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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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वे रोते-रोते बार-बार इस श्लोक को पढ़ते थे-
नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च।
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः।।
श्लोक पढ़ते-पढ़ते वे और भी गौरांग को लक्ष्य करके भाँति-भाँति की स्तुति करने लगे। स्तुति करते-करते वे बेसुध-से हो गये। इसी बीच अद्वैताचार्य की पत्नी सीतादेवी ने प्रभु की पूजा की। प्रभु ने भावावेश में आकर उन दोनों के मस्तकों पर अपने श्रीचरण रखे। प्रभु के पदपद्मों के स्पर्शमात्र से आचार्यपत्नी और आचार्य आनन्द में विभोर होकर रुदन करने लगे। प्रभु ने आचार्य को आश्वासन देते हुए कहा- ‘आचार्य! अब जल्दी से उठो, अब देर करने का काम नहीं है। अपने संकीर्तन द्वारा मुझे आनन्दित करो।’
प्रभु का आदेश पाते ही, आचार्य दोनों हाथों को ऊपर उठाकर प्रेम के साथ संकीर्तन करने लगे। सभी भक्त अपने-अपने वाद्यों को बजा-बजाकर आचार्य के साथ संकीर्तन करने में निमग्न हो गये। आचार्य प्रेम के आवेश में जोरों से नृत्य कर रहे थे, उन्हें शरीर की तनिक भी सुध-बुध नहीं थी। वे प्रेम में इतने मतवाले बने हुए थे कि कहीं पैर रखते थे और कहीं जाकर पैर पड़ते थे। धीरे-धीरे स्वेद, कम्प, अश्रु, स्वरभंग तथा विकृति आदि सभी संकीर्तन के सात्त्विक भावों का अद्वैताचार्य के शरीर में उदय होने लगा। भक्त भी अपने-आपको भूलकर अद्वैताचार्य की ताल के साथ अपना ताल-स्वरमिला रहे थे, इस प्रकार उस दिन के संकीर्तन में सभी को अपूर्व आनन्द आया। आज तक कभी भी इतना आनन्द संकीर्तन में नहीं आया था। सभी भक्त इस बात का अनुभव करने लगे कि आज का संकीर्तन सर्वश्रेष्ठ रहा। क्यों न हो, जहाँ अद्वैत तथा निमाई, निताई ये तीनों ही प्रेम के मतवाले एकत्रित हो गये, वहाँ अद्वितीय तथा अलौकिक आनन्द आना ही चाहिये। बहुत रात्रि बीतने पर संकीर्तन समाप्त हुआ और सभी भक्त प्रेम में छके हुए-से अपने-अपने घरों को चले गये।
अद्वैताचार्य को श्यामसुन्दररूप के दर्शन....
प्रेम में छोटेपन का भाव ही नहीं रहता। प्रेमी अपने प्रिय को सदा बड़ा ही समझता है। भगवान भक्तप्रिय हैं। जहाँ भक्त उन्हें अपना सर्वस्व समझते हैं, वहाँ वे भी भक्त को अपना सर्वस्व समझते हैं। भक्त के प्रति श्रद्धा का भाव प्रदर्शित करते हुए भगवान स्वयं कहते हैं- ‘मैं भक्तों के पीछे-पीछे इस कारण फिरा करता हूँ कि उनकी पदधूलि उड़कर मेरे ऊपर पड़ जाय और उससे मैं पावन हो जाऊँ।’ जगत को पावन बनाने वाले प्रभु के ये भाव हैं। भक्त उनका दिन-रात्रि भजन करते हैं, वे भी कहते हैं- ‘जो मेरा जिस रूप में भजन करता है, मैं भी उसका उसी रूप से भजन करता हूँ।’ विश्व के एकमात्र भजनीय भगवान की लीला तो देखिये। प्रेम का कैसा अनोखा दृष्टान्त है। जो विश्वम्भर है, चर-अचर सभी प्राणियों का जो सदा पालन-पोषण करते हैं, जिनके संकल्पमात्र से सम्पूर्ण विश्व तृप्त हो सकता है, वे कहते हैं जो कोई मुझे भक्ति से कुछ दे देता है उसे ही मैं प्रसन्न होकर खा लेता हूँ। पत्ता खाने की चीज नहीं है, फूल सूँघने की वस्तु है और जल पीने की, अन्न या फल ही खाये जाते हैं। प्रेम में पागल हुए भगवान कहते हैं- ‘यदि मुझे कोई भक्ति-भाव से पत्र, पुष्प, फल अथवा जल ही दे देता है तो मैं उसे बहुत ही अमूल्य वस्तु समझकर सन्तुष्ट मन से खा जाता हूँ। पत्ते और फूलों को भी खा जाते हैं, सबके लिये ‘अश्नामि’ इसी क्रिया का प्रयोग करते हैं। धन्य है, ऐसे खाने को! क्यों न हो, प्रेम में ये पार्थिव पदार्थ ही थोड़े खाये जाते हैं, असली तृप्ति का कारण तो उन पदार्थों में ओत-प्रोतभाव से भरा हुआ प्रेम है, उस प्रेम को ही खाकर प्रभु परम प्रसन्न होते हैं। प्रेम है ही ऐसी वस्तु! उसका जहाँ भी समावेश हो जायगा वही पदार्थ सुखमय, मधुमय, आनन्दमय और तृप्तिकारक बन जायगा।
उस दिन संकीर्तन के अनन्तर दूसरे-तीसरे दिन फिर अद्वैताचार्य शान्तिपुर को ही चले गये। उनके मन में अब भी प्रभु के प्रति संदेह के भाव बने हुए थे। उनका मन अब भी दुविधा में था कि ये हमारे इष्टदेव ही हैं या और कोई। इसीलिये एक दिन संशयबुद्धि से वे फिर नवद्वीप पधारे। वैसे उनका हृदय प्रभु की ओर स्वतः ही आकर्षित हो गया था, उन्हें महाप्रभु की स्तुतिमात्र से परमानन्द प्रतीत होता था। भीतर से बिना विश्वास के ऐसे भाव हो ही नहीं सकते, किंतु प्रकट में वे अपना अविश्वास ही जताते।उस समय प्रभु श्रीवास पण्डित के यहाँ भक्तों के साथ श्रीकृष्ण कथा कर रहे थे। आचार्य को आया देखकर प्रभु भक्तों के सहित उनके सम्मान के निमित्त उठ पड़े। प्रभु ने बड़ी श्रद्धा-भक्ति के सहित आचार्य के लिये प्रणाम किया तथा आचार्य ने भी लजाते हुए अपने श्वेत बालों से प्रभु के पादपद्मों की पराग को पोंछा। उपस्थित सभी भक्तों को आचार्य ने प्रेमालिंगन दान दिया और प्रभु के साथ वे सुखपूर्वक बैठ गये। सबके बैठ जाने पर प्रभु ने मुसकराते हुए कहा- ‘यहाँ पर सीतापति विराजमान हैं, किसी को भय भले हो, हमें तो कुछ भय नहीं। वे हमारा शमन न कर सकेंगे।’
कुछ बनावटी गम्भीरता धारण करते हुए तथा अपने चारों ओर देखते हुए आचार्य ने कहा-‘यहाँ रघुनाथ तो दृष्टिगोचर होते नहीं, हाँ, यदुनाथ अवश्य विराजमान हैं।’ प्रभु इस उत्तर को सुनकर कुछ लज्जित-से हुए। बात को उड़ाने के निमित्त कहने लगे- ‘देखिये, हम तो चिरकाल से आशा लगाये बैठे थे कि हम सभी लोग आपकी छत्रछाया में रहकर श्रीकृष्ण का कीर्तन करते, किंतु आप शान्तिपुर जा विराजे, ऐसा हम लोगों से क्या अपराध बन गया है?’
अद्वैताचार्य इसका कुछ उत्तर देने नहीं पाये थे कि बीच में ही श्रीवास पण्डित बोल उठे- ‘अद्वैताचार्य का नाम ही अद्वैत है। इसीलिये वे शान्तिपुर में निवास कर रहे हैं। अब आपका आविर्भाव नवद्वीपरूपी नवधाभक्ति के पीठ में हुआ। उसमें विराजमान होकर नित्यानन्द उसका रसास्वादन कर रहे हैं। अद्वैत भी शान्तिपुर छोड़कर इस नित्यानन्दपूर्णपीठ में आकर गौरगुणगान द्वारा अपने को नित्यानन्दमय बनाना चाहते हैं। अभी ये द्वैत-अद्वैत के दुविधा में हैं।’
इस गूढ़ उत्तर का मर्म समझकर हँसते हुए आचार्य कहने लगे- ‘जहाँ पर श्रीवास’ हैं, वहाँ पर लोगों की क्या कमी है।
क्रमशः
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