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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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क्षणभर पहले जिन्हें वे संसारी विषयी समझ रहे थे, उन्हें अब इस प्रकार प्रेम में पागलों की भाँति प्रलाप करते देखकर वे भौंचक्के-से रह गये। उनके त्याग, वैराग्य और उपरति के भाव न जाने कहाँ विलीन हो गये, अपने को बार-बार धिक्कार देने लगे कि ऐसे परम वैष्णव के प्रति मैंने ऐसे कलुषित विचार रखकर घोर पाप किया है। वे मन-ही-मन अपने पाप का प्रायश्चित सोचने लगे। अन्त में उन्होंने निश्चय किया कि वैसे तो हमारा यह अपराध अक्षम्य है। भगवदपराध तो क्षम्य हो भी सकता है, किंतु वैष्णवापराध तो सर्वदा अक्षम्य है। इसके प्रायश्चित्त का एक ही उपाय है। हम इनसे मन्त्र-दीक्षा ले लें, इनके शिष्य बन जायँ, तो गुरु-भाव से ये स्वयं ही क्षमा कर देंगे। ऐसा निश्चय करके इन्होंने अपना भाव मुकुन्ददत्त के सम्मुख प्रकट किया। इनके ऐसे विशुद्ध भाव को समझकर मुकुन्ददत्त को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने इनके विमलभाव की सराहना की।
बहुत देर के अनन्तर पुण्डरीक महाशय प्रकृतिस्थ हुए। सेवकों ने उनके शरीर को झाड़-पोंछकर ठीक किया। शीतल जल से हाथ-मुँह धोकर वे चुपचाप बैठ गये। तब विनीत भाव से मुकुन्द ने कहा- ‘महाशय! ये गदाधर पण्डित कुलीन ब्राह्मण हैं, सत्पात्र हैं, परम भागवत वैष्णव हैं। इनकी हार्दिक इच्छा है कि ये आपके द्वारा मन्त्र ग्रहण करें। इनके लिये क्या आज्ञा होती है?’ कुछ संकोच और नम्रता के साथ विद्यानिधि महाशय ने कहा- ‘ये तो स्वयं ही वैष्णव हैं, हममें इतनी योग्यता कहाँ है, जो इन्हें मन्त्र-दीक्षा दे सकें? ये तो स्वयं ही हमारे पूज्य हैं।’
मुकुन्ददत्त ने अत्यन्त ही दीनता के साथ कहा- ‘इनकी ऐसी ही इच्छा है। यदि आप इनकी इस प्रार्थना को स्वीकार न करेंगे तो इन्हें बड़ा भारी हार्दिक दुःख होगा। आप तो कृपालु हैं, दूसरे को दुःखी देखना ही नहीं चाहते। अतः इनकी यह प्रार्थना अवश्य स्वीकार कीजिये।’
मुकुन्ददत्त के अत्यधिक आग्रह करने पर इन्होंने मन्त्र-दीक्षा देना स्वीकार कर लिया और दीक्षा के लिये उसी दिन एक शुभ-मुहूर्त भी बता दिया। इस बात से दोनों मित्रों को बड़ी प्रसन्नता हुई और वे बहुत रात्रि बीतने पर प्रेम में निमग्न हुए अपने-अपने स्थानों के लिये लौट आये।इसके दूसरे-तीसरे दिन गुप्तभाव से पुण्डरीक महाशय अकेले ही एकान्त में प्रभु के दर्शनों के लिये गये। प्रभु को देखते ही ये उनके चरणों में लिपटकर फूट-फूटकर रुदन करने लगे। विद्यानिधि को अपने चरणों में पड़े हुए देखकर प्रभु मारे प्रेम के बेसुध-से हो गये। उन्होंने पुण्डरीक विद्यानिधि का जोरों के साथ आलिंगन किया। पुण्डरीक के मिलने से उनके आनन्द का पारावार नहीं रहा। उस समय उनकी आँखों से अविरल अश्रु प्रवाहित हो रहे थे। सम्पूर्ण शरीर पुलकित हो रहा था। वे पुण्डरीक की गोदी में अपना सिर रखकर रुदन कर रहे थे। इस प्रकार दो प्रहर तक विद्यानिधि के वक्षःस्थल पर सिर रखे निरन्तर रुदन करते रहे। पुण्डरीक महाशय के सभी वस्त्र प्रभु के अश्रुओं से भीग गये। पुण्डरीक भी प्रेम में बेसुध हुए चुपचाप प्रभु के मुखकमल की ओर एकटक दृष्टि से देख रहे थे। उन्हें समय का कुछ ज्ञान ही नहीं रहा कि कितना समय बीत गया है। दोपहर के अनन्तर प्रभु को ही कुछ-कुछ होश हुआ। उन्होंने उसी समय भक्तों को बुलाया और सभी से पुण्डरीक महाशय का परिचय कराया। पुण्डरीक महाशय का परिचय पाकर सभी भक्त परम संतुष्ट हुए और अपने भाग्य की सराहना करने लगे। विद्यानिधि ने अद्वैत आदि सभी भक्तों की पदधूलि लेकर अपने मस्तक पर चढ़ायी और सभी को श्रद्धा-भक्ति के साथ प्रणाम किया। इसके अनन्तर पुण्डरीक को बीच में करके सभी भक्त चारों ओर से संकीर्तन करने लगे। श्रीकृष्ण-संकीर्तन को सुनकर पुण्डरीक महाशय फिर बेहोश हो गये। भक्तों ने संकीर्तन बन्द कर दिया और भाँति-भाँति के उपचारों द्वारा पुण्डरीक को होश में किया। कुछ सावधान होने पर प्रभु की आज्ञा लेकर पुण्डरीक अपने स्थान के लिये चले गये।

शाम को आकर गदाधर ने पुण्डरीक के समीप से मन्त्र-दीक्षा लेने की अपनी इच्छा प्रभु के सम्मुख प्रकट की। इस बात को सुनकर प्रभु अत्यन्त ही प्रसन्न हुए और गदाधर से कहने लगे- ‘गदाधर! ऐसा सुयोग तुम्हें फिर कभी नहीं मिलेगा। पुण्डरीक-जैसे भगवद्भक्त का मिलना अत्यन्त ही दुर्लभ है। तुम इस काम में अब अधिक देरी मत करो। यह शुभ काम जितना ही शीघ्र हो जाय उतना ही ठीक है।’

प्रभु की आज्ञा पाकर नियत शुभ तिथि के दिन गदाधरजी ने विद्यानिधि से मन्त्र-दीक्षा ले ली। जिनके लिये महाप्रभु गौरांग स्वयं रुदन करते हों, जिनकी प्रशंसा करते-करते प्रभु अधीर हो जाते हों, गदाधर-जैसे परम त्यागी और महान भक्त जिनके शिष्य बनने में अपना सौभाग्य समझते हों ऐसे भक्ताग्रगण्य श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि की विशद विरुदावली का बखान कौन कर सकता है? सचमुच विद्यानिधि की भक्ति परम शुद्ध और सात्त्विक कही जा सकती है, जिसमें देखावटी या बनावटीपन का लेश भी नहीं था। ऐसे प्रच्छन्न भक्तों की पदधूलि से पापी-से-पापी पुरुष भी परम पावन बन सकता है।

निमाई और निताई की प्रेम-लीला....

आनन्द का मुख्य कारण है आत्मसमर्पण। जब तक मनुष्य किसी के प्रति सर्वतोभावेन आत्मसमर्पण नहीं कर देता, तब तक उसे पूर्ण प्रेम की प्राप्ति हो ही नहीं सकती। प्रभु विश्वम्भर तो चराचर में व्याप्त हैं। अपूर्णभाव से नहीं, सभी स्थानों में वे अपनी पूर्ण शक्तिसहित ही स्थित हैं, जहाँ तुम्हारा चित्त चाहे, जिस रूप में मन रमे, उसी के प्रति आत्मसमर्पण कर दो। अपनेपन को एकदम मिटा दो। अपनी इच्छा, अपनी भावना और अपनी सभी चेष्टाएँ प्यारे के ही निमित्त हों। सब तरह से किसी के होकर रहो, तभी प्रेम का यथार्थ मर्म सीख सकोगे। किसी कवि ने क्या ही बढ़िया बात कही है-

न हम कुछ हँसके सीखे हैं, न हम कुछ रोके सीखे हैं।
जो कुछ थोड़ा-सा सीखे हैं, किसी के होके सीखे हैं।।

अहा, किसी के होकर रहने में कितना मजा है, अपनी सभी बातों का भार किसी के ऊपर छोड़ देने में कैसा निश्चिन्तताजन्य सुख है, उसे अपने को ही कर्ता मानने वाला पुरुष कैसे अनुभव कर सकता है?
क्रमशः

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