्मुख वृत्तिवाले पुरुष संकीर्तन के विरोधी बन गये। रात्रिभर संकीर्तन होता था, भक्तगण जोरों से ‘हरि बोल’, ‘हरि बोल’ की ध्वनि करते। आस-पास के लोगों के निद्रासुख में विघ्न पड़ता, इसलिये वे भाँति-भाँति से कीर्तन के विरुद्ध भाव फैलाने लगे। कोई कहता- ‘ये सब लोग पागल हो गये हैं, तभी तो रात्रिभर चिल्लाते रहते हैं, क्या बतावें, इनके कारण तो सोना भी हराम हो गया है।’ कोई कहता- ‘सब एक-से ही इकट्ठे हो गये हैं। ज्ञान, योग, तप, जप में तो बुद्धि की आवश्यकता होती है, परिश्रम करना पड़ता है। इसमें कुछ करना-धरना तो पड़ता ही नहीं। चिल्लाना ही है, सो सभी तरह के लोग मिलकर चिल्लाते रहते हैं।’
कोई बीच में ही कह उठता- ‘अजी! हत्या की जड़ तो यह श्रीवासिया बामन ही है। भीख के रोट लग गये हैं! माँगकर खाते हैं, मस्ती आ गयी है, चार पैसे पास में हो गये हैं, उन्हीं की गर्मी के कारण रात्रि भर चिल्लाता रहता है। और भी दस-बीस बेकार लोगों को इकट्ठा कर लिया है। इसके पीछे हम सभी लोगों का नाश होगा।’
इतने में ही एक कहने लगा- ‘मैंने आज ही सुना है, राजा की तरफ से दो नावें सभी कीर्तन करने वालों को बाँधकर ले जाने के लिये आ रही हैं। साथ में एक फोज भी आवेगी जो श्रीवास के घर को तोड़-फोड़कर गंगा जी में बहा देगी और सभी कीर्तन करने वालों को पकड़ ले जायगी।’
इस बात से भयभीत होकर कुछ लोग कहने लगे- ‘भाई! इसमें हमारा तो कुछ दोष है ही नहीं, हम तो साफ कह देंगे कि हम कीर्तन में जाते ही नहीं, अमुक-अमुक लोग किवाड़ बंद करके भीतर न जाने क्या-क्या किया करते हैं!’
कुछ लोगों ने सम्मति दी- ‘जब तक फौज न आने पावे उससे पहले ही क़ाज़ी से जाकर कीर्तन की शिकायत कर आवें और उससे जता आवें कि इस वेदविरुद्ध, अशास्त्रीय कार्य में हमारी बिलकुल सम्मति नहीं है। न जाने ये स्त्रियों को साथ लेकर क्या-क्या कर्म करते रहते हैं।मालूम पड़ता है, ये लोग वास-मार्ग की पद्धति से पंचमकारों के साथ उपासना करते हैं। ऊपर से लोगों को सुनाने के लिये तो जोर-जारे से श्रीकृष्ण-कीर्तन करते हैं और भीतर मांस, मदिरा, मछली, मैथुन आदि वाम-मार्गियों के साधनों का प्रयोग करते हैं। इससे यही ठीक होगा कि पहले से ही क़ाज़ी को जता दें।’ यह बात लोगों को पसंद आयी और कुछ लोगों ने जाकर नवद्वीप के क़ाज़ी के सामने संकीर्तन की शिकायत की। सब बातें सुनकर क़ाज़ी ने कहा दिया- ‘आप लोग किसी बात की चिन्ता न करें, हम कीर्तन को बंद करा देंगे।’ इस उत्तर को सुनकर शिकायत करने वाले प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थानों को लौट आये।
अब तो बाजार में संकीर्तन के सम्बन्ध में भाँति-भाँति की अफवाहें उड़ने लगीं।
क्रमशः
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