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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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इतना सुनते ही श्रीवास, मुरारी, गदाधर आदि सभी भक्त निमाई और निताई के सहित गंगास्नान के निमित्त चल दिये। नित्यानन्द जी का स्वभाव बिलकुल छोटे बालकों का-सा था, वे कुदक-कुदककर रास्ते में चलते। गंगा जी में घुस गये तो फिर निकलना सीखे ही नहीं, घंटों जल में ही गोते लगाते रहते। कभी उलटे होकर बहुत दूर तक प्रवाह में ही बहते चले जाते। सब भक्तों के सहित वे भी स्नान करने लगे। सहसा उसी समय एक नाग इन्हें जल में दिखायी दिया। जल्दी से आप उसे ही पकड़ने के लिये दौड़े। यह देखकर श्रीवास पण्डित ‘हाय, हाय’ करके चिल्लाने लगे, किंतु ये किसी की कब सुनने वाले थे, आगे बढ़े ही चले जाते थे। जब श्रीवास के कहने से स्वयं गौरांग ने इन्हें आवाज दी, तब कहीं जाकर ये लौटे। इनके सभी काम अजीब ही होते थे, इससे पहली ही रात्रि में इन्होंने न जाने क्या सोचकर अपने दण्ड-कमण्डलु आदि सभी को तोड़-फोड़ डाला। प्रभु ने इसका कारण पूछा तो ये चुप हो गये। तब प्रभु ने उन्हें बड़े आदर से बीन-बीनकर गंगाजी में प्रवाहित कर दिया।व्यासपूर्णिमा के दिन सभी भक्त स्नान, सन्ध्या-वन्दन करके श्रीवास पण्डित के घर आये। पण्डित जी ने आज अपने पूजा-गृह को खूब सजा रखा था। स्थान-स्थान पर बन्दनबार बँधे हुए थे। द्वार पर कदली-स्तम्भ बड़े ही भले मालूम पड़ते थे। सम्पूर्ण घर गौ के गोबर से लिपा हुआ था, उस पर एक सुन्दर बिछौना बिछा था, सभी भक्त आकर व्यासपीठ के सम्मुख बैठ गये। एक ऊँचे स्थान पर छोटी-सी चौकी रखकर उस पर व्यासपीठ बनायी हुई थी, व्यासजी की सुन्दर मूर्ति उस पर विराजमान थी। सामने पूजा की सभी सामग्री रखी थी, कई थालों में सुन्दर अमनिया किये हुए फल रखे थे, एक ओर घर की बनी हुई मिठाइयाँ रखी थीं। एक थाली में अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पूगीफल, पुष्पमाला तथा अन्य सभी पूजन की सामग्री सुशोभित हो रही थी। पीठ के दायीं ओर आचार्य का आसन बिछा हुआ था। भक्तों के आग्रह करने पर पूजा की पद्धति को हाथ में लिये हुए श्रीवास पण्डित आचार्य के आसन पर विराजमान हुए। भक्तों ने विधिवत व्यासजी का पूजन किया। अब नित्यानन्दप्रभु की बारी आयी। वे श्रीवासजी के कहने से पूजा करने लगे।

श्रीवास पण्डित ने एक सुन्दर-सी माला नित्यानन्द जी के हाथ में देते हुए कहा- ‘श्रीपाद! इसे व्यास जी को पहनाइये।’ श्रीवासजी के इतना कहने पर भी नित्यानन्दजी ने माला व्यासदेव जी को नहीं पहनायी, वे उसे हाथ में ही लिये हुए चुपचाप खड़े रहे। इस पर फिर श्रीवास पण्डित ने जरा जोर से कहा- ‘श्रीपाद आप खड़े क्यों हैं, माला पहनाते क्यों नहीं?’ जिस प्रकार कोई पत्थर की मूर्ति खड़ी रहती है उसी प्रकार माला हाथ में लिये नित्यानन्द जी ज्यों-के-त्यों ही खड़े रहे, मानो उन्होंने कुछ सुना ही नहीं। तब तो श्रीवास पण्डित घबड़ाये, उन्होंने समझा नित्यानन्द जी हमारी बात तो मानेंगे नहीं, यदि प्रभु आकर इन्हें समझावेंगे तो जरूर मान जायँगे। प्रभु उस समय दूसरी ओर बैठे हुए थे, श्रीवास जी ने प्रभु को बुलाकर कहा- ‘प्रभो! नित्यानन्द जी व्यासदेव को माला नहीं पहनाते, आप इनसे कह दीजिये माला पहना दें, देरी हो रही है।’ यह सुनकर प्रभु ने कुछ आज्ञा के-से स्वर में नित्यानन्द जी से कहा- ‘श्रीपाद! व्यासदेव जी को माला पहनाते क्यों नहीं? देखो, देर हो रही है, सभी भक्त तुम्हारी ही प्रतीक्षा में बैठे हैं, जल्दी से पूजन समाप्त करो, फिर संकीर्तन होगा।’
प्रभु की इस बात को सुनकर निताई नींद से जागे हुए पुरुष की भाँति अपने चारों ओर देखने लगे। मानो वे किसी विशेष वस्तु का अन्वेषण कर रहे हों। इधर-उधर देखकर उन्होंने अपने हाथ की माला व्यासदेव जी को तो पहनायी नहीं, जल्दी से गौरांग के सिर पर चढ़ा दी। प्रभु के लम्बे-लम्बे घुँघराले बालों में उलझकर वह माला बड़ी ही भली मालूम पड़ने लगी। सभी भक्त आनन्द में बेसुध-से हो गये। प्रभु कुछ लज्जित-से हो गये। नित्यानन्द जी प्रेम में विभोर होने के कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़े। अहा, प्रेम हो तो ऐसा हो, अपने प्रिय पात्र में ही सभी देवी-देवता और विश्व का दर्शन हो जाय। गौरांग को ही सर्वस्व समझने वाले निताई का उनके प्रति ऐसा ही भाव था। उनका मनोगत भाव था-  

 
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव।।

गौरांग ही उनके सर्वस्व थे। उनकी भावना के अनुसार उन्हें प्रत्यक्ष फल भी प्राप्त हो गया। उनके सामने गौरांग की यह नित्य की मानुषिक मूर्ति विलुप्त हो गयी। अब उन्हें गौरांग की षड्भुजी मूर्ति का दर्शन होने लगा। उन्होंने देखा, गौरांग के मुख की कान्ति कोटि सूर्यों की प्रभा से भी बढ़कर है। उनके चार हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म विराजमान हैं, शेष दो हाथों में वे हल-मूसल को धारण किये हुए हैं। नित्यानन्द जी प्रभु के इस अद्भुत रूप के दर्शनों से अपने को कृतकृत्य मानने लगे। उनके नेत्र उन दर्शनों से तृप्त ही नहीं होते थे। उनके दोनों नेत्र बिलकुल फटे-के-फटे ही रह गये, पलक गिरना एकदम बंद हो गया। नेत्रों की दोनों कोरों से अश्रुओं की धारा बह रही थी। शरीर चेतनाशून्य था। भक्तों ने देखा उनकी साँस चल नहीं रही है, उनका शरीर मृतक पुरुष की भाँति अकड़ा हुआ पड़ा था, केवल मुख की अपूर्व ज्योति को देखकर और नेत्रों से निकलते हुए अश्रुओं से ही यह अनुमान लगाया जा सकता था कि वे जीवित हैं। भक्तों को इनकी ऐसी दशा देखकर बड़ा भय हुआ।
श्रीवास आदि सभी भक्तों ने भाँति-भाँति की चेष्टाओं द्वारा उन्हें सचेत करना चाहा, किंतु उन्हें बिलकुल भी होश नहीं हुआ। प्रभु ने जब देखा कि नित्यानन्द जी किसी भी प्रकार नहीं उठते, तब उनके शरीर पर अपना कोमल कर फेरते हुए प्रभु अत्यन्त ही प्रेम के साथ कहने लगे- ‘श्रीपाद! अब उठिये। जिस कार्य के निमित्त आपने इस शरीर को धारण किया है, अब उस कार्य के प्रचार का समय सन्निकट आ गया है। उठिये और अपनी अहैतु की कृपा के द्वारा जीवों का उद्धार कीजिये। सभी लोग आपकी कृपा के भिखारी बने बैठे हैं।
क्रमशः

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