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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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जिसका आप उद्धार करना चाहें उसका उद्धार कीजिये। श्रीहरि के सुमधुर नामों का वितरण कीजिये। यदि आप ही जीवों के ऊपर कृपा करके भगवन्नाम का वितरण न करेंगे तो पापियों का उद्धार कैसे होगा?’
प्रभु के कोमल कर स्पर्श से निताई की मूर्च्छा भंग हुई, वे अब कुछ-कुछ प्रकृतिस्थ हुए। नित्यानन्द जी को होश में देखकर प्रभु भक्तों से कहने लगे- ‘व्यासपूजा तो हो चुकी, अब सभी मिलकर एक बार सुमधुर स्वर से श्रीकृष्ण-संकीर्तन और कर लो।’ प्रभु की आज्ञा पाते ही पखावज बजने लगी, सभी भक्त हाथों में मजीरा लेकर बड़े ही प्रेम से कीर्तन करने लगे। सभी प्रेम में विह्वल होकर एक साथ-

 
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।

- इस सुमधुर संकीर्तन को करने लगे। संकीर्तन की सुमधुर ध्वनि से श्रीवास पण्डित का घर गूँजने लगा। संकीर्तन की आवाज सुनकर बहुत-से दर्शनार्थी द्वार पर आकर एकत्रित हो गये, किंतु घर का दरवाजा तो बंद था, वे बाहर खड़े-ही खड़े संकीर्तन का आनन्द लूटने लगे। इस प्रकार संकीर्तन के आनन्द में किसी को समय का ज्ञान ही न रहा। दिन डूब गया। तब प्रभु ने संकीर्तन बंद कर देने की आज्ञा दी और श्रीवास पण्डित से कहा- ‘प्रसाद के सम्पूर्ण सामान को यहाँ ले आओ।’ प्रभु की आज्ञा पाकर श्रीवास पण्डित प्रसाद के सम्पूर्ण थालों को प्रभु के समीप उठा लाये। प्रभु ने अपने हाथों से सभी उपस्थित भक्तों को प्रसाद वितरण किया। उस महाप्रसाद को पाते हुए सभी भक्त अपने-अपने घरों को चले गये।

इस प्रकार नित्यानन्द जी श्रीवास पण्डित के ही घर में रहने लगे। श्रीवास पण्डित और उनकी धर्मपत्नी मालिनी देवी उन्हें अपने सगे पुत्र की भाँति प्यार करते थे। नित्यानन्द जी को अपने माता-पिता को छोड़े आज लगभग बीस वर्ष हो गये। बीस वर्षों से ये इसी प्रकार देश-विदेशों में घूमते रहे। बीस वर्षों के बाद अब फिर से मातृ-पितृ-सुख को पाकर ये परम प्रसन्न हुए। गौरांग भी इनका हृदय से बड़ा आदर करते थे, वे इन्हें अपने बड़े भाई से भी बढ़कर मानते थे, तभी तो यथार्थ में प्रेम होता है। दोनों ही ओर से सत्कार के भाव हो तभी अभिन्नता होती है। शिष्य अपने गुरु को सर्वस्व समझे और गुरु शिष्य को चाकर न समझकर अपना अन्तरंग सखा समझे, तभी दृढ़ प्रेम हो सकता है। गुरु अपने गुरुपने में ही बने रहें और शिष्य को अपना सेवक अथवा दास ही समझते रहें, इधर शिष्य अनिच्छापूर्वक कर्तव्य-सा समझकर उनकी सेवा-शुश्रूषा करता रहे, तो उन दोनों में यथार्थ प्रेम नहीं होता। गुरु-शिष्य का बर्ताव तो ऐसा ही होना चाहिये जैसा भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन का था अथवा जनक और शुकदेव जी का जैसा शास्त्रों में सुना जाता है। नित्यानन्द जी गौरांग को अपना सर्वस्व ही समझते थे, किंतु गौरांग उनका सदा पूज्य की ही भाँति आदर-सत्कार करते थे, यही तो इन महापुरुषों की विशेषता थी। नित्यानन्द जी का स्वभाव बड़ा चंचल था। वे कभी-कभी स्वयं अपने हाथों से भोजन ही नहीं करते, तब मालिनी देवी उन्हें अपने हाथों से छोटे बच्चों की तरह खिलातीं। कभी-कभी ये उनके सूखे स्तनों को अपने मुख में देकर उन्हें बालकों की भाँति पीने लगते। कभी उनकी गोद में शिशुओं की तरह क्रीड़ा करते। इस प्रकार ये श्रीवास और उनकी पत्नी मालिनी देवी को वात्सल्य-सुख का आनन्द देते हुए उनके घर में सुखपूर्वक रहने लगे।

अद्वैताचार्य के ऊपर कृपा...

यदि प्रेम सचमुच में स्वाभाविक है, यदि वास्तव में उसमें किसी भी प्रकार का संसारी स्वार्थ नहीं है, तो दोनों ही ओर से हृदय में एक प्रकार की हिलोरें-सी उठा करती हैं।
शान्तिपुर में बैठे हुए अद्वैताचार्य गौरांग की सभी लीलाओं की खबर सुनते और मन-ही-मन प्रसन्न होते। अपने प्यारे की प्रशंसा सुनकर हृदय में स्वाभाविक ही एक प्रकार की गुदगुदी-सी होने लगती है। महाप्रभु का यशःसौरभ अब धीरे-धीरे सम्पूर्ण गौड़देश में व्याप्त हो चुका था।

आचार्य प्रभु के भक्तिभाव की बातें सुनकर आनन्द में विभोर होकर नृत्य करने लगते और अपने-आप ही कभी-कभी कह उठते- ‘गंगाजल और तुलसीदलों से जो मैंने चिरकाल तक भक्त भयभंजन भगवान का अर्चन-पूजन किया था, ऐसा प्रतीत होता है, मेरा वह पूजन अब सफल हो गया। गौरहरि भगवान विश्वम्भर के रूप में प्रकट होकर भक्तों के दुःखों को दूर करेंगे।’ उनका हृदय बार-बार कहता- ‘प्रभु की छत्रछाया में रहकर अनेकों भक्त पावन बन रहे हैं, वे अपने को गौरहरि के संसर्ग और संपर्क से कृतकृत्य बना रहे हैं, तू भी चलकर अपने इस नीरस जीवन को सार्थक क्यों नहीं बना लेता?’ किंतु प्रेम में भी एक प्रकार का मीठा-मीठा मान होता है। अपने प्रिय की कृपा की प्रतीक्षा में भी एक प्रकार का अनिर्वचनीय सुख मिलता है। इसलिये थोड़ी ही देर बाद वे फिर सोचते- ‘मैं स्वयं क्यों चलूँ, जब ये ही मेरे इष्टदेव होंगे, तो मुझे स्वयं ही बुलावेंगे, बिना बुलाये मैं क्यों जाऊँ?’ इन्हीं सब कारणों से इच्छा होने पर भी अद्वैताचार्य नवद्वीप नहीं आते थे।

इधर महाप्रभु को जब भावावेश होता तभी जोरों से चिल्ला उठते- ‘‘नाड़ा’’ कहाँ है! हमें बुलाकर ‘नाड़ा’ स्वयं शान्तिपुर में जा छिपा। उसी की हुंकार से तो हम आये हैं।’’ पहले-पहल तो भक्तगण समझ ही न सके कि ‘नाड़ा’ कहने से प्रभु का अभिप्राय किससे है? जब श्रीवास पण्डित ने दीनता के साथ जानना चाहा कि ‘नाड़ा’ कौन है, तब प्रभु ने स्वयं ही बताया कि ‘अद्वैताचार्य की प्रार्थना पर ही हम जगदुद्धार के निमित्त अवनितल पर अवतीर्ण हुए हैं। ‘नाड़ा’ कहने से हमारा अभिप्राय उन्हीं से है।’
अब तो नित्यानन्द प्रभु के नवद्वीप में आ जाने से गौरांग का आनन्द अत्यधिक बढ़ गया था। अब वे अद्वैत के बिना कैसे रह सकते थे? अद्वैत और नित्यानन्द ये तो इनके परिकर के प्रधान स्तम्भ थे। इसलिये एक दिन एकान्त में प्रभु ने श्रीवास पण्डित के छोटे भाई राम से शान्तिपुर जाने के लिये संकेत किया। प्रभु का इंगित पाकर रमाई पण्डित को परम प्रसन्नता हुई। वे उसी समय अद्वैताचार्य को लिवाने के लिये शान्तिपुर चल दिये।शान्तिपुर में पहुँचने पर रमाई पण्डित आचार्य के घर गये।
क्रमशः

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