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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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उस समय सम्पूर्ण देश में मुसलमानों का प्राबल्य था। विशेषकर बंगाल में तो मुसलमानी सत्ता का और मुसलमानी धर्म का अत्यधिक जोर था। इस्लाम धर्म के विरुद्ध कोई चूँ तक नहीं कर सकता था। स्थान-स्थान पर इस्लाम धर्म के प्रचार के निमित्त क़ाज़ी नियुक्त थे, वे जिसे भी इस्लामधर्म के प्रचार में विघ्न समझते, उसे ही बादशाह से भारी दण्ड दिलाते, जिससे फिर किसी दूसरे को इस्लामधर्म के प्रचार में रोड़ा अटकाने का साहस न हो।एक प्रकार से उस समय के कर्ता-धर्ता तथा विधाता धर्म के ठेकेदार क़ाज़ी ही थे। शासन-सत्ता पर पूरा प्रभाव होने के कारण क़ाज़ी उस समय के बादशाह ही समझे जाते थे। फुलिया के आसपास में गोराई नाम का एक क़ाज़ी भी इसी काम के लिये नियुक्त था। उसने जब हरिदास जी का इतना प्रभाव देखा तब तो उसकी ईर्ष्या का ठिकाना नहीं रहा। वह सोचने लगा- ‘हरिदास के इतने बढ़ते प्रभाव को यदि रोका न जायगा तो इस्लाम धर्म को बड़ा भारी धक्का पहुँचेगा। हरिदास जाति का मुसलमान है। मुसलमान होकर वह हिन्दुओं के धर्म का प्रचार करता है। सरह की रूप से वह कुफ्र करता है। वह काफिर है, इसलिये काफिर को कत्ल करने से भी सबाब होता है। दूसरे लोग भी इसकी देखा-देखी ऐसा ही काम करेंगे। इसलिये इसे दरबार से सजा दिलानी चाहिये। यह सोचकर गोराई क़ाज़ी ने इनके विरुद्ध राजदरबार में अभियोग चलाया। राजाज्ञा से हरिदास जी गिरफ्तार कर लिये गये और मुलुकपति के यहाँ इनका मुकद्दमा पेश हुआ। मुलुकपति इनके तेज और प्रभाव को देखकर चकित रह गया। उसने इन्हें बैठने के लिये आसन दिया। हरिदासजी के बैठ जाने पर मुलुकपति ने दया का भाव दर्शाते हुए अपने स्वाभाविक धार्मिक विश्वास के अनुसार कहा- ‘भाई! तुम्हारा जन्म मुसलमान के घर हुआ है। यह भगवान की तुम्हारे ऊपर अत्यन्त ही कृपा है। मुसलमान के यहाँ जन्म लेकर भी तुम काफिरों के-से आचरण क्यों करते हो? इससे तुमको मुक्ति नहीं मिलेगी। मुक्ति का तो साधन वही है जो इस्लामधर्म की पुस्तक कुरान में बताया गया है। हमें तुम्हारे ऊपर बड़ी दया आ रही है, हम तुम्हें दण्ड देना नहीं चाहते। तुम अब भी तोबा (अपने पाप का प्रायश्चित्त) कर लो और कलमा पढ़कर मुहम्मद साहब की शरण में आ जाओ! भगवान तुम्हारे सभी अपराधों को क्षमा कर देंगे और तुम भी मोक्ष के अधिकारी बन जाओगे।’
मुलुकपति की ऐसी सरल और सुन्दर बातें सुनकर हरिदास जी ने कहा- ‘महाशय! आपने जो भी कुछ कहा है, अपने विश्वास के अनुसार ठीक ही कहा है, हरेक मनुष्य का विश्वास अलग-अलग तरह का होता है। जिसे जिस तरह का दृढ़ विश्वास होता है, उसके लिये उसी प्रकार का विश्वास फलदायी होता है। दूसरों के धमकाने से अथवा लोभ से जो अपने स्वाभाविक विश्वास को छोड़ देते हैं, वे भीरू होते हैं। ऐसे पुरुषों को परमात्मा की प्राप्ति कभी भी नहीं होती। आप अपने विश्वास के अनुसार उचित ही कह रहे हैं, किंतु मैं दण्ड के भय से यदि भगवन्नाम-कीर्तन को छोड़ दूँ, तो इससे मुझे पुण्य के स्थान में पाप ही होगा। ऐसा करने से मैं नरक का भागी बनूँगा। मेरी भगवन्नाम में स्वाभाविक ही निष्ठा है, इसे मैं छोड़ नहीं सकता। फिर चाहे इसके पीछे मेरे प्राण ही क्यों न ले लिये जायँ।
इनकी ऐसी युक्तियुक्त बातें सुनकर मुलुकपति का हृदय भी पसीज उठा। इनकी सरल और मीठी वाणी में आकर्षण था। उसी से आकर्षित होकर मुलुकपति ने कहा- ‘तुम्हारी बातें तो मेरी भी समझ में कुछ-कुछ आती हैं, किंतु ये बातें तो हिन्दुओं के लिये ठीक हो सकती हैं। तुम तो मुसलमान हो, तुम्हें मुसलमानों की ही तरह विश्वास रखना चाहिये।’
हरिदास जी ने कहा- ‘महाशय! आपका यह कहना ठीक है, किंतु विश्वास तो अपने अधीन की बात नहीं है। जैसे पूर्व के संस्कार होंगे, वैसा ही विश्वास होगा। मेरा भगवन्नाम पर ही विश्वास है। कोई हिन्दू जब अपना विश्वास छोड़कर मुसलमान हो जाता है, तब आप उसे दण्ड क्यों नहीं देते? क्यों नहीं उसे हिन्दू ही बना रहने को मजबूर करते? जब हिन्दुओं को अपना धर्म छोड़कर मुसलमान होने में आप स्वतन्त्र मानते हैं तब यह स्वतन्त्रता मुसलमानों को भी मिलनी चाहिये। फिर आप मुझे कलमा पढ़ने को क्यों मजबूर करते हैं?’ इनकी इस बात से समझदार न्यायाधीश चुप हो गया। जब गोराई क़ाज़ी ने देखा कि यहाँ तो मामला ही बिलकुल उलटा हुआ जाता है तब उसने जोरों के साथ कहा- ‘हम ये सब बातें नहीं सुनना चाहते। इस्लाम-धर्म में लिखा है, जो इस्लामधर्म के अनुसार आचरण करता है उसे ही मोक्ष की प्राप्ति होती है, उसके विरुद्ध करने वाले काफिरों को नहीं। तुम कुफ्र (अधर्म) करते हो। अधर्म करने वालों को दण्ड देना हमारा काम है। इसलिये तुम कलमा पढ़ना स्वीकार करते हो या दण्ड भोगना? दोनों में से एक को पसंद कर लो।’
बेचारा मुलुकपति भी मजबूर था। इस्लामधर्म के विरुद्ध वह भी कुछ नहीं कह सकता था। काजियों के विरुद्ध न्याय करने की उसकी हिम्मत नहीं थी। उसने भी गोराई क़ाज़ी की बात का समर्थन करते हुए कहा- ‘हाँ, ठीक है, बताओ तुम कलमा पढ़ने को राजी हो?
हरिदास जी ने निर्भीक भाव से कहा- ‘महाशय! मुझे जो कहना था सो एक बार कह चुका। भारी-से-भारी दण्ड भी मुझे मेरे विश्वास से विचलित नहीं कर सकता। चाहे आप मेरी देह के टुकड़े-टुकड़े करके फेंकवा दें तो भी जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, तब तक मैं हरिनाम को नहीं छोड़ सकता। आप जैसा चाहें, वैसा दण्ड मुझे दें।
हरिदास जी के ऐसे निर्भीक उत्तर को सुनकर मुलुकपति किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया। वह कुछ सोच ही न सका कि हरिदास को क्या दण्ड दें? वह जिज्ञासा के भाव से गोराई क़ाज़ी के मुख की ओर देखने लगा।
मुलुकपति के भाव को समझकर गोराई क़ाज़ी ने कहा- ‘हुजूर! जरूर दण्ड देना चाहिये। यदि इसे दण्ड न दिया गया तो सभी मनमानी करने लगेंगे, फिर तो इस्लामधर्म का अस्तित्व ही न रहेगा।’
मुलुकपति ने कहा- ‘मुझे तो कुछ सूझता नहीं, तुम्हीं बताओ इसे क्या दण्ड दिया जाय?
गोराई क़ाज़ी ने जोर देते हुए कहा- ‘हुजूर! यह पहला ही मामला है। इसे ऐसा दण्ड देना चाहि ये कि सबके कान खड़े हो जायँ।
क्रमशः
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