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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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वह सुबह से आती, दोपहर तक बैठती, हरिदास जी लय से गायन करते रहते-
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।
बेचारी बैठे-बैठे स्वयं भी इसी मन्त्र को कहती रहती। शाम को आती तो आधी रात्रि तक बैठी रहती। हरिदास जी का जप अखण्डरूप से चलता रहता-
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।
चार दिन निरन्तर हरिनामस्मरण से उसके सभी पापों का क्षय हो गया। पापों के क्षय हो जाने से उसकी बुद्धि एकदम बदल गयी, अब तो उसका हृदय उसे बार-बार धिक्कार देने लगा। ऐसे महापुरुष के निकट मैं किस बुरे भाव से आयी थी, इसका स्मरण करके वह मन-ही-मन अत्यन्त ही दुःखी होने लगी। अन्त में उससे नहीं रहा गया। वह अत्यन्त ही दीन भाव से हरिदास जी के चरणों में गिर पड़ी और आँखों से आँसू बहाते हुए गद्गदकण्ठ से कहने लगी- ‘महाभाग! सचमुच ही आप पतितपावन हैं। आप जीवों पर अहैतु की कृपा ही करते हैं। आप परम दयालु हैं, अपनी कृपा के लिये आप पात्र-अपात्र का विचार न करके प्राणिमात्र के प्रति समान भाव से दया करते हैं। मुझ-जैसी पतिता, लोकनिन्दिता और खोटी बुद्धिवाली अधम नारी के ऊपर भी आपने अपनी असीम अनुकम्पा प्रदर्शित की। भगवन! मैं खोटी बुद्धि से आपके पास आयी थी, किंतु आपके सत्संग के प्रभाव से मेरे वे भाव एकदम बदल गये।
श्री हरि के सुमधुर नामों के श्रवणमात्र से ही मेरे कलुषित विचार भस्मीभूत हो गये। अब मैं आपके चरणों की शरण हूँ, मुझ पतिता अबला का उद्धार कीजिये। मेरे घोर पापों का प्रायश्चित बताइये, क्या मेरी भी निष्कृति का कोई उपाय हो सकता है, इतना कहते-कहते वह हरिदास के चरणों में लोटने लगी। हरिदास जी ने उसे आश्वासन देते हुए कहा- ‘देवि! उठो, घबड़ाने की कोई बात नहीं। श्रीहरि बड़े दयालु हैं, वे नीच, पामर, पतित- सभी प्रकार के प्राणियों का उद्धार करते हैं। उनके दरबार में भेद-भाव नहीं। भगवन्नाम के सम्मुख भारी-से-भारी पाप नहीं रह सकते। भगवन्नाम में पापों को क्षय करने की इतनी भारी शक्ति है कि चाहे कोई कितना भी घोर पापी-से-पापी क्यों न हो, उतने पाप वह कर ही नहीं सकता, जितने पापों को मेटने की हरिनाम में भक्ति है। तुमने पापकर्म से जो पैसा पैदा किया है, उसे अभ्यागतों को बाँट दो और निरन्तर हरिनाम का कीर्तन करो। इसी से तुम्हारे सब पाप दूर हो जायँगे और श्रीभगवान के चरणों में तुम्हारी प्रगाढ़ प्रीति हो जायगी। बस-
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।
इस महामन्त्र में ही सब सामर्थ्य विराजमान है। इसी का निरन्तर जप करती रहो। अब इस कुटिया में हम नहीं रहेंगे, तुम्ही इसमें रहो।’ उस वेश्या को ऐसा उपदेश करके महाभागवत हरिदास जी सीधे शान्तिपुर चले गये और वहाँ जाकर अद्वैताचार्य जी के समीप अध्ययन और श्रीकृष्ण का संकीर्तन में सदा संलग्न रहने लगे।
इस वारवनिता ने भी हरिदास जी के आदेशानुसार अपना सर्वस्व दान करके अकिंचनों का-सा वेश धारण कर लिया। वह फटे-पुराने चिथड़ों को शरीर पर लपेटकर और भिक्षान्न से उदरनिर्वाह करके अपने गुरुदेव के चरणचिह्नों का अनुसरण करने लगी। थोड़े ही समय में उसकी भक्ति की ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी। बहुत-से लोग उसके दर्शन के लिये आने लगे। वह हरिदासी के नाम से सर्वत्र प्रसिद्ध हो गयी। लोग उसका बहुत अधिक आदर करने लगे। महापुरुषों ने सत्य ही कहा है कि महात्माओं का खोटी बुद्धि से किया हुआ सत्संग भी व्यर्थ नहीं जाता। सत्संग की महिमा ही ऐसी है।
इधर रामचन्द्र खाँ ने अपने कुकृत्य का फल यहीं पर प्रत्यक्ष पा लिया। नियत समय पर बादशाह को पूरा लगान न देने के अपराध में उसे भारी दण्ड दिया गया। बादशाह के आदमियों ने उसके घर में आकर अखाद्य पदार्थों को खाया और उसे स्त्री-बच्चे सहित बाँधकर वे राजा के पास ले गये, उसे और भी भाँति-भाँति की यातनाएँ सहनी पड़ीं। सच है, जो जैसा करता है उसे उसका फल अवश्य ही मिलता है।
हरिदास की नाम-निष्ठा....
जप, तप, भजन, पूजन तथा लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार के कार्यों में विश्वास ही प्रधान है। जिसे जिस पर जैसा विश्वास जम गया उसे उसके द्वारा वैसा ही फल प्राप्त हो सकेगा। फल का प्रधान हेतु विश्वास ही है। विश्वास के सम्मुख कोई बात असम्भव नहीं। असम्भव तो अविश्वास का पर्यायवायी शब्द है। विश्वास के सामने सभी कुछ सम्भव है। विश्वास के ही सहारे चरणामृत मानकर मीरा विष-पान कर गयी, नामदेव ने पत्थर की मूर्ति को भोजन कराया। धन्ना भगत के बिना बोया ही खेत उपज आया और रैदास जी ने भगवान की मूर्ति को सजीव करके दिखला दिया। ये सब भक्तों के दृढ़ विश्वास के ही चमत्कार हैं। जिनकी भगवन्नाम पर दृढ़ निष्ठा है, उन्हें भारी-से-भारी विपत्ति भी साधारण-सी घटना ही मालूम पड़ने लगती है। वे भयंकर-से-भयंकर विपत्ति में भी अपने विश्वास से विचलित नहीं होते। ध्रुव तथा प्रह्लाद के लोकप्रसिद्ध चरित्र इसके प्रमाण है, ये चरित्र तो बहुत प्राचीन हैं, कुछ लोग इनमें अर्थवाद का भी आरोप करते हैं, किंतु महात्मा हरिदास जी की नाम-निष्ठा का ज्वलन्त प्रमाण तो अभी कल-ही-परसों का है। जिन लोगों ने प्रत्यक्ष में उनका संसर्ग और सहवास किया था तथा जिन्होंने अपनी आँखों से उनकी भयंकर यातनाओं का दृश्य देखा था, उन्होंने स्वयं इनका चरित्र लिखा है। ऐसी भयंकर यातनाओें को क्या कोई साधारण मनुष्य सह सकता है? बिना भगवन्नाम में दृढ़ निष्ठा हुए क्या कोई इस प्रकार अपने निश्चय पर अटल भाव से अड़ा रह सकता है? कभी नहीं, जब तक हृदय में दृढ़ विश्वासजन्य भारी बल न हो, तब तक ऐसी दृढ़ता सम्भव ही नहीं हो सकती।
बेनापोल की निर्जन कुटिया में वारवनिता का उद्धार करके और उसे अपनी कुटिया में रखकर आत्मा हरिदास शान्तिपुर में आकर अद्वैताचार्य जी के सत्संग में रहने लगे। शान्तिपुर के समीप ही फुलिया नाम के ग्राम में एकान्त समझकर वहीं इन्होंने अपनी एक छोटी-सी कुटिया बना ली और उसी में भगवन्नाम का अहर्निश कीर्तन करते हुए निवास करने लगे।
क्रमशः
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