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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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भगवन्नाम से कहीं दुःखों का नाश थोड़े ही हो सकता है? शास्त्रों में जो कहीं-कहीं नाम की इतनी प्रशंसा मिलती है, वह केवल अर्थवाद है। यथार्थ बात तो दूसरी ही है।’
हरिदास जी ने कुछ जोर देते हुए कहा- ‘भगवन्नाम में जो अर्थवाद का अध्यारोप करते हैं, वे शुष्क तार्किक हैं। वे भगवन्नाम के माहात्म्य को समझ ही नहीं सकते। भगवन्नाम में अर्थवाद हो ही नहीं सकता।’

इस पर गोपालचन्द्र चक्रवर्ती ने भी अपनी बात पर जोर देते हुए कहा- ‘ये मूर्खों को बहकाने की बातें हैं। अजामिल-जैसा पापी पुत्र का नारायणनाम लेते ही तर गया। क्या घट-घटव्यापी भगवान इतना भी नहीं समझ सकते थे कि इसने अपने पुत्र को बुलाया है? यह अर्थवाद नहीं तो क्या है?’ हरिदास जी ने कहा- ‘इसे अर्थवाद कहने वाले स्वयं अनर्थवादी हैं, उनसे मैं कुछ नहीं कह सकता।’ 
जोश में आकर गोपाल चक्रवर्ती ने कहा- ‘यदि भगवन्नाम-स्मरण करने से मनुष्य की नीचता जाती रहे तो मैं अपनी नाक कटा लूँ।’

हरिदास जी ने भी जोश में आकर कहा- ‘यदि भगवन्नाम के जप से नीचताओं का जड़-मूल से नाश न हो जाय तो मैं अपने नाक-कान दोनों ही कटाने के लिये तैयार हूँ।’ बात को बहुत बढ़ते देखकर लोगों ने दोनों को ही शान्त कर दिया। जमींदार उस आदमी से बहुत असन्तुष्ट हुए। उसे वैष्णवापराधी और भगवन्नामविमुख समझकर जमींदार ने उसे नौकरी से पृथक कर दिया। सुनते हैं कि कालान्तर में उसकी नाक सचमुच कट गयी।

इसी प्रकार की एक दूसरी घटना हरिनदी नामक ग्राम में हुई। हरिनदी नामक ग्राम के एक पण्डितमानी, अहंकारी ब्राह्मण को अपने शास्त्रज्ञान का बड़ा गर्व था। हरिदास जी चलते-फिरते, उठते-बैठते उच्च स्वर से-

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।

-इस महामन्त्र का सदा जप करते रहते थे। इन्हें मुसलमान और महामन्त्र का अनधिकारी समझकर उसने इनसे पूछा- ‘मुसलमान के लिये इस उपनिषद के मन्त्र का जप करना कहाँ लिखा है? यह तुम्हारी अनधिकार चेष्टा है और जो तुम्हें भगवद्भक्त कहकर तुम्हारी पूजा करते हैं, वे भी पाप करते हैं।
शास्त्र में लिखा है, जहाँ अपूज्य लोगों की पूजा होती है और पूज्य लोगों की उपेक्षा की जाती है वहाँ दुर्भिक्ष, मरण, भय ओर दारिद्र्य- ये बातें होती हैं। इसलिये तुम इस अशास्त्रीय कार्य को छोड़ दो, तुम्हारे ऐसे आचरणों से देश में दुर्भिक्ष पड़ जायगा।’

हरिदास जी ने बड़ी ही नम्रता से कहा- ‘विप्रवर! मैं नीच पुरुष भला शास्त्रों का मर्म क्या जानूँ? किंतु आप-जैसे विद्वानों के ही मुख से सुना है कि चाहे वेद-शास्त्रों के अध्ययन का द्विजातियों के अतिरिक्त किसी को अधिकार न हो, किंतु भगवन्नाम तो किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कंक, यवन तथा खस आदि जितनी भी पापयोनि और जंगली जाति हैं, सभी को पावन बनाने वाला है। भगवन्नाम का अधिकार तो सभी को समानरूप से है।

हरिदास जी के इस शास्त्र सम्मत उत्तर को सुनकर ब्राह्मण ने पूछा- ‘खैर, भगवन्नाम का अधिकार सबको भले ही हो, किंतु मन्त्र का जप इस प्रकार जोर-जोर से करने से क्या लाभ? शास्त्रों में मानसिक, उपांशु और वाचिक- ये तीन प्रकार के जप बताये हैं। जिनमें वाचिक जप से सहस्रगुणा उपांशु- जप श्रेष्ठ है, उपांशु-जप से लक्षगुणा मानसिक जप श्रेष्ठ है। तुम मन में जप करो, तुम्हारे इस जप को तो मानसिक, उपांशु अथवा वाचिक किसी प्रकार का भी जप नहीं कह सकते। यह तो ‘वैखरी-जप’ है जो अत्यन्त ही नीच बताया गया है।’

हरिदास जी ने उसी प्रकार नम्रतापूर्वक कहा- ‘महाराज! मैं स्वयं तो कुछ जानता नहीं, किंतु मैंने अपने गुरुदेव श्रीअद्वैताचार्य जी के मुख से थोड़ा-बहुत शास्त्र का रहस्य सुना है। आपने जो तीन प्रकार के जप बताये हैं और जिनमें मानसिक जप को सर्वश्रेष्ठता दी है, वह तो उन मन्त्रों के जप के लिये है। जिनकी विधिवत गुरु के द्वारा दीक्षा लेकर शास्त्र की विधि के अनुसार केवल पवित्रावस्था में ही सांगोपांग जप किया जाता है। ऐसे मन्त्र गोप्य कहे जाते हैं। वे दूसरों के सामने प्रकट नहीं किये जाते। किंतु भगवन्नाम के लिये तो शास्त्रों में कोई विधि ही नहीं बतायी गयी है। इसका जप तो सर्वकाल में, सर्वस्थानों में, सबके सामने और सब परिस्थितियों में किया जाता है। अन्य मन्त्रों का चाहे धीरे-धीरे जप का अधिक माहात्म्य भले ही हो, किंतु भगवन्नाम का माहात्म्य तो जोरों से ही उच्चारण करने में बताया है।भगवन्नाम का जितने ही जोरों से उच्चारण किया जायगा उसका उतना ही अधिक माहात्म्य होगा, क्योंकि धीरे-धीरे नाम-जप करने वाला तो अकेला अपने-आपको ही पावन बना सकता है, किंतु उच्च स्वर से संकीर्तन करने वाला तो सुनने वाले जड-चेतन सभी को पावन बनाता है।’

इनकी इस बात को सुनकर ब्राह्मण ने झुँझलाकर कहा- ‘ये सब शास्त्रों के वाक्य अर्थवाद के नाम से पुकारे जाते हैं। लोगों की नाम-जप और संकीर्तन में श्रद्धा हो, इसीलिये ऐसे-ऐसे वाक्य कहीं-कहीं कह दिये गये हैं। यथार्थ बात तो यह है कि बिना दैवी-सम्पत्ति का आश्रय ग्रहण किये नाम-जप से कुछ भी नहीं होने का। यदि नाम-जप से ही मनुष्य का उद्धार हो जाता तो फिर इतने शास्त्रों की रचना क्यों होती?’

हरिदास जी ने उसी तरह नम्रता के साथ कहा- ‘पण्डित जी! श्रद्धा होना ही तो कठिन है। यदि सचमुच में केवल भगवन्नाम पर ही पूर्णरूप से श्रद्धा जम जाय तो फिर शास्त्रों की आवश्यकता ही नहीं रहती। शास्त्रों में भी और क्या है, सर्वत्र ‘भगवान पर श्रद्धा करो’ ये ही वाक्य मिलते हैं। श्रद्धा-विश्वास की पुष्टि करने के ही निमित्त शास्त्र हैं।’

आवेश में आकर ब्राह्मण ने कहा- ‘यदि केवल भगवन्नाम-जप से ही सब कुछ हो जाय तो मैं अपने नाक-कान दोनों कटवा लूँगा।’

हरिदास जी यह कहते हुए चले गये कि ‘यदि आपको विश्वास नहीं है तो न सही। मैंने तो अपने विश्वास की बात आपसे कही है।’ सुनते हैं, उस ब्राह्मण की पीनस-रोग से नाक सड़ गयी और वह गल-गलकर गिर पड़ी। भगवन्नाम-विरोधी की जो भी दशा हो वही थोड़ी है। सम्पूर्ण दुःखों का एकमात्र मूल कारण भगवन्नाम से विमुख होना ही तो है।  
क्रमशः

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