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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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संन्यासी शाप देकर मेरा सर्वस्व नाश कर सकते हैं। इसलिये चाहे जो हो पुत्र को इन्हें दे ही देना चाहिये।’ यह सोचकर वे पद्मावती देवी के पास गये और उनसे जाकर सभी वृत्तान्त कहा। भला, जिसे नित्यानन्द-जैसे महापुरुष की माता होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, वह अपने धर्म से विचलित कैसे हो सकती है? पुत्र-मोह के कारण वह कैसे अपने धर्म को छोड़ सकती है? सब कुछ सुनकर उसने दृढ़ता के साथ उत्तर दिया- ‘मैं तो आपके अधीन हूँ। जो आपकी इच्छा है, वही मेरी भी होगी, पुत्र-वियोग का दुःख असह्या होता है, किंतु पतिव्रताओं के लिये पति-आज्ञा-उल्लंघन का दुःख उसे भी अधिक असह्या होता है, इसलिये आपकी जैसी इच्छा हो करें। मैं सब प्रकार से सहमत हूँ, जिसमें धर्मलोप न हो वही कीजिये।’
पत्नी की अनुमति पाकर हाड़ाई पण्डित ने अपने प्राणों से भी प्यारे प्रिय पुत्र को रोते-रोते संन्यासी के हाथों में सौंप दिया। धर्मनिष्ठ नित्यानन्द जी ने भी इसमें कुछ भी आपत्ति नहीं की। वे प्रसन्नतापूर्वक संन्यासी के साथ हो लिये। उन्होंने पीछे फिरकर फिर अपने माता-पिता तथा कुटुम्बियों की ओर नहीं देखा।

संन्यासी जी के साथ नित्यानन्द जी ने भारतवर्ष के प्रायः सभी मुख्य-मुख्य तीर्थों की यात्रा की। वे गया, काशी, प्रयाग, मथुरा, द्वारका, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्तरी, यमुनोत्तरी, रंगनाथ, सेतुबन्ध रामेश्वर, जगन्नाथपुरी आदि तीर्थों में गये। इसी तीर्थयात्रा-भ्रमण में इनका श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी के साथ साक्षात्कार हुआ और उनके द्वारा श्रीकृष्ण-भक्ति प्राप्त करके ये प्रेम में विह्वल हो गये। उनसे विदा होकर ये व्रज में आये। इनके साथ के संन्यासी कहाँ रह गये, इसका कोई ठीक-ठीक पता नहीं चलता।

व्रज में आने पर इन्हें पता चला कि नवद्वीप में गौरचन्द्र उदय होकर अपनी सुशीतल किरणों से दोनों ही पक्षों में निरन्तर मोहज्वाला में झुलसते हुए संसारी प्राणियों को अपने श्रीकृष्ण-संकीर्तनरूपी अमृत से शीतलता प्रदान कर रहे हैं, इनका मन स्वतः ही श्रीगौरचन्द्र के आलोक में पहुँचने के लिये हिलोरें मारने लगा। अब ये अधिक समय तक व्रज में नहीं रह सके और प्रयाग, काशी होते हुए सीधे नवद्वीप में पहुँच गये।

नवद्वीप जाकर अवधूत नित्यानंद सीधे महाप्रभु के समीप नहीं गये। वे पण्डित नन्दनाचार्य के घर जाकर ठहर गये। इधर प्रभु ने तो अपनी दिव्यदृष्टि द्वारा पहले ही देख लिया था कि नित्यानन्द नवद्वीप आ रहे है, इसीलिए उन्होंने खोज करने के लिए भक्तों को भेजा।

स्नेहाकर्षण....

सचमुच प्रेम में कितना भारी आकर्षण है। आकाश में चन्द्र भगवान का इन्दु-मण्डल है और पृथ्वी पर सरित्पति सागर विराजमान है। जिस दिन शर्वरीनाथ अपनी सम्पूर्ण कलाओं से आकाशमण्डल में उदित होते हैं, उसी दिन अवनि पर मारे प्रेम के पयोनिधि उमड़ने लगता है। पद्माकर भगवान भुवन-भास्कर से कितनी दूर पर रहते हैं, किंतु उनके आकाश में उदय होते ही वे खिल उठते हैं, उनका मुकुर-मन जो अब तक सूर्यदेव के शोक में संकुचित बना बैठा था, वह उनकी किरणों का स्पर्श पाते ही आनन्द से विकसित होकर लहराने लगता है। बादल न जाने कहाँ गरजते हैं, किंतु पृथ्वी पर भ्रमण करने वाले मयूर यहीं से उनकी सुमधुर ध्वनि सुनकर आनन्द में उन्मत्त होकर चिल्लाने और नाचने लगते हैं, यदि प्रेम में इतना अधिक आकर्षण न होता तो सचमुच इस संसार का अस्तित्व ही असम्भव हो जाता।

संसार की स्थिति ही एकमात्र प्रेम के ही ऊपर निर्भर है। प्रेम ही ईश्वर है और ईश्वर ही प्रेम है। प्रेम ही प्राणियों को भाँति-भाँति के नाच नचा रहा है। हृदय का विश्राम- स्थान प्रेम ही है। स्वच्छ हृदय में जब प्रेम का सच्चा स्वरूप प्रकट होता है, तभी हृदय में शान्ति होती है। हृदय में प्रेम का प्राकट्य हो जाने पर कोई विषय अज्ञेय नहीं रह जाता, आगे-पीछे की सभी बातें प्रत्यक्ष दीखने लगती हैं। फिर चर-अचर में जहाँ भी प्रेम दृष्टिगोचर होता है वहीं हृदय आप-से-आप दौड़कर चला जाता है। अहा, जिन्होंने प्रेम-पीयूष का पान कर लिया है, जो प्रेमासव का पान करके पागल बन गये हैं, उन प्रेमियों के पाद-पद्मों में पहुँचने पर हृदय में कितनी अधिक शान्ति उत्पन्न होती है, उसे तो वे ही प्रेमी भक्त अनुभव कर सकते हैं, जिन्हें प्रभु के प्रेम-प्रसाद की पूर्णरीत्या प्राप्ति हो चुकी है।

नित्यानन्द प्रभु प्रेम के ही आकर्षण से आकर्षित होकर नवद्वीप आये थे, इधर इस बात का पता प्रभु के हृदय को बेतार के तार द्वारा पहले ही लग चुका था। उन्होंने उसी दिन भक्तों को नवद्वीप में अवधूत नित्यानन्द को खोजने के लिये भेजा। नवद्वीप कोई छोटा-मोटा गाँव तो था ही नहीं जिसमें से वे झट नित्यानन्दजी को खोज लाते, फिर नित्यानन्दजी से कोई परिचित भी नहीं था, जो उन्हें देखते ही पहचान लेता। श्रीवास पण्डित तथा हरिदास दिनभर उन नवीन आये हुए महापुरुष की खोज करते रहे, किंतु उन्हें इनका कुछ भी पता नहीं चला। अन्त में निराश होकर वे प्रभु के पास लौट आये और आकर कहने लगे- ‘प्रभो! हमने आपके आज्ञानुसार नवद्वीप के मुहल्ले-मुहल्ले में जाकर उन महापुरुष की खोज की, सब प्रकार के मनुष्यों के घरों में जाकर देखा, किंतु हमें उनका कुछ भी पता नहीं चला। अब जैसी आज्ञा हो, वैसा ही करें, जहाँ बतावें वहीं जायँ।’
इन लोगों के मुख से इस बात को सुनकर प्रभु कुछ मुसकराये और सबकी ओर देखते हुए बोले- ‘मुझे रात्रि में स्वप्न हुआ है कि वे महापुरुष जरूर यहाँ आ गये हैं और लोगों से मेरे घर का पता पूछ रहे हैं। अच्छा, एक काम करो, हम सभी लोग मिलकर उन्हें ढूँढ़ने चलें।’ यह कहकर प्रभु उसी समय उठाकर चल दिये। उनके पीछे गदाधर, श्रीवासादि भक्तगण भी हो लिये। प्रभु उठकर सीधे पं. नन्दनाचार्य के घर की ओर चल पड़े। आचार्य के घर पहुँचने पर भक्तों ने देखा कि एक दिव्यकान्तियुक्त महापुरुष अपने अमित तेज से सम्पूर्ण घर को आलोकमय बनाये हुए पद्मासन से विराजमान हैं। उनके मुखमण्डल की तेजोमय किरणों में ग्रीष्म के प्रभाकर की किरणों की भाँति प्रखर प्रचण्डता नहीं थी, किंतु शरद-चन्द्र की किरणों के समान शीतलता, शान्तता और मनोहरता मिली हुई थी। गौरांग ने भक्तों के सहित उन महापुरुष की चरण-वन्दना की और एक ओर चुपचाप बैठ गये। किसी ने किसी से कुछ भी बातचीत नहीं की।
क्रमशः

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