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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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एक दिन की बात है कि ये अपनी कुटिया से कहीं जा रहे थे। रास्ते में इन्हें मजीरा, मृदंग की आवाज सुनायी दी। श्रीकृष्ण का कीर्तन समझकर ये उसी ओर चल पड़े। उस समय ‘डंक’ नाम की जाति के लोग मृदंग, मजीरा बजाकर नृत्य किया करते थे और नृत्य के साथ में हरिलीलाओं का कीर्तन किया करते थे। उस समय भी कोई डंक नृत्य कर रहा था। जब हरिदास जी पहुँचे तब डंक भगवान की कालियदमन की लीला के सम्बन्ध के पद गा रहा था। डंक का स्वर कोमल था, नृत्य में वह प्रवीण था और गाने का उसे अच्छा अभ्यास था। वह बड़े ही लय से यशोदा और नन्द के विलाप का वर्णन कर रहा था। ‘भगवान गेंद के बहाने से कालियदह में कूद पड़े हैं,’ इस बात को सुनकर नन्द-यशोदा तथा सभी व्रजवासी वहाँ आ गये हैं।
बालकृष्ण अपने कोमल चरणकमलों को कालियनाग के फणों के ऊपर रखे हुए उसी अपनी ललित त्रिभंगी गति से खड़े हुए मुरली बजा रहे हैं। नाग जोरों से फुंकार मारता है, उसकी फुंकार के साथ मुरारी धीरे-धीरे नृत्य करते हैं। यशोदा ऐसी दशा देखकर बिलबिला रही हैं। वह चारों ओर लोगों की ओर कातर दृष्टि से देख रही हैं कि मेरे बनवारी को कोई कालिय के मुख से छुड़ा ले। नन्दबाबा अलग आँसू बहा रहे हैं।’ इस भाव को सुनते-सुनते हरिदास जी मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। डंक इनके सात्त्विक भावों को देखकर समझ गया कि ये कोई महापुरुष हैं, उसने नृत्य बंद कर दिया और इनकी पद-धूलि को मस्तक पर चढ़ाकर इनकी स्तुति करने लगा। बहुत-से उपस्थित भक्तों ने हरिदासजी के पैरों के नीचे की धूलि को लेकर सिर पर चढ़ाया और उसे बाँधकर अपने घर को ले गये।
वहीं पर एक मानलोलुप ब्राह्मण भी बैठा था, जब उसने देखा कि मूर्च्छित होकर गिरने से ही लोग इतना आदर करते हैं, तब मैं इस अवसर को हाथ से क्यों जाने दूँ? यह सोचकर जब वह डंक फिर नाचने लगा, तब यह भी झूठ-मूठ बहाना बनाकर पृथ्वी पर अचेत होकर गिर पड़ा। डंक तो सब जानता था। इसके गिरते ही वह इसे जोरों से पीटने लगा। मार के सामने तो भूत भी भागते हैं, फिर यह तो दम्भी था, जल्दी ही मार न सह सकने के कारण वहाँ से भाग लिया। उस धनी पुरुष ने तथा अन्य उपस्थित लोगों ने इसका कारण पूछा कि ‘हरिदास की तुमने इतनी स्तुति क्यों की और वैसा ही भाव आने पर इस ब्राह्मण को तुमने क्यों मारा?’
सबके पूछने पर डंक ने कहा- ‘हरिदास परम भगवद्भक्त हैं। उनके शरीर में सचमुच सात्त्विक भावों का उदय हुआ था, यह दम्भी था, केवल अपनी प्रशंसा के निमित्त इसने ऐसा ढोंग बनाया था, इसीलिये मैंने उनकी स्तुति की और इसे पीटा। ढोंग सब जगह थोड़े ही चलता है, कभी-कभी मूर्खों में ही काम दे जाता है, पर कलई खुलने पर वहाँ भी उसका भण्डाफोड़ हो जाता है।
हरिदास सचमुच में रत्न हैं। उनके रहने से यह सम्पूर्ण देश पवित्र हो रहा है। आप लोग बड़े भाग्यवान हैं, जो ऐसे महापुरुष के नित्यप्रति दर्शन पाते हैं।’ डंक की बात सुनकर सभी को परम प्रसन्नता हुई और वे सभी लोग हरिदासजी के भक्ति-भाव की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। वह ब्राह्मण तो इतना लज्जित हुआ कि लोगों को मुँह दिखाने में भी उसे लज्जा होने लगी। सच है, बनावटी की ऐसी ही दुर्दशा होती है। किसी ने ठीक ही कहा है-
देखा देखी साधे जोग। छीजै काया बाढ़ै रोग।।
हरिदास जी की निष्ठा अलौकिक है। उसका विचार करना मनुष्यबुद्धि के बाहर की बात है।
हरिदासजी द्वारा नाम-माहात्म्य...
शोक और मोह का कारण है प्राणियों में विभिन्न भावों का अध्यारोप। जब मनुष्य एक को तो अपना सुख देने वाला प्यारा सुहृद् समझता है ओर दूसरे को दुःख देने वाला शत्रु समझकर उससे द्वेष करने लगता है, तब उसके हृदय में शोक और मोह का उदय होना अवश्यम्भावी है, जिस समय सभी प्राणियों में वह उसी एक अखण्ड सत्ता का अनुभव करने लगेगा, जब प्राणिमात्र को प्रभु का पुत्र समझकर सबको महान भाव से प्यार करने लगेगा, तब उस साधक के हृदय में मोह और शोक का नाम भी न रहेगा। वह सदा प्रसन्न होकर भगवन्नामों का ही स्मरण-चिन्तन करता रहेगा। उसके लिये न तो कोई संसार में शत्रु होगा न मित्र, वह सभी को अपने प्रियतम की प्यारी संतान समझकर भाई के नाते से जीवमात्र की वन्दना करेगा और उसे भी कोई क्लेश न पहुँचा सकेगा। उसके सामने आने पर विषधर सर्प भी अपना स्वभाव छोड़ देगा। भगवन्नाम का माहात्म्य ही ऐसा है।
महात्मा हरिदास जी फुलिया के पास ही पुण्यसलिला माँ जाह्नवी के किनारे पर एक गुफा बनाकर उसमें रहते थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी थी। नित्यप्रति वहाँ सैकड़ों आदमी इनके दर्शन के लिये तथा गंगास्नान के निमित्त इनके आश्रम के निकट आया करते थे। जो भी मनुष्य इनकी गुफा के समीप जाता, उसके शरीर में एक प्रकार की खुजली-सी होने लगती। लोगों को इसका कुछ भी कारण मालूम न हो सका। उस स्थान में पहुँचने पर चित्त में शान्ति तो सभी के होती, किंतु वे खुजली से घबड़ा जाते। लोग इस विषय में भाँति-भाँति के अनुमान लगाने लगे। होते-होते बात सर्वत्र फैल गयी। बहुत-से चिकित्सकों ने वहाँ की जलवायु का निदान किया, अन्त में सभी ने कहा- ‘यहाँ जरूर कोई महाविषधर सर्प रहता है। न जाने हरिदास जी कैसे अभी तक बचे हुए हैं, उसके श्वास से ही मनुष्य की मृत्यु हो सकती है। वह कहीं बहुत भीतर रहकर श्वास लेता है, उसी का इतना असर है कि लोगों के शरीर में जलन होने लगती है, यदि वह बाहर निकलकर जोरों से फुंकार करे, तो इसकी फुंकार से मनुष्य बच नहीं सकता।
हरिदास जी इस स्थान को शीघ्र ही छोड़कर कहीं अन्यत्र रहने लगें, नहीं तो प्राणों का भय है।’ चिकित्सकों की सम्मति सुनकर सभी ने हरिदास जी से आग्रहपूर्वक प्रार्थना की कि आप इस स्थान को अवश्य ही छोड़ दें। आप तो महात्मा हैं, आपको चाहे कष्ट न भी हो, किंतु और लोगों को आपके यहाँ रहने से बड़ा भारी कष्ट होगा।
क्रमशः
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