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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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यक्ष-राक्षसों का आवेश राजस-प्रकृति के ही शरीरों में प्रकट होगा और जो घोर तामस-प्रकृति के पुरुष हैं, उन्हीं के शरीर में भूत-पिशाचों का आवेश आता है। सभी के शरीरों में आवेश हो, यह बात नहीं। कभी किसी विरले ही शरीर में आवेश हुआ देखा जाता है। वह क्यों होता है और किस प्रकार होता है, इसका कोई निश्चित नियम नहीं। जिस देव, दानव अथवा भूत-पिशाच ने जिसे शरीर को अपने उपयुक्त समझ लिया, उसी में प्रवेश करके वह अपने भावों को व्यक्त करता है।
इसके अतिरिक्त भगवान के कलावतार, अंशावतार आदि अवतारों के मध्य में एक आवेशावतार भी होता है। किसी महान कार्य के लिये किसी विशेष शरीर में भगवान का आवेश होता है और उस कार्य को पूरा करके फौरन ही वह आवेश चला जाता है। भगवान तो ‘कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुम्’ सभी कुछ करने में समर्थ हैं, उनकी इच्छामात्र से बड़े-बड़े दुष्टों का संहार हो सकता है; किंतु भक्तों के प्रेम के अधीन होकर, उन्हें अपनी असीम कृपा का महत्त्व जताने के निमित्त तथा अपनी लीला प्रकट करने के निमित्त वे भाँति-भाँति के अवतारों का अभिनय करते हैं। वास्तव में तो वे नाम, रूप तथा सभी प्रकार के गुणों से रहित हैं।
जिस प्रकार पृथ्वी को दुष्ट क्षत्रियों के अत्याचार से पीड़ित देखकर महर्षि परशुराम के शरीर में भगवान का आवेश हुआ और पृथ्वी को दुष्ट क्षत्रियों से हीन करके शीघ्र ही वह आवेश अदृश्य हो गया, फिर परशुराम जी शुद्ध ऋषि बन आज तक भी महेन्द्र पर्वत पर बैठे तपस्या कर रहे हैं। इस प्रकार आवेशावतार किसी विशेष कार्य की सिद्धि के निमित्त होता है और वह अधिक दिन तक ठहरता भी नहीं। द्रौपदी के चीर खींचने पर भगवान का चीरावतार भी हुआ था और क्षणभर में ही द्रौपदी की लाज रखकर वह अदृश्य भी हो गया।इसी प्रकार अब प्रभु के भी शरीर में भिन्न-भिन्न अवतारों के आवेश होने लगे। जिस समय ये आवेशावस्था में होते, उस समय उसी अवतार के गुणों के अनुसार बर्ताव करने लगते और जब वह आवेश समाप्त हो जाता, तब आप एक अमानी भक्त की भाँति बहुत ही दीनता का बर्ताव करने लगते। भक्तों की पद-रज को अपने मस्तक पर चढ़ाते और सबसे अधीर होकर पूछते- ‘मुझे श्रीकृष्ण-प्रेम की प्राप्ति कब हो सकेगी? आप लोग मुझे श्रीकृष्ण-प्राप्ति का उपाय बतावें। मैं अपने प्यारे श्रीकृष्ण से कैसे मिल सकूँगा? इस प्रकार इनके जीवन में दो भिन्न-भिन्न भाव प्रतीत होने लगे- भावावेश में तो भगवद्भाव और साधारणरीत्या भक्तभाव। जो इनके अन्तरंग भक्त थे, वे तो इनमें सर्वकाल में भगवद्भावना ही रखते और ये कितनी भी दीनता प्रकट करते तो भी उससे उनके भाव में परिवर्तन नहीं होता, किंतु जो साधारण थे, वे संदेह में पड़ जाते कि यह बात क्या है? कोई कहता- ‘ये साक्षात श्रीकृष्ण ही हैं।’ कोई कहता- ‘न जाने किसी देवी-देवता का आवेश होता हो।’ कोई-कोई इसे तान्त्रिक सिद्धि भी बताने लगे। प्रभु के शरीर में कुछ श्रीकृष्ण-लीलाओं का भी भक्तों ने उदय देखा था। कभी तो ये अक्रूर-लीला करते, कभी गोपियों के विरह में रुदन करते थे।
मुरारी गुप्त वराह भगवान के उपासक थे। एक दिन मुरारी गुप्त वराह भगवान के स्तोत्र का पाठ कर रहे थे। प्रभु दूर से ही स्तोत्रपाठ सुनकर वराह की भाँति जोरों से गर्जना करते हुए ‘शूकर’, ‘शूकर’ ऐसा कहते हुए मुरारी गुप्त के घर की ओर चले। उस समय इनकी प्रकृति में मुरारी गुप्त ने सभी वराहावतार के गुणों का अनुभव किया। प्रभु दोनों हाथों को पृथ्वी पर टेककर हाथ-पैरों से बिलकुल वराह की भाँति चलने लगे। रास्ते में एक बड़ा पीतल का जलपूर्ण कलश रखा था। प्रभु ने उसे अपनी डाढ़ से उठाकर दूसरी ओर फेंक दिया और आप सीधे गुप्त महाशय के पूजागृह में चले गये। वहाँ जाकर आप आसनासीन हुए और मुरारी से कहने लगे- ‘मुरारी! तुम हमारी स्तुति करो।’
मुरारी ने हाथ जोड़े हुए अति दीनभाव से कहा- ‘प्रभो! आपकी महिमा वेदातीत है। वेद, शास्त्र आपकी महिमा को पूर्ण रीति से समझ ही नहीं सकते। श्रुतियों ने आपका ‘नेति’, ‘नेति’ कहकर कथन किया है। आप अन्तर्यामी हैं। शेष जी सहस्र मुखों से अहर्निश आपके गुणों का निरन्तर कथन करते रहते हैं तो भी प्रलय के अन्त तक आपके समस्त गुणों का कथन नहीं कर सकते। फिर मैं अज्ञ प्राणी भला आपकी स्तुति कैसे कर सकूँगा?
प्रभु ने उसी प्रकार गम्भीर स्वर में कहा- ‘मुरारी! तुम्हें भय करने की कोई बात नहीं। जो दुष्ट मेरे संकीर्तन में विघ्न करेगा, मैं उसका संहार करूँगा, फिर चाहे वह कोई भी क्यों न हो। तुम निर्भय रहो। नाम संकीर्तन द्वारा मैं जगदुद्धार का कार्य करूँगा।’ यह कहते-कहते प्रभु अचेत-से हो गये और वहीं मूर्च्छित होकर गिर पड़े। कुछ काल के अनन्तर प्रभु प्रकृतिस्थ हुए और मुरारी से फिर उसी प्रकार की अधीरता की बातें करने लगे। मुरारी गुप्त तो इनके प्रभाव का पहले ही परिचय प्राप्त कर चुके थे। इसलिये उने भाव में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ। प्रभु इस प्रकार मुरारी को अपने दर्शनों से कृतार्थ करके घर की ओर चले गये। इसी प्रकार भक्तों को अनेक भावों और लीलाओं से प्रभु सदा आनन्दित और सुखी बनाते हुए श्रीकृष्ण-कीर्तन में संलग्न बनाये रखते थे। एक दिन संकीर्तन करते-करते प्रभु ने बीच में ही कहा- ‘नदिया में अब शीघ्र ही एक महापुरुष आने वाले हैं, जिनके द्वारा नवद्वीप के कोने-कोने और घर-घर में श्रीकृष्ण-संकीर्तन का प्रचार होगा।’
प्रभु के मुख से इस बात को सुनकर सभी भक्तों को परम प्रसन्नता प्राप्त हुई और वे आनन्द के उद्रेक में और अधिक उत्साह के साथ नृत्य करने लगे। भक्तों को दृढ़ विश्वास था कि प्रभु ने जो बात कही है, वह सत्य ही होगी। इस बात को चार-पाँच ही दिन हुए होंगे कि एक दिन संकीर्तन के अनन्तर प्रभु ने भक्तों से कहा- ‘मेरे अग्रज, मेरे परम सखा, मेरे बन्धु और मेरे वे सर्वस्व महापुरुष अवधूत के वेश में नवद्वीप में आ गये हैं, अब तुम लोग जाकर उन्हें खोज निकालो।’ प्रभु की ऐसी आज्ञा पाकर भक्तगण उन अवधूत महापुरुष को खोजने के लिये गये।
क्रमशः
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