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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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असल में ये अवधूत नित्यानन्द जी ही थे, जो गौर-भक्तों में ‘निमाई के भाई निताई’ के नाम से पुकारे जाते हैं।
निमाई के भाई निताई....
विधि का विधान भी बड़ा ही विचित्र है, कभी-कभी एक ही माता के उर से उत्पन्न हुए दो भाई परस्पर में शत्रुभाव से बर्ताव करते हुए देखे गये हैं। वालि-सुग्रीव, रावण-विभीषण, कर्ण-अर्जुन आदि सहोदर भाई ही थे, किंतु ये परस्पर में एक-दूसरे की मृत्यु का कारण बने हैं। इसके विपरीत विभिन्न माता-पिताओं से उत्पन्न होकर उनमें इतना अधिक प्रेम देखने में आता है कि इतना किसी विरले सहोदर भाई में भी सम्भवतया न हो। इन सब बातों से यही अनुमान किया जाता है कि प्रत्येक प्राणी पूर्वजन्म के संस्कारों से आबद्ध हैं। जिसका जिसके साथ जितने जन्मों का सम्बन्ध हो, उसे उसके साथ उतने ही जन्मों तक उस सम्बन्ध को निभाना होगा। फिर चाहे उन दोनों का जन्म एक ही परिवार अथवा देश में हो या विभिन्न जाति-कुल अथवा ग्राम में हो। सम्बन्ध तो पूर्व की ही भाँति चला आवेगा। महाप्रभु गौरांगदेव का जन्म गौड़देश के सुप्रसिद्ध नदिया नामक नगर में हुआ। इनके पिता सिलहट-निवासी मिश्र ब्राह्मण थे, माता नवद्वीप के सुप्रसिद्ध पण्डित नीलाम्बर चक्रवर्ती की पुत्री थी। ये स्वयं दो भाई थे। बड़े भाई विश्वरूप इन्हें पाँच वर्ष का ही छोड़कर सदा के लिये चले गये। अपने माता-पिता के यही एकमात्र पुत्र थे, इसलिये चाहे इन्हें सबसे छोटा कह लो या सबसे बड़ा। इनकी माता के दूसरी कोई जीवित संतान ही विद्यमान नहीं थी।
श्रीनित्यानन्द का जन्म राढ़ देश में हुआ। इनके माता-पिता राढ़ी श्रेणी के ब्राह्मण थे, वे अपने सभी भाइयों में बड़े थे। किंतु इनके छोटे भाइयों का कोई नाम भी नहीं जानता कि वे कौन थे और कितने थे? ये गौरांग के बड़े भाई नाम से प्रसिद्ध हुए और गौरभक्तों में संकीर्तन के समय गौर से पहले निताई का ही नाम आता है।
भजो निताई गौर राधे श्याम। जपो हरे कृष्ण हरे राम।।
इस प्रकार इन दोनों का पांचभौतिक शरीर एक स्थानीय रज-वीर्य का न होते हुए भी इनकी आत्मा एक ही तत्त्व की बनी हुई थी। इनका शरीर पृथक-पृथक देशीय होने पर भी इनका अन्तःकरण एक ही था, इसीलिये तो ‘निमाई और निताई’ दोनों भिन्न-भिन्न होते हुए भी अभिन्न समझे जाते हैं।प्रभु नित्यानन्द जी का जन्म वीरभूमि जिले के अन्तर्गत ‘एकचाका’ नामक एक छोटे-से ग्राम में हुआ था, इनके ग्राम से थोड़ी दूरी पर मोड़ेश्वर (मयूरेश्वर) नाम का एक बहुत ही प्रसिद्ध शिवलिंग था। आजकल वहाँ मयूरेश्वर नाम का एक ग्राम भी बसा है, जो वीरभूमि का एक थाना है। प्रभु के पिता का नाम हाड़ाई ओझा और माता का नाम पद्मावती देवी था। ओझा-दम्पति विष्णुभक्त थे। बिना परमभावगत और सद्वैष्णव हुए उनके घर में नित्यानन्द-जैसे महापुरुष का जन्म हो ही कैसे सकता था? उस समय साम्प्रदायिक संकुचितता का इतना अधिक प्राबल्य नहीं था। प्रायः सभी सम्प्रदायों के मानने वाले वैष्णव, स्मार्त्तमतानुसार ही अपने को वैष्णव मानते थे। उपास्यदेव तो उनके विष्णु ही होते थे, विष्णुपूजन को ही प्रधानता देते हुए वे अन्य देवताओं की भी समय-समय पर भक्तिभाव से पूजा किया करते थे। अपने को श्रीवैष्णव-सम्प्रदाय के अनुयायी कहने वाले कुछ पुरुष जो आज शिव पूजन की तो बात ही क्या त्रिपुण्ड्र, बिल्वपत्र और रुद्राक्ष आदि के दर्शनों से भी घृणा करते हैं, पूर्वकाल में उनके भी सम्प्रदाय में कोई शिवोपासक आचार्यों का वृत्तान्त मिलता है। अस्तु, हाड़ाई पण्डित वैष्णव होते हुए भी नित्यप्रति मोड़ेश्वर में जाकर बड़े भक्ति-भाव से शिव जी की पूजा किया करते थे। शिवलिंग की तो सभी देवताओं की भावना से पूजा की जा सकती है।
हाड़ाई पण्डित के वंश में सदा से पुरोहित-वृत्ति होती चली आयी थी। इसलिये ये भी थोड़ी-बहुत पुरोहिती कर लेते थे। घर में खाने-पहनने की कमी नहीं थी, किंतु इनका घर संतान के बिना सूना था, इसलिये ओझा-दम्पति को यही एक भारी दुःख था। एक दिन पद्मावती देवी को स्वप्न में प्रतीत हुआ कि कोई महापुरुष कह रहे हैं- ‘देवि! तुम्हारे गर्भ से एक ऐसे महापुरुष का जन्म होगा, जिनके द्वारा सम्पूर्ण देश में श्रीकृष्ण संकीर्तन का प्रचार होगा और वे जगन्मान्य महापुरुष समझे जायँगे।’ प्रायः देखा गया है कि सात्त्विक प्रकृति वाले पुरुषों को शुद्ध भाव से शयन करने पर रात्रि के अन्त में जो स्वप्न दीखते हैं, वे सच्चे ही होते हैं। भाग्यवती पद्मावतीदेवी का भी स्वप्न सच्चा हुआ। यथासमय उनके गर्भ रहा और शाके 1395 में माघ के शुक्लपक्ष में पद्मावती देवी के गर्भ से एक पुत्र-रत्न उत्पन्न हुआ। पुत्र का नाम रखा गया। नित्यानन्द। आगे चलकर ये ही नित्यानन्द प्रभु अथवा ‘निताई’ के नाम से गौर-भक्तों में बलराम के समान पूजे गये और प्रसिद्ध हुए।बालक नित्यानन्द देखने में बड़े ही सुन्दर थे। इनका शरीर इकहरा और लावण्यमय था। चेहरे से कान्ति प्रकट होती थी, गौर वर्ण था, आँखें बड़ी-बड़ी और स्वच्छ तथा सुहावनी थीं। इनकी बुद्धि बाल्यकाल से ही बड़ी तीक्ष्ण थी। पाँच वर्ष की अवस्था में इनका विद्यारम्भ-संस्कार कराया गया। विद्यारम्भ-संस्कार होते ही ये खूब मनोयोग के साथ अध्ययन करने लगे। थोड़े ही समय में इन्हें संस्कृत-साहित्य तथा व्याकरण का अच्छा ज्ञान हो गया। ये पाठशाला के समय में तो पढ़ने जाते, शेष समय में बालकों के साथ खूब खेल-कूद करते। इनके खेल अन्य साधारण प्राकृतिक बालकों की भाँति नहीं होते थे। ये बालकों को साथ लेकर छोटी ही उम्र से श्रीकृष्ण-लीलाओं का अभिनय किया करते। किसी बालक को श्रीकृष्ण बना देते, किसी को ग्वाल-बाल और आप स्वयं बलराम बन जाते। कभी गो-चारण-लीला करते, कभी पुलिन-भोजन का अभिनय करते और कभी मथुरा-गमन की लीला बालकों से कराते। इन्हें ये लीलाएँ किसने सिखा दीं और इन्होंने इनकी शिक्षा कहाँ पायी, इसका किसी को कुछ भी पता नहीं चलता। ये सभी शास्त्रीय लीला ही किया करते।
कभी-कभी आप रामायण की लीलाओं को बालकों से कराते। किसी को राम बना देते, किसी को भरत, शत्रुघ्न और आप स्वयं लक्ष्मण बन जाते। शेष बालकों को नौकर-चाकर तथा रीछ-वानर बनाकर भिन्न-भिन्न स्थानों की लीलाओं को करते। कभी तो वनगमन का अभिनय करते।
क्रमशः
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