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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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वह कौन-सा सुदिवस होगा जब मैं उन्हें प्रेम से आलिंगन करके रुदन करूँगा? प्रभु की ऐसी बात सुनकर सभी को परम प्रसन्नता हुई और सब-के-सब पुण्डरीक विद्यानिधि के दर्शन के लिये परम उत्सुकता प्रकट करने लगे। सबने अनुमान लगा लिया कि जब प्रभु उनके लिये इस प्रकार रुदन करते हैं, तो वे शीघ्र ही नवद्वीप में आने वाले हैं। प्रभु के स्मरण करने पर अपने घर में ठहर ही कौन सकता है, इसीलिये सब भक्त विद्यानिधि के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे।
एक दिन चुपचाप पुण्डरीक महाशय नवद्वीप पधारे। किसी को भी उनके आने का पता नहीं चला। बहुत-से भक्तों ने उन्हें देखा भी, किंतु उन्हें देखकर कौन अनुमान लगा सकता था कि ये परम भागवत वैष्णव हैं? भक्तों ने उन्हें कोई सांसारिक धनी-मानी पुरुष ही समझा, इसीलिये भक्त उनके आगमन से अपरिचित ही रहे।
मुकुन्द दत्त भी चटगाँव निवासी एक परम भागवत वैष्णव विद्यार्थी थे। इनका कण्ठ बड़ा ही सुमधुर था। अद्वैताचार्य के समीप ये अध्ययन करते थे और उनकी सत्संग-सभा में अपने मनोहर गायन से भक्तों को आनन्दित किया करते थे। जब से प्रभु का प्रकाश हुआ है, तब से वे इन्हीं की शरण में आ गये हैं और प्रभु के साथ मिलकर श्रीकृष्ण-कथा और संकीर्तन में ही सदा संलग्न रहते हैं। विद्यानिधि इनके गाँव के ही थे। दोनों ही समवयस्क तथा परस्पर में एक-दूसरे से भलीभाँति परिचित थे। मुकुन्ददत्त और वासुदेव पण्डित ही विद्यानिधि के भक्तिभाव को जानते थे। प्रभु के परम अन्तरंग भक्त गदाधर से मुकुन्द बड़ा ही स्नेह करते थे। इसलिये एक दिन एकान्त में उनसे बोले- ‘गदाधर! आजकल नवद्वीप में एक परम भागवत वैष्णव ठहरे हुए हैं, चलो, उनके दर्शन कर आवें।’
प्रसन्नता प्रकट करते हुए गदाधर ने कहा- ‘वाह! इससे बढ़कर और अच्छी बात क्या हो सकती है? भगवद्भक्तों के दर्शन तो भगवान के समान ही हैं। अवश्य चलिये, जिनकी आप प्रशंसा करते हैं, वे कोई महान ही भागवत वैष्णव होंगे!’ यह कहकर दोनों मित्र विद्यानिधि के समीप चल दिये। विद्यानिधि नवद्वीप के एक सुन्दर भवन में ठहरे हुए थे। उनका रहने का स्थान खूब साफ था। उसमें एक बहुत ही बढि़या शय्या पड़ी हुई थी, उसके चारों पाये व्याघ्र-मुख की भाँति कई मूल्यवान धातुओं के बने हुए थे, उसके ऊपर बड़ा ही सुकोमल बिस्तर बिछा था। पुण्डरीक महाशय स्नान-ध्यान से निवृत्त होकर उस शय्या पर आधे लेटे हुए थे। उनके विस्तृत ललाट पर सुन्दर सुगन्धित चन्दन लगा हुआ था, बीच में एक बड़ी ही बढ़िया लाल बिंदी लगी हुई थी। सिर के घुँघराले बाल बढ़िया-बढ़िया सुगन्धित तैल डालकर विचित्र ही भाँति से सजाये हुए थे, कई प्रकार के मसालेदार पान को वे धीरे-धीरे चबा रहे थे, पान की लाली से उनके कोमल पल्लवों के समान दोनों अरुण अधर और भी अधिक लाल हो गये थे। सामने दो पीकदान रखे थे। और भी बहुत-से बहुमूल्य सुन्दर बर्तन इधर-उधर रखे थे। दो नौकर मयूरपिच्छ के कोमल पंखों से उनको हवा कर रहे थे। देखने में बिलकुल राजकुमार-से ही मालूम पड़ते थे। गदाधर को साथ लिये हुए मुकुन्ददत्त उनके समीप पहुँचे और दोनों ही प्रणाम करके उनके बताये हुए सुन्दर आसन पर बैठ गये।मुकुन्ददत्त के आगमन से प्रसन्नता प्रकट करते हुए पुण्डरीक महाशय कहने लगे- ‘आज तो बड़ा ही शुभ दिन है, जो आपके दर्शन हुए। आप नवद्वीप में ही हैं, इसका मुझे पता तो था, किंतु आपसे अभी तक भेंट नहीं कर सका। आपसे भेंट करने की बात सोच ही रहा था, सो आपने स्वयं ही दर्शन दिये। आपके जो ये साथी हैं, इनका परिचय दीजिये।’ मुकुन्ददत्त ने शिष्टाचार प्रदर्शित करते हुए गदाधर का परिचय दिया- ‘ये परम भागवत वैष्णव हैं। बाल्यकाल से ही संसारी विषयों से एकदम विरक्त हैं, आप मिश्रवंशावतंस पं. माधवजी के सुपुत्र हैं और महाप्रभु के परम कृपापात्र भक्तों में से प्रधान अन्तरंग भक्त हैं।’
गदाधरजी की प्रशंसा सुनकर पुण्डरीक महाशय ने परम प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- ‘आपके कारण इनके भी दर्शन हो गये।’ इतना कहकर विद्यानिधि महाशय मुसकराने लगे। गदाधर तो जन्म से ही विरक्त थे। वे पुण्डरीक महाशय के रहन-सहन और ठाट-बाट को देखकर विस्मित-से हो गये। उन्हें संदेह होने लगा कि ऐसा विषयी मनुष्य किस प्रकार भगवद्भक्त हो सकता है? जो सदा विषय-सेवन में ही निमग्न रहता है, वह भगवद्भक्ति कर ही कैसे सकता है?
मुकुन्ददत्त श्रीगदाधर के मनोभाव को ताड़ गये, इसीलिये उन्होंने पुण्डरीक महाशय के भीतरी भावों को प्रकट कराने के निमित्त श्रीमद्भागवत के दो बड़े ही मार्मिक श्लोकों का अपने सुकोमल कण्ठ से स्वर और लय के साथ धीरे-धीरे गायन किया। उनमें परमकृपालु श्रीकृष्ण की अहैतु की कृपा का बड़ा ही मार्मिक वर्णन है। वे श्लोक सम्पूर्ण भागवत के दो परम उज्ज्वल रत्न समझे जाते हैं। वे श्लोक ये थे-
अहो बकी यं स्तनकालकूटं
जिघांसयापाययदप्यसाध्वी।
लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं
कं वा दयालुं शरणं व्रजेम।।
पूतना लोकबालघ्नी राक्षसी रूधिराशना।'
जिघांसयापि हरये स्तनं दत्त्वाऽऽप सद्गतिम्।।
मुकुन्ददत्त के मुख से इन श्लोकों को सुनते ही विद्यानिधि महाशय मूर्च्छित होकर शय्या से नीचे गिर पड़े। एक क्षण पहले जो खूब सजे-बजे बैठे हँस रहे थे, दूसरे ही क्षण श्लोक सुनने से उनकी विचित्र हालत हो गयी। उनके शरीर में स्वेद, कम्प, अश्रु, विकृति आदि सभी सात्त्विक विकास एक साथ उदय हो उठे। वे जोरों के साथ रुदन करने लगे। उनके दोनों नेत्रों में से निरन्तर दो जल-धारा-सी बह रही थी। घुँघराले कढ़े हुए केश इधर-उधर बिखर गये। सम्पूर्ण शरीर धूलि-धूसरित-सा हो गया। दोनों हाथों से वे अपने रेशमी वस्त्रों को चीरते हुए जोर-जोर से मुकुन्द से कहने लगे- ‘भैया! फिर पढ़ो, फिर पढ़ो। इस अपने सुमधुर गायन से मेरे कर्णरन्ध्रों में फिर से अमृत-सिंचन कर दो।’
मुकुंद फिर उसी लय से स्वर के साथ श्लोक-पाठ करने लगे। वे ज्यों-ज्यों श्लोक-पाठ करते, त्यों-ही-त्यों पुण्डरीक महाशय की बेकली और बढ़ती जाती थी। वे पुनः-पुनः श्लोक पढ़ने के लिये आग्रह करने लगे, किंतु उनके साथियों ने उन्हें श्लोक-पाठ करने से रोक दिया। पुण्डरीक विद्यानिधि बेहोश पड़े हुए अश्रु बहा रहे थे।इनकी ऐसी दशा देखकर गदाधर के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा।
क्रमशः
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