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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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श्रीवास पण्डित को ऐसा प्रतीत हुआ कि साक्षात विष्णु भगवान विश्वम्भर के रूप में प्रकट हुए हैं, उनके चार हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित हो रहे हैं, गले में वैजयन्ती माला पड़ी हुई है, एक बड़े भारी मत्त सिंह की भाँति बार-बार हुंकार कर रहे हैं। श्रीवास प्रभु के ऐसे भयंकर रूप को देखकर भयभीत-से हो गये। भगवान के सिंहासन पर बैठे प्रभु घोर गम्भीर स्वर से सिंह की भाँति दहाड़ते हुए कहने लगे- ‘श्रीवास! अभी तक तुमने हमें पहचाना नहीं। नाड़ा (अद्वैताचार्य) तो हमारी परीक्षा करने के ही निमित्त शान्तिपुर चले गये। तुम्हें किसी प्रकार का भय न करना चाहिये। हम एक-एक दुष्ट का विनाश करेंगे। भक्तों को कष्ट पहुँचाने वाला कोई भी दुष्ट हमारे सामने बच न सकेगा। तुम घबड़ाओं नहीं। शान्त-चित्त से हमारी स्तुति करो।’ प्रभु के इस प्रकार आश्वासन देने पर श्रीवास पण्डित कुछ देर बाद प्रेम में विह्वल होकर गद्गद-कण्ठ से स्तुति करने लगे-

नौमीडय तेऽभ्रवपुषे तडिदम्बराय
गुंजावतंसपरिपिच्छलसन्मुखाय।
वन्यस्त्रजे कवलवेत्रविषाणवेणु-
लक्ष्मश्रिये मृदुपदे पशुपांगजाय।।[2]

इस श्लोक को पढ़ने के अनन्तर वे दीनभाव से कहने लगे- ‘विश्वम्भर की जय हो, विश्वरूप अग्रज की जय हो, शचीनन्दन की जय हो, जगन्नाथप्रिय की जय हो, गौरसुन्दर की जय हो, मदनमोहन की जय हो, नृसिंहभयभंजन प्रभु की जय हो!

इतने दिनों से मैं अज्ञानान्धकार में इधर-उधर भटक रहा था। आज गुरुरूप से प्रभु साक्षात आपके दर्शन हुए। आज आपने अपना असली स्वरूप प्रकट करके मुझ पामर प्राणी को परम पावन बना दिया। आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही विष्णु हैं, आप ही शिव हैं। सृष्टि के आदिकारण आप ही हैं। आपकी जय हो।
श्रीवास के इस प्रकार स्तोत्र-पाठ करने पर प्रभु ने उन्हें आज्ञा दी कि ‘तुम अपने सम्पूर्ण परिवार के सहित हमारी पूजा करो और हमसे मनोवांछित वरदान माँगो।’ प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके श्रीवास पण्डित ने अपने घर की सम्पूर्ण स्त्रियों को, बाल-बच्चे तथा दास-दासियों को एकत्रित किया और सभी मिलकर आनन्द तथा उल्लास के साथ प्रभु की पूजा करने के लिये उद्यत हो गये। पिता के समान पूज्य और वृद्ध श्रीवास पण्डित इस बात को बिलकुल भूल ही गये कि ये हमारे मित्र पण्डित जगन्नाथ मिश्र के छोटे पुत्र हैं, जिन्हें हमने गोदी में खिलाया है और जो हमारा सदा पिता के समान सम्मान करते हैं। उस समय उन्हें यह पूर्ण भाव हो गया थाकि साक्षात नृसिंह भगवान ही प्रकट हुए हैं। इसीलिये विष्णु की पूजा के निमित्त जितनी सामग्री एकत्रित की थी, वह सब-की-सब प्रभु की पूजा में लगा दी। श्रीवास के घर की स्त्रियों ने अपने-अपने हाथों से प्रभु के गले में मालाएँ पहनायीं उनके मस्तक के ऊपर पुष्प चढ़ाये और उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु ने भी उनके मस्तकों पर अपना चरण रखकर उन्हें आशीर्वाद दिया- ‘तुम सबकी हममें भक्ति हो।’ इस प्रकार सभी ने मिलकर भक्तिभाव के साथ प्रभु का पूजन किया।

इसके अनन्तर जोरों से हुंकार करते हुए प्रभु ने गम्भीर स्वर में कहा- ‘श्रीवास! तुम्हें चिन्ता नहीं करनी चाहिये। तुम अनन्य भाव से हमारा ही तो स्मरण-कीर्तन करते हो, फिर डर की क्या बात? बादशाह की क्या ताकत है जो हमारे विरुद्ध कुछ कर सकेगा? यदि वैष्णवों को पकड़ने के लिये नाव आवेगी तो सबसे पहले नाव में हम ही चढ़ेंगे और जाकर बादशाह से कहेंगे कि तुमने कीर्तन रोकने की आज्ञा दी है? यदि काजियों के कहने से तुमने ऐसा किया है तो उन्हें यहाँ बुलाओ और वे अपने शास्त्र के विश्वास के अनुसार प्रार्थना करके सभी से ‘अल्लाह’ या ‘खुदा’ कहलवावें। नहीं तो हम सभी हिन्दू, यवन, पशु-पक्षी आदि जीवों से ‘कृष्ण-कृष्ण’ कहलाते हैं।
इस प्रकार सभी जीवों के मुख से श्रीकृष्ण-कीर्तन कराकर हम संकीर्तन का महत्त्व प्रकाशित करेंगे और यवनों से भी कृष्ण कहलायेंगे। यदि इतने पर भी वह न मानेगा तो हम उसका संहार करेंगे। तुम किसी बात की चिन्ता मत करो, निर्भय रहो। हम तुम्हें अभी बताते हैं कि यह सब किस प्रकार हो सकेगा।’ इतना कहकर प्रभु ने श्रीवास पण्डित की भतीजी को अपने पास बुलाया। उसका नाम नारायणी था, उसकी अवस्था लगभग चार वर्ष की होगी।
प्रभु ने उसे अपने पास बुलाकर कहा- ‘बेटी! नारायणी! तुम श्रीकृष्ण-प्रेम में उन्मत्त होकर रुदन तो करो! बस, इतना सुनना था कि वह चार वर्ष की बालिका श्रीकृष्ण-प्रेम में मूर्च्छित होकर गिर पड़ी और जोरों से ‘हा कृष्ण! हा कृष्ण!!’ कहकर रुदन करने लगी। उसके इस प्रकार रुदन को सुनकर सभी स्त्री-पुरुष आश्चर्यसागर मं गोते खाने लगे। सभी की आँखों से आँसू बहने लगे।

हँसते-हँसते प्रभु ने कहा- ‘इसी प्रकार हम सबसे कृष्ण-कीर्तन करायेंगे।’ इस प्रकार श्रीवास को आश्वासन देकर प्रभु मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े और बहुत देर के अनन्तर होश में आये। होश में आने पर आप आश्चर्य के साथ इधर-उधर देखने लगे अैर बोले- ‘पण्डित जी! मैं यहाँ कैसे आ गया? मैंने कोई चपलता तो नहीं कर डाली? आप तो मेरे पिता के समान हैं, मेरे सभी अपराधों को आप सदा से क्षमा करते आये हैं। यदि मुझसे कोई चपलता हो भी गयी हो तो उसे क्षमा कर दीजियेगा। मुझे कुछ भी मालूम नहीं है कि मैं यहाँ कैसे आया और मैंने क्या-क्या कहा?’

प्रभु की इस प्रकार भोली-भाली बातें सुनकर श्रीवास पण्डित ने विनीत भाव से कहा- ‘प्रभु! मुझे चिरकाल तक भ्रम में रखा, अब फिर से मुझे भ्रम में न डालिये, मेरी अब छलना न कीजिये। अब तो मुझे आपका सतस्वरूप मालूम पड़ गया है, आपके चरणों में इसी प्रकार अनुराग बना रहे। ऐसा आशीर्वाद दीजिये।’ श्रीवास के ऐसा कहने पर प्रभु मन-ही-मन प्रसन्न हुए और कुछ लजाते हुए-से अपने घर की ओर चले गये।

श्रीवाराहावेश.....

आवेश’ उसे कहते हैं कि किसी एक अन्य शरीर में किसी भिन्न शरीरी के गुणों का कुछ काल के लिये आवेश हो जाय। प्रायः लोक में स्त्री-पुरुषों के ऊपर भूत, प्रेत, यक्ष, राक्षस तथा देव-दानवों के आवेश आते देखे गये हैं। जो जैसी प्रकृति के पुरुष होते हैं, उनके ऊपर वैसे ही आवेश भी आते हैं। देवताओं का आवेश सात्त्विक प्रकृति के ही लोगों के ऊपर आवेगा।
क्रमशः

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