cc 96

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
96-

जब मेरी उन्माद की-सी अवस्था हो जाती है, तब उसमें न जाने मैं क्या-क्या बक जाता हूँ, उसका स्मरण मुझे स्वयं ही नहीं रहता। मैंने अपनी उन्मादावस्था में आचार्य से कुछ कह दिया होगा, उसका स्मरण मुझे अब बिलकुल नहीं है।
यह सुनकर कुछ दीनता के भाव से श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘प्रभो! आप हमारी हर समय क्यों वंचना किया करते हैं, लोगों को जब उन्माद होता है, तो उनसे अन्य लोगों को बड़ा भय होता है। लोग उनके समीप जाने तक में डरते हैं, किंतु आपका उन्माद तो लोगों के हृदयों में अमृत-सिंचन-सा करता है। भक्तों को उससे बढ़कर कोई दूसरा आनन्द ही प्रतीत नहीं होता। क्या आपका उन्माद सचमुच में उन्माद ही होता है? यदि ऐसा हो तो फिर भक्तों को इतना अपूर्व आनन्द क्यों होता है? आप में सर्वसामर्थ्य है। आप जिस समय जैसा चाहें रूप दिखा सकते हैं।’

प्रभु ने कहा- ‘पण्डित जी! सचमुच में आप विश्वास कीजिये, किसी को कोई रूप दिखाना मेरे बिलकुल अधीन नहीं है। किस समय कैसा रूप बन जाता है, इसका मुझे स्वयं पता नहीं चलता। आप कहते हैं, आचार्य श्यामसुन्दररूप के दर्शन करना चाहते हैं। यह मेरे हाथ की बात थोड़े ही है। यह तो उनकी दृढ़भावना के ही ऊपर निर्भर है। उनकी जैसे रूप में प्रीति होगी, उसी भाव के अनुसार उन्हें दर्शन होंगे। यदि उनकी उत्कट इच्छा है, यदि यथार्थ में वे श्यामसुन्दररूप का ही दर्शन करना चाहते हैं तो आँखें बन्द करके ध्यान करें, बहुत सम्भव है, वे अपनी भावना के अनुसार श्यामसुन्दर की मनोहर मूर्ति के दर्शन कर सकें।
प्रभु की ऐसी बात सुनकर आचार्य ने कुछ संदेह और कुछ परीक्षा के भाव से आँखें बंद कर लीं। थोड़ी ही देर में भक्तों ने देखा कि आचार्य मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े हैं। लोगों ने उनके शरीर को स्पर्श करके देखा तो उसमें चेतना मालूम ही न पड़ी। श्रीवास पण्डित ने उनकी नासिका के छिद्रों पर हाथ रखा, उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ, मानो उनकी साँस चल ही नहीं रही है। इन सब लक्षणों से तो यही प्रतीत होता था कि उनके शरीर में प्राण नहीं है, किंतु चेहरे की कान्ति समीप के लोगों को चकित बनाये हुए थी। उनके चेहरे पर प्रत्यक्ष तेज चमकता था। सम्पूर्ण शरीर रोमांचित हो रहा था। सभी भक्त उनकी ऐसी अवस्था देखकर आश्चर्य करने लगे! श्रीवास पण्डित ने घबड़ाहट के साथ प्रभु से पूछा- ‘प्रभो! आचार्य की यह कैसी दशा हो गयी? न जाने क्यों वे इस प्रकार मूर्च्छित और संज्ञाशून्य-से हो गये?
प्रभु ने कहा- ‘आप लोग किसी प्रकार का भी भय न करें। मालूम होता है, आचार्य को हृदय में अपने इष्टदेव के दर्शन हो गये हैं, उसी के प्रेम में ये मूर्च्छित हो गये हैं। मुझे तो ऐसा ही अनुमान होता है।’ गद्गद कण्ठ से श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘प्रभो! अनुमान और प्रत्यक्ष दोनों ही आपके अधीन हैं। आचार्य सौभाग्यशाली हैं जो इच्छा करते ही उन्हें आपके श्यामसुन्दररूप के दर्शन हो गये। हतभाग्य तो हमीं हैं जो हमें इस प्रकार का कभी भी सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ। अस्तु, अपना-अपना भाग्य ही तो है, न हो हमें किसी और रूप का दर्शन, हमारे लिये तो यह गौररूप ही यथेष्ट है। अब ऐसा अनुग्रह कीजिये जिससे आचार्य को होश आये।’

श्रीवासजी की बात सुनकर प्रभु ने कहा- ‘आप भी कैसी बात कहते हैं, मैं उन्हें कैसे चेतन कर सकता हूँ? वे स्वयं ही चैतन्य होंगे। यह देखो, आचार्य अब कुछ-कुछ आँखें खोलने लगे हैं।’ प्रभु का इतना कहना था कि आचार्य की मूर्छा धीरे-धीरे भंग होने लगी। जब वे स्वस्थ हुए तो श्रीवास पण्डित ने पूछा- ‘आचार्य! क्या देखा? श्रीवास के पूछने पर गद्गद कण्ठ से आचार्य कहने लगे- ‘ओहो! अद्भुत रूप के दर्शन हुए। वे ही श्यामसुन्दर वनवारी, पीतपटधारी, मुरलीमनोहर मेरे सामने प्रत्यक्ष प्रकट हुए। मैंने प्रत्यक्ष देखा, स्वयं गौर ने ही ऐसा रूप धारण करके मेरे हृदय में प्रवेश किया और अपनी मन्द-मन्द मुस्कान से मुझे बेसुध-सा बना लिया। मेरा मन अपने अधीन नहीं रहा। वह उस माधुरी को पान करने में ऐसा तल्लीन हुआ कि अपने-आपको ही खो बैठा। थोड़ी ही देर के पश्चात् वह मूर्ति गौररूप धारण करके मेरे सामने आ बैठी, तभी मुझे चेत हुआ। यह कहते-कहते आचार्य प्रेम के कारण गद्गद कण्ठ से रुदन करने लगे। उनकी आँखों की कोरों में से ठंडे अश्रुओं की दो धारा-सी बह रही थी। प्रभु ने हँसते हुए कुछ बनावटी उपेक्षा के साथ कहा- ‘मालूम पड़ता है, आचार्य ने गत रात्रि में जागरण किया है। इसीलिये आँखें बन्द करते ही नींद आ गयी और उसी नींद में इन्होंने स्वप्न देखा है, उसी स्वप्न की बातें ये कह रहे हैं।’
प्रभु की ऐसी बात सुनकर आचार्य अधीर होकर प्रभु के चरणों में गिर पड़े और गद्गद कण्ठ से कहने लगे- ‘प्रभो! मेरी अब अधिक वंचना न कीजिये। अब तो आपके श्रीचरणों में विश्वास उत्पन्न हो जाय, ऐसा ही आशीर्वाद दीजिये।’ प्रभु ने वृद्ध आचार्य को उठाकर गले से लगाया और प्रेम के साथ कहने लगे- ‘आप परम भागवत हैं, आपकी निष्ठा बहुत ऊँची है, आपके निरन्तर ध्यान का ही यह प्रत्यक्ष फल है कि नेत्र बंद करते ही आपको भगवान के दर्शन होने लगे हैं चलिये, अब बहुत देर हो गयी, माता भोजन बनाकर हम लोगों की प्रतीक्षा कर रही होगी। आज हम सब साथ-ही-साथ भोजन करेंगे।’
प्रभु की आज्ञा पाकर श्रीवास के सहित आचार्य महाप्रभु के घर चलने को तैयार हो गये। घर पहुँचकर प्रभु ने देखा, माता सब सामान बनाकर चौके में बैठी सब लोगों के आने की प्रतीक्षा कर रही है। प्रभु ने जल्दी से हाथ-पैर धोकर आचार्य और श्रीवास पण्डित के स्वयं पैर धुलाये और उन्हें बैठने को सुन्दर आसन दिये। दोनों के बहुत आग्रह करने पर प्रभु भी आचार्य और श्रीवास के बीच में भोजन करने के लिये बैठ गये। शचीमाता ने आज बड़े ही प्रेम से अनेक प्रकार के व्यंजन बनाये थे। भोजन परोस जाने पर दोनों ने भगवान के अर्पण करके तुलसी मंजरी पड़े हुए उन सभी व्यंजनों को प्रेम के साथ पाया।
क्रमशः

Comments

Popular posts from this blog

cc 201

362

cc 90