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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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नित्यानन्द प्रभु अनिमेष-दृष्टि से गौरांग के मुख-चन्द्र की ओर निहार रहे थे। भक्तों ने देखा, उनकी पलकों का गिरना एकदम बंद हो गया है। सभी स्थिर भाव से मन्त्रमुग्ध की भाँति नित्यानन्द प्रभु की ओर देख रहे थे। प्रभु ने अपने मन में सोचा- ‘भक्तों को नित्यानन्द जी की महिमा दिखानी चाहिये। इन्हें कोई प्रेमप्रसंग सुनाना चाहिये, जिसके श्रवण से इनके शरीर में सात्त्विक भावों का उद्दीपन हो। इनके भावों के उदय होने से ही भक्त इनके मनोगत भावों को समझ सकेंगे।’ यह सोचकर प्रभु ने श्रीवास पण्डित को कोई स्तुति-श्लोक पढ़ने के लिये धीरे से संकेत किया। प्रभु के मनोगत भाव को समझकर श्रीवास इस श्लोक को पढ़ने लगे-

  
बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं
बिभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्।
रन्ध्रान्वेणोरधरसुधया पूरयन्गोपवृन्दै-
र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः।।

श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के इस श्लोक में कितना माधुर्य है, इसे तो संस्कृत-साहित्यानुरागी सहृदय रसिक भक्त ही अनुभव कर सकते हैं, इसका भाव शब्दों में व्यक्त किया ही नहीं जा सकता। व्रजमण्डल के भक्तगण तो इसी श्लोक को श्रीमद्भागवत के प्रचार में मूल कारण बताते हैं। बात यही थी कि भगवान शुकदेवजी तो बाल्यकाल से ही विरक्त थे। वे अपने पिता भगवान व्यासदेवजी के पास न आकर घोर जंगलों में ही अवधूत-वेश में विचरण करते थे। व्यासदेव ने उसी समय श्रीमद्भागवत की रचना की थी। उनकी इच्छा थी कि शुकदेव जी इसे पढ़ें, किंतु वे जितनी देर में गौ दुही जा सकती है, उतनी देर से अधिक कहीं ठहरते ही नहीं थे। फिर अठारह हजार श्लोक वाली श्रीमद्भागवत को वे किस प्रकार पढ़ सकते थे, इसलिये व्यासदेव जी की इच्छा मन की मन ही में रह गयी।
व्यासजी के शिष्य उस घोर जंगल में समिधा, कुश तथा फूल-फल लेने जाया करते थे, एक दिन उन्हें इस बीहड़ वन में एक व्याघ्र मिला। व्याघ्र को देखकर वे लोग डर गये और आकर भगवान व्यासदेव से कहने लगे- ‘गुरुदेव! अब हम घोर जंगल में न जाया करेंगे, आज हमें व्याघ्र मिला था, उसे देखकर हम सब-के-सब भयभीत हो गये।’

शिष्यों के मुख से ऐसी बात सुनकर भगवान व्यासदेव कुछ मुसकराये और थोड़ी देर सोचकर बोले- ‘व्याघ्र से तुम लोगों को भय ही किस बात का है? हम तुम्हें एक ऐसा मन्त्र बना देंगे कि उसके प्रभाव से कोई भी हिंसक जन्तु तुम्हारे पास नहीं फटक सकेगा।’ शिष्यों ने गुरुदेव के वाक्य पर विश्वास किया और दूसरे दिन स्नान-सन्ध्या से निवृत्त होकर हाथ जोड़े हुए वे गुरु के समीप आये और हिंसक जन्तु-निवारक मन्त्र की जिज्ञासा की। भगवान व्यासदेव ने यही ‘बर्हापीडं नटवरवपुः’ वाला श्लोक बता दिया। शिष्यों ने श्रद्धाभक्ति सहित इसे कण्ठस्थ कर लिया और सभी साथ मिलकर जब-जब जंगल को जाते तब-तब इस श्लोक को मिलकर स्वर के साथ पढ़ते। उनके सुमधुर गान से नीरव और निर्जल जंगल गूँजने लगता और चिरकाल तक उसमें इस श्लोक की प्रतिध्वनि सुनायी पड़ती। एक दिन अवधूतशिरोमणि श्रीशुकदेव जी घूमते-फिरते उधर आ निकले। उन्होंने जब इस श्लोक को सुना तो वे मुग्ध हो गये। शिष्यों से जाकर पूछा- ‘तुम लोगों ने यह श्लोक कहाँ सीखा?’

शिष्यों ने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया- ‘हमारे कुलपति भगवान व्यासदेव ने ही हमें इस मन्त्र का उपदेश दिया है। इसके प्रभाव से हिंसक जन्तु पास नहीं आ सकते।’ भगवान शुकदेव जी इस श्लोक के भीतर जो छिपा हुआ अनन्त और अमर बनाने वाला रस भरा हुआ था, उसे पान करके पागल-से हो गये। वे अपने अवधूतपन के सभी आचरणों को भुलाकर दौड़े-दौड़े भगवान व्यासदेव के समीप पहुँचे और उस श्लोक को पढ़ाने की प्रार्थना की। अपने विरक्त परमहंस पुत्र को इस भाँति प्रेम में पागल देखकर पिता की प्रसन्नता का पारावार नहीं रहा। वे शुकदेव जी को एकान्त में ले गये और धीरे से कहने लगे- बेटा! मैंने इसी प्रकार अठारह हजार श्लोकों की परमहंससंहिता ही बनायी है, तुम उसका अध्ययन करो।’ इन्होंने आग्रह करते हुए कहा- ‘नहीं पिता जी! हमें तो बस, यही एक श्लोक बता दीजिये।’ भगवान व्यासदेव ने इन्हें वही श्लोक पढ़ा दिया और इन्होंने उसी समय उसे कण्ठस्थ कर लिया। अब तो ये घूमते हुए उसी श्लोक को सदा पढ़ने लगे।
श्रीकृष्ण प्रेम तो ऐसा अनोखा आसव है कि इसका जिसे तनिक भी चसका लग गया फिर वह कभी त्याग नहीं सकता। मनुष्य यदि फिर उसे छोड़ना भी चाहे तो वह स्वयं उसे पकड़ लेता है। शुकदेव जी को भी उस मधुमय मनोज्ञ मदिरा का चसका लग गया, फिर वे अपने अवधूतपने के आग्रह को छोड़कर श्रीमद्भागवत के पठन में संलग्न हो गये और पिता से उसे सांगोपांग पढ़कर ही वहाँ से उठे। तभी तो भगवान व्यासदेव जी कहते हैं-

 
आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थंभूतगुणो हरिः।।

भगवान के गुणों में यही तो एक बड़ी भारी विशेषता है कि जिनकी हृदय-ग्रन्थि खुल गयी है, जिनके सर्व संशयों का जड़मूल से छेदन हो गया है और जिनके सम्पूर्ण कर्म नष्ट भी हो चुके हैं, ऐसे आत्माराम मुनि भी उन गुणों में अहैतु की भक्ति करते हैं। क्यों न हो, वे तो रसराज हैं न? ‘प्रेमसिन्धु में डूबे हुए को किसी ने आज तक उछलते देखा ही नहीं।’

जिस श्लोक का इतना भारी महत्त्व है उसका भाव भी सुन लीजिये। गौएँ चराने मेरे नन्हें-से गोपाल वृन्दावन की ओर जा रहे हैं। साथ में वे ही पुराने ग्वाल-बाल हैं, उन्हें आज न जाने क्या सूझी है कि वे कनुआ की कमनीय कीर्ति का निरन्तर बखान करते हुए जा रहे हैं। सभी अपने कोमल कण्ठों से श्रीकृष्ण का यशोगान कर रहे हैं। इधर ये अपनी मुरली की तान में ही मस्त हैं, इन्हें दीन-दुनिया किसी का भी पता नहीं।

अहा! उस समय की इनकी छबि कितनी सुन्दर है- ‘सम्पूर्ण शरीर की गठन एक सुन्दर नट के समान बड़ी ही मनोहर और चित्ताकर्षक है। सिर पर मोर मुकुट विराजमान है। कानों में बड़े-बड़े कनेर के पुष्प लगा रखे हैं, कनक के समान जिसकी द्युति है, ऐसा पीताम्बर सुन्दर शरीर पर फहरा रहा है, गले में वैजयन्ती माला पड़ी हुई है। कुछ आँखों की भृकुटियों को चढ़ाये हुए, टेढ़े होकर वंशी के छिद्रों को अपने अधरामृत से पूर्ण करने में तत्पर हैं।
क्रमशः

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