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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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उन छिद्रों में से विश्वमोहिनी ध्वनि सुनायी पड़ रही है। पीछे-पीछे ग्वालबाल यशोदानन्दन का यशोगान करते हुए जा रहे हैं, इस प्रकार के मुरलीमनोहर अपनी पदरज से वृन्दावन की भूमि को पावन बनाते हुए व्रज में प्रवेश कर रहे हैं।’ जगत को उन्मादी बनाने वाले इस भाव को सुनकर जब अवधूतशिरोमणि शुकदेव जी भी प्रेम में पागल बन गये, तब फिर भला हमारे सहृदय अवधूत नित्यानन्द अपनी प्रकृति में कैसे रह सकते थे? श्रीवास पण्डित के मुख से इस श्लोक को सुनते ही वे मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। इनके मूर्च्छित होते ही प्रभु ने श्रीवास से फिर श्लोक पढ़ने को कहा।श्रीवास के दुबारा श्लोक पढ़ने पर नित्यानन्द प्रभु जोरों से हुंकार देने लगे। उनके दोनों नेत्रों से अविरल अश्रु बह रहे थे। शरीर के सभी रोम बिलकुल खड़े हो गये। पसीने से शरीर भीग गया। प्रेम में उन्मादी की भाँति नृत्य करने लगे। प्रभु ने नित्यानन्द को गले से लगा लिया और दोनों महापुरुष परस्पर में एक-दूसरे को आलिंगन करने लगे। नित्यानन्द प्रेम में बेसुध-से प्रतीत होते थे, उनके पैर कहीं-के-कहीं पड़ते थे, जोर से ‘हा कृष्ण! हा कृष्ण!’ कहकर वे रुदन कर रहे थे। रुदन करते-करते बीच में जोरों की हुंकार करते। इनकी हुंकार को सुनकर उपस्थित भक्त भी थर-थर काँपने लगे। सभी काठ की पुतली की भाँति स्थिर भाव से चुपचाप खड़े थे। इसी बीच बेहोश होकर निताई अपने भाई निमाई की गोद में गिर पड़े। प्रभु ने नित्यानन्द के मस्तक पर अपना कोमल करकमल फिराया। उसके स्पर्शमात्र से नित्यानन्द जी को परमानन्द प्रतीत हुआ। वे कुछ-कुछ प्रकृतिस्थ हुए।
नित्यानन्द-प्रभु को प्रकृतिस्थ देखकर प्रभु दीनभाव से कहने लगे- ‘श्रीपाद आज हम सभी लोग आपकी पदधूलि को मस्तक पर चढ़ाकर कृतकृत्य हुए। आपने अपने दर्शन से हमें बड़भागी बना दिया। प्रभो! आप-जैसे अवधूतों के दर्शन भला, हमारे-जैसे संसारी पुरुषों को हो ही कैसे सकते हैं? हम तो गृहरूपी कूप के मण्डूक हैं, इसे छोड़कर कहीं जा ही नहीं सकते। आप-जैसे महापुरुष हमारे ऊपर अहैतु की कृपा करके स्वयं ही घर बैठे हमें दर्शन देने आ जाते हैं, इससे बढ़कर हमारा और क्या सौभाग्य हो सकता है?’
प्रभु की इस प्रेममयी वाणी सुनकर अधीरता के साथ निताई ने कहा- ‘हमने श्रीकृष्ण के दर्शन के निमित्त देश-विदेशों की यात्रा की, सभी मुख्य-मुख्य पुण्यस्थानों और तीर्थों में गये। सभी बड़े-बड़े देवालयों को देखा, जो-जो श्रेष्ठ और सात्त्विक देवस्थान समझे जाते हैं, उन सबके दर्शन किये, किंतु वहाँ केवल स्थानों के ही दर्शन हुए। उन स्थानों के सिंहासनों को हमने ख़ाली ही पाया।
भक्तों से हमने पूछा- इन स्थानों से भगवान कहाँ चले गये? मेरे इस प्रश्न को सुनकर बहुत-से तो चकित रह गये, बहुत-से चुप हो गये, बहुतों ने मुझे पागल समझा। मेरे बहुत तलाश करने पर एक भक्त ने पता किया कि भगवान नवद्वीप में प्रकट होकर श्रीकृष्ण-संकीर्तन का प्रचार कर रहे हैं। तुम उन्हीं के शरण में जाओ, तभी तुम्हें शान्ति की प्राप्ति हो सकेगी। इसीलिये मैं नवद्वीप आया हूँ। दयालु श्रीकृष्ण ने कृपा करके स्वयं ही मुझे दर्शन दिये। अब वे मुझे अपनी शरण में लेते हैं या नहीं इस बात को वे जानें।’ इतना कहकर फिर नित्यानन्द प्रभु गौरांग की गोदी में लुढ़क पड़े। मानो उन्होंने अपना सर्वस्व गौरांग को अर्पण कर दिया हो।प्रभु ने धीरे-धीरे इन्हें उठाया और नम्रता के साथ कहने लगे- ‘आप स्वयं ईश्वर हैं, आपके शरीर में सभी ईश्वरता के चिह्न प्रकट होते हैं, मुझे भुलाने के लिये आप मेरी ऐसी स्तुति कर रहे हैं। ये सब गुण तो आप में ही विद्यमान हैं। हम तो साधारण जीव हैं। आपकी कृपा के भिखारी हैं।’
इन बातों को भक्त मन्त्रमुग्ध की भाँति चुपचाप पास में बैठे हुए आश्चर्य के साथ सुन रहे थे। मुरारी गुप्त ने धीरे से श्रीवास से पूछा- ‘इन दोनों की बातों से पता हीं नहीं चलता कि इनमें कौन बड़ा है और कौन छोटा?’ धीरे-ही-धीरे श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘किसी ने शिव जी से जाकर पूछा कि आपके पिता कौन हैं?’
इस पर शिव जी ने उत्तर दिया- ‘विष्णु भगवान।’ उसी ने जाकर विष्णु भगवान से पूछा कि ‘आपके पिता कौन हैं?’ हँसते हुए विष्णु जी ने कहा- देवाधिदेव श्रीमहादेव जी ही हमारे पिता हैं। इस प्रकार इनकी लीला ये ही समझ सकते हैं, दूसरा कोई क्या समझे?
नन्दनाचार्य इन सभी लीलाओं को आश्चर्य के साथ देख रहे थे, उनका घर प्रेम का सागर बना हुआ था, जिसमें प्रेम की हिलोरें मार रही थीं। करुणक्रन्दन और रुदन की हृदय को पिघलाने वाली ध्वनियों से उनका घर गूँज रहा था। दोनों ही महापुरुष चुपचाप पश्यन्ती भाषा में न जाने क्या-क्या बातें कर रहे थे, इसका मर्म वे ही दोनों समझ सकते थे। वैखरी वाणी को बोलने वाले अन्य साधारण लोगों की बुद्धि के बाहर की ये बातें थीं।
व्यासपूजा....
प्रेम का पथ कितना व्यापक है, उसमें संदेह, छल, वंचना, बनावट के लिये तो स्थान ही नहीं। प्रेम में पात्रापात्र का भेदभाव नहीं। उसमें जाति, वर्ण, कुल, गोत्र तथा सजीव-निर्जीव का विचार नहीं किया जाता, इसीलिये प्रायः लोगों के मुखों से सुना जाता है कि ‘प्रेम अन्धा होता है।’ ऐसा कहने वाले स्वयं भ्रम में हैं। प्रेम अन्धा नहीं है, असल में प्रेम के अतिरिक्त अन्य सभी अन्धे हैं। प्रेम ही एक ऐसा अमोघ बाण है कि जिसका लक्ष्य कभी व्यर्थ नहीं होता, उसका निशान सदा ही ठीक ही लक्ष्य पर बैठता है। ‘अपना’ कहीं भी छिपा हो, प्रेम उसे वहीं से खोज निकालेगा। इसीलिये तो कहा है-
‘तिनका तिनके से मिला, तिनका तिनके पास।’
विशाल हिंदू-धर्म ने प्रेम की सर्वव्यापकता को ही लक्ष्य करके तो उपासना की कोई एक ही पद्धति निश्चय नहीं की है। तुम्हें जिससे प्रेम हो, तुम्हारा अन्तःकरण जिसे स्वीकार करता हो, उसी की भक्तिभाव से पूजा-अर्चा करो और उसी का निरन्तर ध्यान करते रहो, तुम अन्त में प्रेम तक पहुँच जाओगे। अपना उपास्य कोई एक निश्चय कर लो। अपने हृदय में किसी भी एक प्रिय को बैठा लो। बस, तुम्हारा बेड़ा पार है। पत्नी पति में ही भगवत-भावना करके उसका ध्यान करे।
क्रमशः
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