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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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कभी चित्रकूट का भाव दर्शाते और कभी सीता-हरण का अभिनय करते। एक दिन आप लक्ष्मण-मूर्छा की लीला कर रहे थे। आप स्वयं लक्ष्मण बनकर मेघनाद की शक्ति से बेहोश होकर पड़े थे। एक लड़के को हनुमान बनकर संजीवन लाने के लिये भेजा। वह लड़का छोटा ही था, इन्होंने जैसे बताया उसे भूल गया। ये बहुत देर तक बेहोश बने पड़े रहे। सचमुच लोगों ने देखा कि इनकी नाड़ी बहुत ही धीरे-धीरे चल रही है। बहुत जगाने पर भी ये नहीं उठते हैं। इसकी सूचना इनके पिता को जाकर बालकों ने दी। पिता यह सुनकर दौड़े आये और उन्होंने भी आकर इन्हें जगाया, किंतु तो भी नहीं जगे। तब तो पिता को बड़ा भारी दुःख हुआ। जो बालक इनके पास रामरूप से बैठा रुदन कर रहा था, उसे याद आयी और उसने हनुमान बनने वाले लड़के को बुलाया।जब हनुमान जी संजीवन लेकर आये और इन्हें वह सुँघायी गयी तब इनकी मूर्छा भंग हुई। इस प्रकार ये बाल्यकाल से ही भाँति-भाँति की शास्त्रीय लीलाओं का अभिनय किया करते थे।पढ़ने-लिखने में ये अपने सभी साथियों से सर्वश्रेष्ठ समझे जाते थे। इनकी बुद्धि अत्यन्त ही तीक्ष्ण थी, प्रायः देखा गया है, पिता का ज्येष्ठ पुत्र के प्रति अत्यधिक प्रेम होता है और माता को सबसे छोटी संतान सबसे प्रिय होती है। फिर ये तो रूप और गुणों में भी अद्वितीय ही थे, इसी कारण हाड़ाई ओझा इन्हें प्राणों से भी अधिक प्यार करते थे। वे जहाँ भी कहीं जाते, वहीं इन्हें साथ ले जाते। इनके बिना उन्हें कहीं जाना-आना या अकेले बैठकर खाना-पीना अच्छा ही नहीं लगता था। माता भी इनके मनोहर मुखकमल को देखकर सदा आनन्दसागर में डुबकियाँ लगाती रहती थी। इस प्रकार इनकी अवस्था बारह-तेरह वर्ष की हो गयी।
हाड़ाई पण्डित बड़े साधु-भक्त थे। प्रायः हमेशा ही कोई साधु-संत इनके घर पर बने रहते। ये भी यथाशक्ति जैसा घर में रूखा-सूखा अन्न होता, उसके द्वारा श्रद्धापूर्वक आगत-साधु-संतों का सत्कार किया करते थे। एक दिन एक संन्यासी आकर हाड़ाई पण्डित के यहाँ अतिथि हुए। पण्डित जी ने श्रद्धापूर्वक उनका आतिथ्य किया। पद्मावती देवी ने शुद्धता के साथ अपने हाथों से दाल, चावल, पकौड़ी और कई प्रकार के साग बनाये। पण्डित जी ने भक्ति-भाव से संन्यासी जी को भोजन कराया। इनके भक्तिभाव को देखकर संन्यासी महात्मा बड़े प्रसन्न हुए और दो-चार दिन पण्डित जी के यहाँ ठहर गये। पण्डित जी भी उनकी यथाशक्ति सेवा-शुश्रूषा करते रहे। संन्यासी देखने में बड़े ही रूपवान थे। उनके चेहरे से एक प्रकार की ज्योति हमेशा निकलती रहती थी। उनकी आकृति से गम्भीरता, सच्चरित्रता, पवित्रता, तेजस्विता और भगवद्भक्ति के भाव प्रकट होते थे।

हाड़ाई पण्डित की संन्यासी के प्रति बड़ी श्रद्धा हो गयी। इस अल्पवयस के संन्यासी के प्रभाव से हाड़ाई पण्डित अत्यधिक प्रभावान्वित हो गये। एक दिन एकान्त में संन्यासी जी ने हाड़ाई पण्डित जी से कहा- ‘पण्डित जी! हम आपसे एक भिक्षा माँगते हैं, दोगे?’

दीनता प्रकट करते हुए हाड़ाई पण्डित ने कहा- ‘प्रभो! इस दीन-हीन कंगाल के पास है ही क्या! इधर-उधर से जो कुछ मिल जाता है, उसी से निर्वाह होता है। आप देखते ही हैं, मेरे घर में ऐसी कौन-सी चीज है, जिसे मैं आपको भिक्षा मे दे सकूँ? जो कुछ उपस्थित है उसमें ऐसी कोई भी चीज नहीं है, जो आपके लिये अदेय हो सके। यदि आप शरीर माँगे, तो मैं शरीर तक देने को तैयार हूँ।’

संन्यासी जी ने कुछ गम्भीरता के साथ कहा- ‘पण्डित! तुम्हारे पास सब कुछ है, जो चीज मैं माँगना चाहता हूँ, वह यह पार्थिव धन नहीं है। वह तो बहुत ही मूल्यवान वस्तु है, उसे देने में तुम जरूर आनाकानी करोगे, क्योंकि वह तुम्हें अत्यन्त ही प्रिय है।’ हाड़ाई पण्डित ने कहा- ‘भगवन! मैं ऐसा सुनता आया हूँ कि प्राणिमात्र के लिये अपने प्राण ही सबसे अधिक प्रिय हैं, यदि आप मेरे प्राणों की भी भिक्षा माँगें, तो मैं उन्हें भी देने के लिये तैयार हूँ।’ संन्यासी जी ने कुछ देर ठहरकर कहा- ‘मैं तुम्हारे शरीर के भीतर के प्राणों को नहीं चाहता, किंतु बाहर के प्राणों की याचना करता हूँ। तुम अपने प्राणों से भी प्यारे ज्येष्ठ पुत्र को मुझे दे दो। मैं सभी तीर्थों की यात्रा करना चाहता हूँ। इसके लिये एक साथी की मुझे आवश्यकता है। तुम्हारा यह पुत्र योग्य और होनहार है, इसका भी कल्याण होगा और मेरा भी काम चल जायगा।’
संन्यासी जी की इस बात को सुनकर हाड़ाई पण्डित सुन्न पड़ गये। उन्हें स्वप्न में भी ध्यान नहीं था कि संन्यासी महाशय ऐसी विलक्षण वस्तु की याचना करेंगे। भला, जिस पुत्र को पिता प्राणों से भी अधिक प्यार करता हो, जिसके बिना उसका जीवन असम्भव-सा ही हो जाने वाला हो, उस पुत्र को यदि कोई सदा के लिये माँग बैठे तो उस पिता को कितना भारी दुःख होगा, इसका अनुमान तो कोई सहृदय स्नेही पिता ही कर सकता है। अन्य पुरुष की बुद्धि के बाहर की बात है। महाराज दशरथ से विश्वामित्र-जैसे क्रोधी और तेजस्वी ब्रह्मर्षि ने कुछ दिनों के ही लिये श्रीरामचन्द्र जी को माँगा था। धर्म में आस्था रखने वाले महाराज यह जानते भी थे कि महर्षि की इच्छा-पूर्ति न करने पर मेरे राज्य तथा परिवार की खैर नहीं है। उन अमित तेजस्वी ब्रह्मर्षि के तप और प्रभाव से भी वे पूर्णरीत्या परिचित थे, उन्हें इस बात का भी दृढ़ विश्वास था कि विश्वामित्र जी के साथ में रामचन्द्र जी का किसी प्रकार भी अनिष्ट नहीं हो सकता, फिर भी पुत्र-वात्सल्य के कारण विश्वामित्र जी की इच्छा-पूर्ति करने के लिये वे सहमत नहीं हुए और अत्यन्त दीनता के साथ ममता में सने हुए वाक्यों से कहने लगे-
 
देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं। सोउ मुनि देउँ निमिष एक माहीं।।
सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाईं। राम देत नहिं बनइ गोसाईं।।

जब गुरु वसिष्ठ ने उन्हें समझाया, तब कहीं जाकर उनका मोह भंग हुआ और वे महर्षि के इच्छानुसार श्रीरामचन्द्र जी को उनके साथ वन में भेजने को राजी हुए।

इधर हाड़ाई पण्डित को उनकी धर्मनिष्ठा ने समझाया। उन्होंने सोचा- ‘पुत्र को देने में भी दुःख सहना होगा और न देने में भी अकल्याण है।
क्रमशः

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