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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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श्रीके वास में आकर्षण ही ऐसा है कि हम- जैसे सैकड़ों मनुष्य उनके प्रभाव से खिंचे चले आवेंगे।’
श्रीवास पण्डित इस गूढ़ोक्ति से बड़े प्रसन्न हुए, उसे प्रभु के ऊपर घटाते हुए कहने लगे- ‘जब लक्ष्मी देवी थीं, तब थीं, अब तो वे यहाँ वास नहीं करतीं, अब तो वे नवद्वीप से अन्तर्धान हो गयीं। (गौरांग महाप्रभु की पहली पत्नी का नाम ‘लक्ष्मी’ था। ‘श्री’ के माने लक्ष्मी लगाकर श्रीवास पण्डित ने कहा- अब यहाँ श्री का वास नहीं है।)
प्रभु ने जब देखा श्रीवास हमारे ऊपर घटाने लगे हैं तब आपने जल्दी से कहा- ‘पण्डित जी! यह आप कैसी बात कर रहे हैं? श्री के माने है ‘भक्त’। जहाँ पर आप-जैसे भक्त विराजमान हैं वहाँ श्री का वास अवश्य ही होना चाहिये, भला ऐसे स्थान को छोड़कर ‘भक्ति’ या ‘श्री’ कहीं जा सकती हैं?’
इस पर आचार्य कहने लगे- ‘हाँ’ ठीक तो है। श्री के बिना हरि रह ही कैसे सकते हैं?’ ‘श्री’ विष्णुप्रिया नाम रखकर नवद्वीप में अवस्थित हैं अथवा उन्होंने श्री के साथ विष्णुप्रिया अपने नाम में और जोड़ लिया है, अब वे केवल श्री न होकर ‘श्रीविष्णुप्रिया’ बन गयी हैं।’
बात को दूसरी ओर घटाते हुए प्रभु ने कहा- ‘श्री तो सदा से ही विष्णुप्रिया ही हैं, ‘भक्तिप्रियो माधवः’ भगवान को तो सदा से भक्ति प्यारी है। इसलिये श्री अथवा भक्ति का नाम पहले से ही विष्णुप्रिया है।’
यह सुनकर आचार्य जल्दी से प्रभु को प्रणाम करते हुए बोले- ‘तभी प्रभु ने एक विग्रह से लक्ष्मीरूप से उन्हें ग्रहण किया फिर अब श्रीविष्णुप्रिया के रूप से उनके दूसरे विग्रह को अपनी अर्धांगिनी बनाया है।’
इस प्रकार आपस में श्लेषात्मक बातें हो ही रही थीं कि प्रभु के घर से एक आदमी आया और उसने नम्रतापूर्वक प्रभु से निवेदन किया- ‘शचीमाता ने कहलाया है कि आज आचार्य घर में ही भोजन करें। कृपा करके वे हमारे आज के निमन्त्रण को अवश्य ही स्वीकार करें।’
उस आदमी की बातें सुनकर प्रभु ने उसे कुछ भी उत्तर नहीं दिया। जिज्ञासा के भाव से वे आचार्य के मुख की ओर देखने लगे। प्रभु के भाव को समझकर आचार्य कहने लगे- ‘हमारा अहोभाग्य, जो जगन्माता ने हमें भोजन के लिये निमन्त्रित किया है, इसे हम अपना सौभाग्य ही समझते हैं।’
बीच में ही बात को काटते हुए श्रीवास पण्डित बोल उठे- ‘इस सौभाग्यसुख को अकेले ही लूटोगे या दूसरों को भी साझी बनाओगे? हम तो तुम्हें अकेले कभी इस आनन्द का उपभोग न करने देंगे। यदि गौरांग हमें निमन्त्रित न भी करेंगे, तो हम शचीमाता के समीप जाकर याचना करेंगे। वे तो साक्षात अन्नपूर्णा ही ठहरीं, उनके दरबार से कोई निराश होकर थोड़े ही लौट सकता है, आचार्य महाशय! तुम्हारी अकेले ही दाल नहीं गलने की, हमें भी साथ ले चलना पड़ेगा।’
आचार्य अद्वैत और महाप्रभु वैसे तो दोनों ही सिलहट निवासी ब्राह्मण थे, किंतु दोनों का परस्पर में खान-पान एक नहीं था, इसी बात को जानने के निमित्त कुछ संकोच के साथ प्रभु ने कहा- ‘भोजन की क्या बात है, सर्वस्व आपका ही है, किंतु आचार्य को दो आदमियों के लिये भात बनाने में कष्ट होगा।’
इस पर आचार्य बीच में बोल उठे- ‘मुझे क्यों कष्ट होने का? कष्ट होगा तो शचीमाता को होगा। सो, वे तो जगन्माता ठहरीं। वे कष्ट को कष्ट मानती ही नहीं। यदि वे बनाने में असमर्थ होंगी तो फिर हमको बनाना ही होगा।’ इस उत्तर से प्रभु समझ गये कि आचार्य को अब हमारे घर का भात खाने में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं। असल में प्रेम में किसी प्रकार का निश्चित नियम है ही नहीं। यह नहीं कह सकते कि सभी प्रेमी सामाजिक नियमों को भंग कर दें या सभी प्रेमी अन्य लोगों की भाँति सामाजिक नियमों का पालन ही करे। इनके लिये कोई निश्चित नियम नहीं। भगवान राम-जैसे सर्वश्रेष्ठ प्रेमी ने ‘सीता-परीक्षा’, ‘सीता-परित्याग’ और ‘लक्ष्मण-परित्याग- जैसे असह्या और वेदनापूर्ण कार्यों को इसीलिये किया कि जिससे लोक-संग्रह का धर्म अक्षुण्ण बना रहे। इसके विपरीत भगवान श्रीकृष्ण ने प्रेम के पीछे सामाजिक नियमों की कोई परवा ही नहीं की। अब भी देखा जाता है, बहुत-से अत्यन्त प्रेमी सामाजिक और धार्मिक नियमों में दृढ़ रहकर बर्ताव करते हैं। बहुत-से इन सबकी उपेक्षा भी करते देखे गये हैं। इसलिये प्रेम-पन्थ के लिये कोई निश्चित नियम निर्धारित नहीं किया जा सकता। यह तो नियमों से रहित अलौकिक पन्थ है। आचार्य के लिये अब प्रभु के घर में क्या संकोच होना था, जब उन्होंने अपना सर्वस्व प्रभु के पाद-पद्मों में समर्पित कर दिया।
स्वीकृति लेकर वह मनुष्य माता से कहने चला गया। इधर आचार्य ने धीरे से कोई बात श्रीवास पण्डित के कान में कही। आपस में दोनों को धीरे-धीरे बातें करते देखकर प्रभु हँसते हुए कहने लगे- ‘दोनों पण्डितों में क्या गुपचुप बातें हो रही हैं, हम उन बातों को सुनने के अधिकारी नहीं हैं क्या?’
प्रभु की बात सुनकर आचार्य तो कुछ लज्जित-से होकर चुप हो गये, किंतु श्रीवास पण्डित थोड़ी देर ठहरकर कहने लगे- ‘प्रभो! आचार्य अपने मन में अत्यन्त दुःखी हैं। वे कहते हैं- प्रभु ने नित्यानन्दजी के ऊपर तो कृपा करके उनको अपना असली रूप दिखा दिया, किंतु न जाने क्यों, हमारे ऊपर कृपा नहीं करते? हमें पहले आश्वासन भी दिलाया था कि तुम्हें अपना रूप दिखावेंगे, किंतु अभी तक हमारे ऊपर कृपा नहीं हुई।’
कुछ विस्मय-सा प्रकट करते हुए प्रभु ने कहा- ‘मैं नहीं समझता, असली रूप कहने से आचार्य का क्या अभिप्राय है? मेरा असली रूप तो यही है, जिसे आप सब लोग सदा देखते हैं और अब भी देख रहे हैं।’
अपनी बात का प्रभु को भिन्न रीति से अर्थ लगाते हुए देखकर श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘हाँ प्रभो! यह ठीक है, आपका असली रूप तो यही है, हम सब भी इसी गौररूप की श्रद्धा-भक्ति के साथ वन्दना करते हैं, किंतु आपने आचार्य को अन्य रूप के दर्शनों का आश्वासन दिलाया था, वे उसी आश्वासन का स्मरणमात्र करा रहे हैं।’
श्रीवास के ऐसे उत्तर से संतुष्ट होकर प्रभु कहने लगे- ‘पण्डित जी! आप तो सब कुछ जानते हैं, मनुष्य की प्रकृति सदा एक-सी नहीं रहती। वह कभी कुछ सोचता है और कभी कुछ।
क्रमशः
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