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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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उस समय आचार्य अपने घर के सामने बैठे हुए थे, दूर से ही श्रीवास पण्डित के अनुज को आते देखकर वे गद्गद हो उठे, उनकी प्रसन्नता का पारावार नहीं रहा। आचार्य समझ गये कि ‘अब हमारे शुभ दिन आ गये। कृपा करके प्रभु ने हमें स्वयं बुलाने के लिये रमाई पण्डित को भेजा है, भगवान भक्त की प्रतिज्ञा की इतनी अधिक परवा करते हैं कि उसके सामने वे अपना सब ऐश्वर्य भूल जाते हैं।’ इसी बीच रमाई ने आकर आचार्य को प्रणाम किया। आचार्य ने भी उनका प्रेमालिंगन किया।आचार्य से प्रेमालिंगन पाकर रमाई पण्डित एक ओर खड़े हो गये और आचार्य की ओर देखकर कुछ मुसकराने लगे। उन्हें मुसकराते देखकर आचार्य कहने लगे- ‘मालूम होता है, प्रभु ने मुझे स्मरण किया है, किंतु मुझे कैसे पता चले कि यथार्थ में वे ही मेरे प्रभु हैं? जिन प्रभु को पृथ्वी पर संकीर्तन का प्रचार करने के निमित्त मैं प्रकट करना चाहता था, वे मेरे आराध्यदेव प्रभु ये ही हैं, इसका तुम लोगों के पास कुछ प्रमाण है?’ कुछ मुसकराते हुए रमाई पण्डित ने कहा- ‘आचार्य महाशय! हम लोग तो उतने पण्डित तो नहीं हैं। प्रमाण और हेतु तो आप-जैसे विद्वान ही समझ सकते हैं। किंतु हम इतना अवश्य समझते हैं कि प्रभु बार-बार आपका स्मरण करते हुए कहते हैं- ‘अद्वैताचार्य ने ही हमें बुलाया है, उसी के हुंकार के वशीभूत होकर हम भूतल पर आये हैं। लोकोद्धार की सबसे अधिक चिन्ता अद्वैताचार्य को ही थी, इसीलिये उसकी चिन्ता को दूर करने के निमित्त श्रीकृष्ण-संकीर्तन द्वारा लोकोद्धार करने के निमित्त ही हम अवतीर्ण हुए हैं।’ अद्वैताचार्य मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे, प्रभु की दयालुता, भक्तवत्सलता और कृपालुता का स्मरण करके उनका हृदय द्रवीभूत हो रहा था, प्रेम के कारण उनका कण्ठ अवरुद्ध हो गया। इच्छा करने पर भी वे कोई बात मुख से नहीं कह सकते थे, प्रेम में गद्गद होकर वे रुदन करने लगे। पास में ही बैठी हुई उनकी धर्मपत्नी सीता देवी भी आचार्य की ऐसी दशा देखकर प्रेम के कारण अश्रु बहाने लगी।कुछ काल के अनन्तर अद्वैताचार्य के प्रेम का वेग कुछ कम हुआ। उन्होंने जल्दी से सभी पूजा की सामग्री इकट्ठी की और अपनी स्त्री तथा बच्चे को साथ लेकर वे रमाई के साथ नवद्वीप की ओर चल पड़े। नवद्वीप में पहुँचने पर आचार्य ने रमाई पण्डित से कहा- ‘देखो, हम इस प्रकार प्रभु के पास नहीं जायँगे, हम यहीं नन्दनाचार्य के घर में ठहरते हैं, तुम सीधे घर चले जाओ। यदि प्रभु हमारे आने के सम्बन्ध में कुछ पूछें तो तुम कह देना, ‘वे नहीं आये।’ यदि उनकी हमारे प्रति यथार्थ प्रीति होगी, तो वे हमें यहाँ से स्वयं ही बुला लेंगे। वे हमारे मस्तक के ऊपर अपना चरण रखेंगे, तभी हम समझेंगे कि उनकी हमारे ऊपर कृपा है और हमारी ही प्रार्थना पर वे जगत-उद्धार के निमित्त अवतीर्ण हुए हैं।’
आचार्य की ऐसी बात सुनकर रमाई पण्डित अपने घर चले गये। शाम के समय सभी भक्त आ-आकर श्रीवास पण्डित के घर एकत्रित होने लगे। कुछ काल के अनन्तर प्रभु भी पधारे। आज प्रभु घर में प्रवेश करते ही भावावेश में आ गये। भगवदावेश में वे जल्दी से भगवान के आसन पर विराजमान हो गये और जोरों के साथ कहने लगे- ‘नाड़ा शान्तिपुर से तो आ गया है, किंतु हमारी परीक्षा के निमित्त नन्दनाचार्य के घर छिपा बैठा है। वह अब भी हमारी परीक्षा करना चाहता है। उसी ने तो हमें बुलाया है और अब वही परीक्षा करना चाहता है।’ प्रभु की इस बात को सुनकर भक्त आपस में एक-दूसरे का मुख देखने लगे।
नित्यानन्द मन-ही-मन मुसकराने लगे। मुरारी गुप्त ने उसी समय प्रभु की पूजा की। धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाकर सुगन्धित पुष्पों की माला प्रभु के गले में पहनायी और खाने के लिये सुन्दर सुवासित ताम्बूल दिया। इसी समय रमाई पण्डित ने सभी वृत्तान्त जाकर अद्वैताचार्य से कहा। सब वृत्तान्त सुनकर आचार्य चकित-से हो गये और प्रेम में बेसुध-से हुए गिरते-पड़ते श्रीवास पण्डित के घर आये। जिस घर में प्रभु विराजमान थे, उस घर में प्रवेश करते ही अद्वैताचार्य को प्रतीत हुआ कि सम्पूर्ण घर आलोकमय हो रहा है। कोटि सूर्यों के सदृश प्रकाश उस घर में विराजमान है, उन्हें प्रभु की तेजोमय मूर्ति के स्पष्ट दर्शन न हो सके। उस असह्या तेज के प्रभाव को आचार्य सहन न कर सके। उनकी आँखों के सामने चकाचौंध-सी छा गयी, वे मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े और देहली से आगे पैर न बढ़ा सके। भक्तो ने वृद्ध आचार्य को उठाकर प्रभु के सम्मुख किया।प्रभु के सम्मुख पहुँचने पर भी वे संज्ञाशून्य ही पड़े रहे और बेहोशी की ही हालत में लम्बी-लम्बी साँसें भरकर जोरों के साथ रुदन करने लगे। उन वृद्ध तपस्वी विद्वान पण्डित की ऐसी अवस्था देखकर सभी उपस्थित भक्त आनन्दसागर में गोते खाने लगे और अपनी भक्ति को तुच्छ समझकर रुदन करने लगे।
थोड़ी देर के अनन्तर प्रभु ने कहा- ‘आचार्य! उठो, अब देर करने का क्या काम है, तुम्हारी मनःकामना पूर्ण हुई। चिरकाल की तुम्हारी अभिलाषा के सफल होने का समय अब सन्निकट आ गया। अब उठकर हमारी विधिवत पूजा करो’
प्रभु की प्रेममय वाणी सुनकर वे कुछ प्रकृतिस्थ हुए। भोले बालक के समान सत्तर वर्ष के श्वेत केशवाले विद्वान ब्राह्मण सरलता के साथ प्रभु का पूजन करने के लिये उद्यत हुए।
जगन्नाथ मिश्र जिन्हें पूज्य और श्रेष्ठ मानते थे, विश्वरूप के जो विद्यागुरु थे और निमाई को जिन्होंने गोद में खिलाया था, वे ही भक्तों के मुकुटमणि महामान्य अद्वैताचार्य एक तेईस वर्ष के युवक के आदेश से सेवक की भाँति अपने भाग्य की सराहना करते हुए उसकी पूजा करने को तैयार हो गये। इसे ही तो विभूतिमत्ता कहते हैं, यही तो भगवत्ता है, जिसके सामने सभी प्राणी छोटे हैं। जिसके प्रभाव से जाति, कुल, रूप तथा अवस्था में छोटा होने पर भी पुरुष सर्वपूज्य समझा जाता है।
अद्वैताचार्य ने सुवासित जल से पहले तो प्रभु के पादपद्मों को पखारा, फिर पाद्य, अर्ध्य देकर सुगन्धित चन्दन प्रभु के श्रीअंगों में लेपन किया, अनन्तर अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्यादि चढ़ाकर सुन्दर माला प्रभु के गले में पहनायी और ताम्बूल देकर वे हाथ जोड़कर गद्गदकण्ठ से स्तुति करने लगे।
क्रमशः
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