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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रभु बार-बार आग्रह कर-करके आचार्य को और अधिक परसवा देते और आचार्य भी प्रेम के वशीभूत होकर उसे पा लेते। इस प्रकार उस दिन तीनों ने ही अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत अधिक भोजन किया। किंतु उस भोजन में चारों ओर से प्रेम-ही-प्रेम भरा था। भोजनोपरान्त प्रभु ने श्रीविष्णुप्रिया से लेकर आचार्य तथा श्रीवास पण्डित को मुख-शुद्धि के लिये ताम्बूल दिया। कुछ आराम करने के अनन्तर प्रभु की आज्ञा लेकर अद्वैत तो शान्तिपुर चले गये और श्रीवास अपने घर को चले गये।
प्रच्छन्न भक्त पुण्डरीक विद्यानिधि....
जिनके हृदय में भगवान के प्रति भक्ति उत्पन्न हो गयी है, जिनका हृदय श्याम-रंग में रँग गया है, जिनकी भगवान के सुमधुर नामों तथा उनकी जगत-पावनी लीलाओं में रति है, उन बड़भागी भक्तों ने ही यथार्थ में मनुष्य-शरीर को सार्थक बनाया है। प्रायः देखा गया है कि जिनके ऊपर भगवत्कृपा होती है, जो प्रभु के प्रेम में पागल बन जाते हैं, उनका बाह्य जीवन भी त्यागमय बन जाता है, क्योंकि जिसने उस अद्भुत प्रेमासव का एक बार भी पान कर लिया, उसे फिर त्रिलोकी के जो भी संसारी सुख हैं, सभी फीके-फीके-से प्रतीत होने लगते हैं। संसारी सुखों में तो मनुष्य तभी तक सुखानुभव करता है, जब तक उसे असली सुख का पता नहीं चलता। जिसने एक क्षण को भी सुखस्वरूप प्रेमदेव के दर्शन कर लिये फिर उसके लिये सभी संसारी पदार्थ तुच्छ-से दिखायी देने लगेंगे। इसीलिये प्रायः देखा गया है कि परमार्थ के पथिक भगवद्भक्तों तथा ज्ञाननिष्ठ साधकों का जीवन सदा त्यागमय ही होता है। वे संसारी भोगों से स्वरूपतः भी दूर ही रहते हैं, किंतु कुछ ऐसे भी भक्त देखने में आते हैं कि जिनका जीवन ऊपर से तो संसारी लोगों का-सा प्रतीत होता है, किंतु हृदय में अगाध भक्ति-रस भरा हुआ होता है। जो जरा-सी ठेस लगते ही छलककर आँखों के द्वारा बाहर बहने लगता है। असल में भक्ति का सम्बन्ध तो हृदय से है, यदि मन विषयवासनाओं में रत नहीं है, तो कैसी भी परिस्थिति में क्यों न रहें, हृदय सदा प्रभु के पादपद्मों का ही चिन्तन करता रहेगा। यही सोचकर महाकवि केशव कहते हैं-
कहैं ‘केशव’ भीतर जोग जगै इत बाहिर भोगमयो तन है।
मन हाथ भयो जिनके तिनके बन ही घर है घर ही बन है।।
प्रायः देखा गया है कि त्यागमय जीवन बिताने से साधक के मन में ऐसी धारणा-सी हो जाती है कि बिना स्वरूपतः बाह्य त्यागमय जीवन बिताये भगवद्भक्ति प्राप्त ही नहीं होती। भक्तिमार्ग में यह बड़ा भारी विघ्न है, त्यागमय जीवन जितना भी बिताया जाय उतना ही श्रेष्ठ है, किंतु यह आग्रह करना कि स्वरूपतः त्याग किये बिना कोई भक्त बन ही नहीं सकता, वह त्यागजन्य एक प्रकार का अभिमान ही है। भक्त को तो तृण से भी नीचा बनकर कुत्ते, चाण्डाल, गौ और गधे तक को भी मन से नहीं, किंतु शरीर से दण्ड की तरह पृथ्वी पर लेटकर प्रणाम करना चाहिये, तभी अभिमान दूर होगा। भक्तों के विषय में कोई क्या कह सकता है कि वे किस रूप में रहते हैं? नाना परिस्थितियों में रहकर भक्तों को जीवन बिताते देखा गया है, इसलिये जिसके जीवन में बाह्य त्याग के लक्षण प्रतीत न हों, वह भक्त ही नहीं, ऐसा कभी भी न सोचना चाहिये।
पुण्डरीक विद्यानिधि एक ऐसे ही प्रच्छन्न भक्त थे। उनके आचार-व्यवहार को देखकर कोई नहीं समझ सकता था कि ये भक्त हैं, सब लोग उन्हें विषयी ही समझते थे। लोग समझते रहें, किंतु पुण्डरीक महाशय तो सदा प्रभु प्रेम में छके-से रहते थे, लोगों को दिखाने के लिये वे कोई काम थोड़े ही करते थे, उन्हें तो अपने प्यारे से काम था। वैसे उनका बाह्य व्यवहार संसारी विषयी लोगों का-सा ही था। उनका जन्म एक कुलीन वंश में हुआ था, वे देखने में बहुत ही सुन्दर थे, शरीर राजपुत्रों की भाँति सुकुमार था, अत्यन्त ही चिकने और कोमल उनके काले-काले घुँघराले बाल थे, वे उनमें सदा बहुमूल्य सुगन्धित तैल डालते, शरीर को उबटन और तैल-फूलेल से खूब साफ रखते। बहुत ही महीन रेशमी वस्त्र पहनते। कभी गंगा मे स्नान करने नहीं जाते थे। लोग तो समझते थे कि इनकी गंगा जी में भक्ति नहीं है, किंतु उनके हृदय में गंगा माता के प्रति अनन्य श्रद्धा थी। वे इस भय से स्नान करने नहीं जाते थे कि माता के जल से पादस्पर्श हो जायगा। लोगों को गंगा जी में मल-मूल तथा अस्थि फेंकते, तैल-फुलेल लगाते और बाल फेंकते देखकर उन्हें बड़ा ही मार्मिक दुःख होता था। देवार्चन से पूर्व ही वे गंगाजल-पान करते, इस प्रकार उनकी सभी बातें लोकबाह्य ही थीं। इसीलिये लोग उन्हें घोर संसारी कहकर उनकी सदा उपेक्षा ही करते रहते।
एक दिन प्रभु भावावेश में आकर जोरों से ‘हा पुण्डरीक विद्यानिधि’, ‘ओ मेरे बाप विद्यानिधि’ कहकर जोरों से रुदन करने लगे। ‘पुण्डरीक’, ‘पुण्डरीक’ कहते-कहते वे अधीर हो उठे और बेहोश होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। भक्त आपस में एक-दूसरे की ओर देखने लगे। सभी को विस्मय हुआ। पहले तो भक्तों ने समझा ‘पुण्डरीक’ कहने से प्रभु का अभिप्राय श्रीकृष्ण से ही है, फिर जब पुण्डरीक के साथ विद्यानिधि पद पर ध्यान दिया, तब उन्होंने अनुमान लगाया हो-न-हो इस नाम के कोई भक्त हैं। बहुत सोचने पर भी नवद्वीप में ‘पुण्डरीक विद्यानिधि’ नाम के किसी वैष्णव भक्त का स्मरण उन लोगों को नहीं आया। थोड़ी देर के अनन्तर जब प्रभु की मूर्छा भंग हुई तो भक्तों ने नम्रतापूर्वक पूछा- ‘प्रभु जिनका नाम ले-लेकर जोरों से रुदन कर रहे थे, वे भाग्यवान पुण्डरीक विद्यानिधि कौन परम भागवत महाशय हैं?’
प्रभु ने गम्भीरता के साथ कहा- ‘वे एक परम प्रच्छन्न वैष्णव भक्त हैं, आप लोग उन्हें देखकर नहीं जान सकते कि ये वैष्णव हैं, उनके बाह्य आचार-विचार प्रायः सांसारिक विषयी पुरुषों के-से हैं। वे चटगाँव निवासी एक परम कुलीन ब्राह्मण हैं, उनका एक घर शान्तिपुर में भी है, गंगासेवन के निमित्त वे कभी-कभी चटगाँव से शान्तिपुर में भी आ जाते हैं, वे मेरे अत्यन्त ही प्रिय भक्त हैं। वे मेरे आन्तरिक सुहृद् हैं। उनके दर्शन के बिना मैं अधीर हूँ।
क्रमशः
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