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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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आपको सब सामर्थ्य है। आप सब कुछ कर सकते हैं।’
प्रभु ने उनकी ऐसी दशा देखकर अधीरता के साथ कहा- ‘गदाधर! कृपालु श्रीकृष्ण ने तुम्हारे ऊपर कृपा कर दी, अब तुम उनसे मेरे लिये भी प्रार्थना करना।’
गदाधर ने अत्यन्त ही दीनता के साथ कहा- ‘प्रभो! मैं तो आपको ही इसका कारण समझता हूँ। इस प्रेम को आपकी ही दया का फल समझता हूँ, आपसे भी भिन्न कोई दूसरे कृष्ण हैं, इसका मुझे पता नहीं। यह कहते-कहते गदाधर प्रेम में विह्वल होकर रुदन करने लगे।
शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी ने भी गदाधर की ऐसी दशा देखी। उनके अन्तःकरण में भी प्रेम-प्राप्ति की उत्कट इच्छा उत्पन्न हो गयी। वे भी गदाधर की भाँति अपने-आपको भूलकर प्रेम में उन्मत्त होना चाहते थे। उनका हृदय भी प्रेमासव को पान करने के लिये अधीर हो उठा। दूसरे दिन वे भिक्षा करके आ रहे थे। रास्ते में गंगा जाते हुए प्रभु उन्हें मिल गये। प्रभु को देखते ही वे वयोवृद्ध ब्रह्मचारी उनके पैरों में लिपट गये। प्रभु ने संकोच प्रकट करते हुए कहा- ‘मैं आपके पुत्र के समान हूँ। आपने बाल्यकाल से ही पिता की भाँति मेरा लालन-पालन किया है और गोद में लेकर प्रेमपूर्वक खिलाया है। आप यह क्या अनर्थ कर रहे हैं, क्यों मेरे ऊपर पाप चढ़ा रहे हैं?’
प्रभु की इन बातों को सुनकर कातर भाव से ब्रह्मचारी जी ने कहा- ‘प्रभो! अब हमारी बहुत छलना न कीजिये। इस व्यर्थ के जीवन को बिताते-बिताते वृद्धावस्था समीप आ चुकी। इस शरीर को भाँति-भाँति के कष्ट पहुँचाकर काशी, कांची, अवन्तिका आदि सभी पवित्र पुरियों और पुण्य-तीर्थों की पैदल ही यात्रा की। घर-घर से मुट्ठी-मुट्ठी अन्न माँगकर हमने अपनी जीविका चलायी। अब तो हमें श्रीकृष्ण-प्रेम का अधिकारी बना देना चाहिये। अब हमें किसी भी प्रकार प्रभु-प्रेम प्राप्त हो, यही पूज्य पाद-पद्मों में विनीत प्रार्थना है।’
ब्रह्मचारी जी की बातें सुनकर प्रभु कुछ भी नहीं बोले। वे ब्रह्मचारी जी की ओर देखकर मन्द-मन्द भाव से खड़े मुसकरा रहे थे। ब्रह्मचारी जी प्रभु की मुसकराहट का अर्थ समझ गये। वे अधीर होकर अपने-आप ही कह उठे- ‘प्रभो! हम तीर्थ यात्राओं का कथन करके अपना अधिकार नहीं जता रहे हैं। हम तो दीनभाव से एकमात्र आपकी शरण होकर प्रेम की याचना कर रहे हैं। हमें श्रीकृष्ण-प्रेम प्रदान कीजिये।
भावावेश में प्रभु के मुख से स्वतः ही निकल पड़ा- ‘जाओ दिया, दिया।’
बस, इतना सुनना था कि ब्रह्मचारी सब कुछ भूलकर प्रेमावेश में भरकर पागलों की भाँति नृत्य करने लगे। वे नृत्य करते-करते उन्मत्त की भाँति मुख से कुछ प्रलाप-सा भी करते जाते थे। प्रभु उनकी ऐसी विचित्र दशा देखकर प्रेम में गद्गद हो गये और उनकी झोली में से धानमिश्रित भिक्षा के सूखे चावलों को निकाल-निकालकर चबाने लगे, मानो सुदामा के प्रति प्रेम प्रकट करते हुए कृष्ण उनके घर की चावलों की कनी को चबा रहे हों। इन दोनों के इस प्रकार प्रेममय व्यवहार को देखकर सभी दर्शक चकित-से हो गये और बार-बार प्रभु के प्रेम की प्रशंसा करने लगे। शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी भी अपने को कृतकृत्य समझकर प्रेम में विभोर हुए अपनी कुटिया में चले गये।
इस प्रकार भक्तों के हृदय में प्रभु के प्रति अधिकाधिक सम्मान के भाव बढ़ने लगे। प्रभु भी भक्तों पर पहले से अत्यधिक प्रेम प्रदर्शित करने लगे।
श्रीवास पण्डित के घर संकीर्तन का आरम्भ माघमास में हुआ था, परंतु दो-ही-तीन महीने में इसकी चर्चा चारों ओर फैल गयी और बहुत-से दर्शनार्थी संकीर्तन देखने की उत्सुकता से रात्रि में श्रीवास पण्डित के घर पर आने लगे। किंतु संकीर्तन के समय घर का फाटक बंद कर दिया जाता था। इसलिये सभी प्रकार के लोग भीतर नहीं जा सकते थे। बहुत-से लोगों को तो निराश होकर ही द्वार पर से लौटना पड़ता था। संकीर्तन में खास-खास भक्त ही भीतर जा सकते थे। उस समय संकीर्तन का यही नियम निर्धारित किया गया था।
धीर-भाव......
नियमों का बन्धन सबको अखरता है। सभी प्राणी नियमों के बन्धनों को परित्याग करके स्वाधीन होना चाहते हैं, इसका कारण यही है कि प्राणिमात्र की उत्पत्ति आनन्द अथवा प्रेम से हुई। प्रेम में किसी प्रकार का नियम नहीं होता। प्राणिमात्र को प्रेम-पीयूष की ही पिपासा है। सभी इसी परमप्रिय पय के अभाव में अधीर होकर छटपटाते-से नजर आते हैं और सभी प्रकार के बन्धनों को छिन्न-भिन्न करके उसके समीप तक पहुँचना चाहते हैं, किंतु बिना नियमों का पालन किये उस तक पहुँचना भी असम्भव है। प्रेम के चारों ओर नियम की परिखा खुदी हुई है। बिना उसे पार किये हुए कोई प्रेम-पीयूष तक पहुँच ही नहीं सकता। यह ठीक है कि प्रेम स्वयं नियमों से अतीत है, उसके समीप कोई नियम नहीं, किंतु साथ ही वह नियम के बिना प्राप्त भी नहीं हो सकता।
एक बार किसी भी प्रकार सही, प्रेम से पृथक हो गये अथवा अपने को उससे पृथक मान ही बैठे तो बिना नियमों की सहायता के उसे फिर से प्राप्त नहीं कर सकते। प्रेम को प्राप्त करने का एकमात्र साधन नियम ही है। जो प्रेम के नाम से नियमों का उल्लंघन करके विषय-लोलुपता के वशीभूत होकर अपनी इन्द्रियों को उनके प्रिय भोगों से तृप्त करते हैं, वे दम्भी हैं। प्रेम के नाम से इन्द्रिय-वासनाओं को तृप्त करना ही उनका चरम लक्ष्य है।
प्रेम तो कल्पतरु है, उसकी उपासना जो मनुष्य जिस भाव से करेगा, उसे उसी वस्तु की प्राप्ति होगी। जो प्रेम के नाम से अच्छे-अच्छे पदार्थों को ही चाहते हैं, उन्हें वे ही मिलते हैं। जो प्रेम का बहाना बनाकर सुन्दर-सुन्दर विषय भोगना चाहते हैं, उन्हें उनके इच्छानुसार विषयों की ही प्राप्ति होती है, किंतु जो प्रेम के नाम से प्रेम को ही चाहते हैं और प्रेम के सिवा यदि त्रिलोकी का राज्य भी उनके सामने आ जाय तो उसे भी वे पीछे ठुकरा देते हैं।
बहुधा लोगों को कहते सुना है ‘स्वर्ग के सुखों की तो बात ही क्या है, हम तो मोक्ष को भी ठुकरा देते हैं।’ ये सब कहने की बातें हैं, सुन्दर मिठाई को देखकर ही जिनके मुख में पानी भर आता है, वे स्वर्ग के दिव्य-दिव्य भोगों को भला कैसे ठुकरा सकेंगे?
क्रमशः
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